बाघों की सल्तनत के पीछे कौन है असली पहरेदार? मोहन यादव ने दिखाई जंगल की अनकही कहानी

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बाघों की सल्तनत के असली पहरेदार कौन? मोहन यादव ने दिखाई जंगल की अनकही कहानी

ए डे इन द लैंड ऑफ टाइगर्स’ के जरिए बाघों की दुनिया के साथ वनकर्मियों के समर्पण को सामने लाने की पहल। वन्यजीव संरक्षण, जनभागीदारी और प्राकृतिक विरासत की सुरक्षा के संदेश के बीच सवाल यह भी कि जंगल के इन असली पहरेदारों की चुनौतियों का समाधान कैसे होगा। जंगल में बाघ की एक झलक पाने के लिए पर्यटक घंटों इंतजार करते हैं। सफारी के दौरान बाघ दिखाई दे जाए, तो कैमरे क्लिक करने लगते हैं और रोमांच की कहानी घर तक पहुंचती है। लेकिन इस खूबसूरत तस्वीर के पीछे एक ऐसी दुनिया भी है, जो अक्सर कैमरे से दूर रहती है। वह दुनिया है उन वनकर्मियों की, जिनकी सतर्कता, मेहनत और जोखिम भरी ड्यूटी जंगल की सुरक्षा से जुड़ी होती है।

आखिर कौन है, जो घने जंगलों में गश्त करता है? कौन वन्यजीवों की गतिविधियों पर नजर रखता है? कौन अवैध शिकार की आशंका के बीच निगरानी करता है और कौन इंसान तथा वन्यजीवों के बीच टकराव की स्थिति में मोर्चा संभालता है? मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वन्य प्राणी सप्ताह के समापन अवसर पर लघु फिल्म ‘ए डे इन द लैंड ऑफ टाइगर्स’ जारी कर इसी अनदेखी दुनिया को चर्चा के केंद्र में लाने की कोशिश की है।

वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व के मोहली में आयोजित कार्यक्रम के दौरान प्रदर्शित लगभग 13 मिनट 13 सेकंड की यह फिल्म बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के प्राकृतिक सौंदर्य, बाघों की स्वच्छंद गतिविधियों और वनकर्मियों के समर्पण को सामने लाती है। इस पहल का महत्व केवल एक फिल्म के विमोचन तक सीमित नहीं है। यह वन्यजीव संरक्षण को देखने का नजरिया बदलने और जंगल की सुरक्षा में जुटे लोगों के योगदान को पहचान दिलाने का अवसर भी है।

1. बाघ की तस्वीर के पीछे छिपी मेहनत की कहानी

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व मध्यप्रदेश की प्रमुख वन्यजीव पहचान में शामिल है। यहां के जंगल, जैव विविधता और बाघ पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। लेकिन पर्यटकों के लिए रोमांच का केंद्र यही जंगल वन विभाग के मैदानी कर्मचारियों के लिए चौबीसों घंटे सतर्कता की मांग करने वाला कार्यक्षेत्र है। वनकर्मियों की जिम्मेदारी सिर्फ बाघों की मौजूदगी दर्ज करना नहीं है। नियमित गश्त, संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी, वन्यजीवों के स्वास्थ्य पर नजर, अवैध शिकार की रोकथाम और जंगल में संदिग्ध गतिविधियों पर कार्रवाई जैसे अनेक काम इसी व्यवस्था का हिस्सा हैं। मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका वाले क्षेत्रों में लोगों को सतर्क करना और जरूरत पड़ने पर त्वरित कार्रवाई करना भी उनकी जिम्मेदारियों में शामिल हो सकता है।

यानी जंगल में बाघ की बेफिक्र मौजूदगी के पीछे एक ऐसी व्यवस्था काम करती है, जिसमें छोटी-सी चूक भी गंभीर परिणाम ला सकती है। वनकर्मी कई बार कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के बीच अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। इसके बावजूद आम लोगों के सामने उनकी भूमिका उतनी प्रमुखता से नहीं आती, जितनी बाघों की तस्वीरें आती हैं।

‘ए डे इन द लैंड ऑफ टाइगर्स’ इसी अंतर को कम करने की कोशिश है। फिल्म का केंद्रीय विचार यह है कि जंगल की कहानी सिर्फ उसके सबसे आकर्षक वन्यजीव की कहानी नहीं होती। उस कहानी में उन लोगों का योगदान भी शामिल होना चाहिए, जो वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा के लिए लगातार काम करते हैं।

2. मोहन यादव का संदेश: वन्यजीव केवल संपत्ति नहीं, आने वाली पीढ़ियों की विरासत

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वन और वन्यजीवों को आने वाली पीढ़ियों की अमूल्य विरासत बताते हुए उनके संरक्षण में समाज की भागीदारी और जागरूकता को महत्वपूर्ण माना। इस संदेश के केंद्र में एक बुनियादी सवाल है: क्या जंगलों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी केवल वन विभाग पर छोड़कर वन्यजीव संरक्षण के लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं?

जंगल की सुरक्षा के लिए सरकारी अमले की भूमिका बेशक सबसे महत्वपूर्ण है, लेकिन स्थानीय समुदायों, पर्यटकों और आम नागरिकों का व्यवहार भी इसके परिणामों को प्रभावित करता है। जंगल में कचरा फैलाना, वन्यजीवों को परेशान करना, नियमों का उल्लंघन करना या संवेदनशील क्षेत्रों में लापरवाही बरतना संरक्षण के प्रयासों को नुकसान पहुंचा सकता है। इसके उलट, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार, वन क्षेत्रों में नियमों का पालन और अवैध गतिविधियों की सूचना संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाना संरक्षण व्यवस्था को सहयोग दे सकता है।

इस लिहाज से फिल्म को केवल मनोरंजन या पर्यटन प्रचार के माध्यम के रूप में देखने के बजाय पर्यावरणीय जागरूकता की पहल के तौर पर भी समझा जा सकता है। हालांकि, जागरूकता का वास्तविक प्रभाव तभी सामने आएगा, जब संदेश दर्शकों तक पहुंचे और उनके व्यवहार में भी बदलाव दिखाई दे।

3. 228 अधिकारी-कर्मचारी और 583 ईडीसी श्रमिक: जंगल की सुरक्षा का व्यापक तंत्र

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में वन एवं वन्यजीव संरक्षण तथा प्रबंधन के लिए उपलब्ध कराए गए आंकड़े इस जिम्मेदारी के व्यापक स्वरूप को सामने रखते हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, रिजर्व में 228 अधिकारी-कर्मचारी तैनात हैं। इनमें क्षेत्र संचालक, उप संचालक, पांच सहायक वन संरक्षक, एक वन्य प्राणी स्वास्थ्य अधिकारी, 10 वन क्षेत्रपाल, 11 उप वन क्षेत्रपाल, 31 वनपाल और 155 वनरक्षक सहित अन्य कर्मचारी शामिल हैं।

इसके अतिरिक्त 101 स्थाईकर्मी, 37 टीपीएफ जवान और 583 ईडीसी श्रमिक भी वन सुरक्षा तथा संरक्षण कार्यों में योगदान दे रहे हैं। क्षेत्र संचालक कार्यालय के 32 कर्मचारी प्रशासनिक, वित्तीय, अभिलेखीय और तकनीकी कार्यों में सहयोग करते हैं।

इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि जंगल का प्रबंधन केवल गश्त लगाने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे मैदानी निगरानी, प्रशासनिक समन्वय, तकनीकी सहयोग और स्थानीय स्तर पर भागीदारी का तंत्र काम करता है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण पहलू समझना जरूरी है। कर्मचारियों और सहयोगियों की संख्या व्यवस्था के आकार को बताती है, उसकी प्रभावशीलता को अपने आप प्रमाणित नहीं करती। प्रभावी संरक्षण के लिए पर्याप्त प्रशिक्षण, संसाधन, संचार व्यवस्था, कर्मचारियों की सुरक्षा और संवेदनशील क्षेत्रों में समय पर कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी है। वनकर्मियों के समर्पण को पहचान देना महत्वपूर्ण है, लेकिन उनके कामकाज के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराना भी उसी जिम्मेदारी का हिस्सा है। जंगल के पहरेदारों को सम्मान के साथ संसाधन और सुरक्षित कार्य परिस्थितियां मिलें, तभी संरक्षण व्यवस्था को लगातार मजबूत किया जा सकता है।

4. कैमरे के सामने बाघ, कैमरे के पीछे वनकर्मी

‘ए डे इन द लैंड ऑफ टाइगर्स’ का निर्माण ‘उड़न गिलहरी’ कंपनी ने किया है। फिल्म निर्माण में ओजैर और अमन का महत्वपूर्ण योगदान बताया गया है। फिल्म में बांधवगढ़ के प्राकृतिक सौंदर्य, गौरवशाली इतिहास, जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण में जुटे वन अमले की भूमिका को प्रस्तुत किया गया है।

वन्यजीवों पर आधारित फिल्मों का एक बड़ा उद्देश्य लोगों को प्रकृति के करीब लाना है। ऐसी फिल्में जंगल के दृश्य दिखाने के साथ उसके पारिस्थितिक महत्व और संरक्षण की चुनौतियों को समझने का माध्यम भी बन सकती हैं।

इस फिल्म की खास बात उसका मानवीय पक्ष है। बाघ को देखने वाले पर्यटक अक्सर यह जानना चाहते हैं कि वह कहां दिखाई देगा, उसकी गतिविधियां कैसी हैं और जंगल में उसका व्यवहार कैसा है। लेकिन उसके प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखने वाले कर्मचारियों की दिनचर्या और चुनौतियां सामान्यतः उनकी जानकारी से बाहर रहती हैं जब कैमरा वनकर्मियों की भूमिका की ओर मुड़ता है, तो संरक्षण की कहानी अधिक व्यापक हो जाती है। जंगल केवल वन्यजीवों का निवास नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व की रक्षा करने वाले लोगों के श्रम और जिम्मेदारी से जुड़ी व्यवस्था भी है। हालांकि, ऐसी फिल्मों की सफलता इस बात से भी तय होगी कि वे कितने लोगों तक पहुंचती हैं। यदि इन्हें विद्यालयों, महाविद्यालयों, पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रमों और पर्यटन से जुड़े मंचों तक पहुंचाया जाए, तो इनका शैक्षणिक महत्व भी बढ़ सकता है।

5. मध्यप्रदेश की बाघ पहचान और संरक्षण की असली परीक्षा

मध्यप्रदेश की पहचान बाघों और समृद्ध वन संपदा से जुड़ी हुई है। बांधवगढ़ जैसे टाइगर रिजर्व इस पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सामने लाते हैं। लेकिन बाघ संरक्षण का अर्थ केवल बाघों की संख्या बढ़ाना या पर्यटकों को उनकी अधिक झलक दिखाना नहीं है।

बाघों के लिए पर्याप्त प्राकृतिक आवास, शिकार प्रजातियों की उपलब्धता, जल स्रोतों की सुरक्षा और जंगलों के बीच प्राकृतिक आवागमन के रास्ते बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसके साथ अवैध शिकार पर नियंत्रण, वन्यजीवों की निगरानी, स्थानीय समुदायों का सहयोग और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के प्रयास जरूरी हैं।

वन क्षेत्रों के आसपास रहने वाले लोगों की समस्याओं को नजरअंदाज करके संरक्षण के लक्ष्य हासिल करना भी आसान नहीं है। जब वन्यजीव आबादी वाले क्षेत्रों के करीब पहुंचते हैं, तो लोगों की सुरक्षा, फसलों और पशुधन को होने वाले नुकसान तथा समय पर सहायता उपलब्ध कराने जैसे सवाल सामने आते हैं। इसलिए संरक्षण की नीति में वन्यजीवों की सुरक्षा और स्थानीय लोगों की चिंताओं, दोनों को स्थान देना आवश्यक है। मुख्यमंत्री की मौजूदगी में फिल्म का विमोचन इन विषयों को सार्वजनिक चर्चा में लाने का अवसर प्रदान करता है। लेकिन जागरूकता को ठोस परिणामों में बदलने के लिए वन विभाग की क्षमता, कर्मचारियों की कार्य परिस्थितियों, स्थानीय भागीदारी और संरक्षण संबंधी उपायों की निरंतर समीक्षा भी जरूरी होगी।

बाघ जंगल का चेहरा, वनकर्मी उसकी सुरक्षा की अहम कड़ी

‘ए डे इन द लैंड ऑफ टाइगर्स’ के जरिए सामने आई कहानी हमें जंगल को एक अलग नजरिए से देखने के लिए प्रेरित करती है। बाघ की मौजूदगी रोमांच पैदा करती है, जंगल की खूबसूरती आकर्षित करती है और सफारी यादगार बनाती है। लेकिन इस पूरी दुनिया को सुरक्षित रखने के लिए निरंतर मेहनत, सतर्कता और जिम्मेदारी की जरूरत होती है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा जारी की गई यह लघु फिल्म वन्यजीव संरक्षण के इसी मानवीय पक्ष को पहचान दिलाने का प्रयास है। इसका संदेश वन विभाग के कर्मचारियों के योगदान को सामने लाने के साथ आम नागरिकों को भी प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझने का अवसर देता है।

अब जरूरत इस संदेश को व्यापक जनभागीदारी से जोड़ने की है। वनकर्मियों को जरूरी संसाधन, जंगलों को प्रभावी सुरक्षा, स्थानीय समुदायों को सहयोग और नई पीढ़ी को प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता मिले, तभी संरक्षण की कोशिशें अधिक प्रभावी बन सकती हैं। क्योंकि बाघों की सल्तनत सिर्फ बाघों से नहीं चलती। उसके पीछे जंगल का संतुलन, प्रकृति की व्यवस्था और उन अनगिनत लोगों की मेहनत होती है, जो बिना सुर्खियों में आए इसकी सुरक्षा में जुटे रहते हैं। जंगल बचेंगे, तभी वन्यजीव बचेंगे और तभी आने वाली पीढ़ियां बाघों को उनके प्राकृतिक संसार में देख सकेंगी।

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