नैनीताल में लोगों का जीना दूभर, कैंची धाम में लगी लाखों की भीड़ पहाड़ों पर जीवन अस्त-व्यस्त, पर्यटन का दबाव बना बड़ी चुनौती

Life becomes a struggle in Nainital massive crowds throng Kainchi Dham Life in the hills thrown out of gear pressure from tourism poses a major challenge

नैनीताल में लोगों का जीना दूभर, कैंची धाम में लगी लाखों की भीड़

पहाड़ों पर जीवन अस्त-व्यस्त, पर्यटन का दबाव बना बड़ी चुनौती

नैनीताल की खूबसूरत वादियां इस वक्त सैलानियों से गुलजार हैं, लेकिन यही भीड़ पहाड़ के लोगों के लिए परेशानी का सबब बन गई है। गांधी जयंती और लंबे सप्ताहांत की छुट्टियों में नैनीताल और कैंची धाम की तरफ उमड़ी भारी भीड़ ने सड़कों की व्यवस्था की परीक्षा ले ली। करीब 12 हजार पर्यटकों की आमद के बीच नैनीताल से भवाली और कैंची धाम की ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। भवाली से कैंची धाम, गरमपानी और खैरना तक यातायात प्रभावित हुआ। नैनीताल शहर के भीतर माल रोड से हल्द्वानी रोड तक वाहन रेंगते नजर आए। कैंची धाम में भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के कारण भीमताल से कैंची धाम तक तीन घंटे से ज्यादा जाम की स्थिति बनी। इसका असर सिर्फ पर्यटकों पर नहीं पड़ा, बल्कि अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, रानीखेत, बागेश्वर और हल्द्वानी आने-जाने वाले स्थानीय यात्रियों पर भी पड़ा।

1. कैंची धाम बना आस्था से आगे का बड़ा केंद्र

कैंची धाम अब सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं रह गया है। बाबा नीम करौली से जुड़ा यह स्थान देश-दुनिया के श्रद्धालुओं के आकर्षण का बड़ा केंद्र बन चुका है। लंबे सप्ताहांत में पर्यटन और धार्मिक यात्रा एक साथ बढ़ी तो इसका सीधा दबाव सड़क पर दिखाई दिया। समस्या यह नहीं कि लोग कैंची धाम या नैनीताल क्यों जा रहे हैं। असली सवाल यह है कि क्या पहाड़ की सड़कें, पार्किंग और स्थानीय व्यवस्था एक साथ इतनी बड़ी भीड़ को संभालने के लिए तैयार हैं?

2. कुछ किलोमीटर का सफर, घंटों की परीक्षा

पहाड़ों में सड़कें मैदानी इलाकों जैसी नहीं होतीं। रास्ते सीमित हैं, सड़क की चौड़ाई सीमित है और कई जगह वैकल्पिक मार्ग भी कम हैं। ऐसे में वाहनों की संख्या अचानक बढ़ते ही पूरा यातायात तंत्र प्रभावित हो जाता है। कैंची धाम के आसपास कई घंटे तक वाहन फंसे रहे। यात्री और श्रद्धालु वाहनों में इंतजार करते रहे। कई मार्गों पर बस, टैक्सी, निजी वाहन और मालवाहक वाहन एक ही जाम में फंस गए। यानी छुट्टी मनाने निकला पर्यटक तो जाम में फंसा ही, लेकिन जिस पहाड़ पर लोगों का रोज का जीवन चलता है, उसकी रफ्तार भी थम गई।

3. पर्यटक आए, लेकिन स्थानीय जीवन रुक गया

किसी भी पर्यटन स्थल के लिए पर्यटक आर्थिक गतिविधि लेकर आते हैं। होटल, रेस्टोरेंट, टैक्सी, दुकान और स्थानीय कारोबार को फायदा मिलता है। लेकिन जब पर्यटकों की संख्या स्थानीय व्यवस्था की क्षमता से बहुत ज्यादा हो जाए तो तस्वीर बदल जाती है। स्थानीय लोगों के लिए स्कूल, दफ्तर, बाजार, अस्पताल और जरूरी काम तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है। कैंची धाम के जाम का असर दूसरे शहरों और जिलों की ओर जाने वाले यात्रियों पर भी पड़ा। गरमपानी और भीमताल के व्यापारियों ने भी जाम के कारण कारोबार प्रभावित होने की बात कही है। यानी सवाल अब यह है कि पर्यटन से होने वाली कमाई के साथ स्थानीय लोगों की सुविधा और रोजमर्रा की जिंदगी की कीमत भी तय होगी या नहीं?

4. सबसे बड़ा डर—आपातकाल में रास्ता कौन देगा?

ट्रैफिक जाम सिर्फ असुविधा नहीं है। पहाड़ों में किसी सड़क पर घंटों तक यातायात रुक जाए तो इसका असर आपात सेवाओं पर भी पड़ सकता है। बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने वाली एंबुलेंस, जरूरी सामान लेकर जाने वाले वाहन या किसी आपात स्थिति में राहत दल के लिए रास्ता कितना उपलब्ध रहेगा? यही वजह है कि पर्यटन क्षेत्रों में यातायात प्रबंधन सिर्फ पर्यटकों की सुविधा का विषय नहीं होना चाहिए। यह स्थानीय सुरक्षा और आपात व्यवस्था से भी जुड़ा सवाल है।

5. पहाड़ की भी अपनी एक सीमा है

यह संकट सिर्फ ट्रैफिक का नहीं है। इसके पीछे पहाड़ की वहन क्षमता का सवाल भी है। एक पहाड़ी शहर एक निश्चित संख्या में लोगों, वाहनों, होटल, कचरे, पानी और सीवेज का दबाव झेल सकता है। लेकिन अगर छुट्टियों के हर लंबे सप्ताहांत में पर्यटकों की संख्या अचानक कई गुना बढ़ती है, तो सड़क के साथ पानी, पार्किंग, कचरा प्रबंधन और सार्वजनिक सुविधाओं पर भी दबाव बढ़ेगा। यानी अब पर्यटन की सफलता का पैमाना सिर्फ यह नहीं हो सकता कि कितने पर्यटक आए। यह भी देखना होगा कि कितने पर्यटकों के बाद पहाड़ का सामान्य जीवन प्रभावित होने लगता है।

6. सड़क चौड़ी करने से हर समस्या हल नहीं होगी

अक्सर जाम का समाधान सड़क चौड़ी करने में देखा जाता है। लेकिन पहाड़ों में हर जगह सड़क चौड़ी करना आसान भी नहीं है और पर्यावरण की दृष्टि से हमेशा उचित भी नहीं माना जा सकता। जरूरत है पूरी व्यवस्था को दोबारा डिजाइन करने की। बाहर पार्किंग, वहां से शटल सेवा, निर्धारित समय पर प्रवेश, ऑनलाइन पंजीकरण, यातायात की वास्तविक समय निगरानी और भीड़ के हिसाब से वाहनों की संख्या नियंत्रित करने जैसे उपाय ज्यादा कारगर हो सकते हैं। प्रशासन ने लंबे सप्ताहांत के दौरान भवाली, भीमताल और कैंची धाम के लिए डायवर्जन और पार्किंग-शटल व्यवस्था लागू की थी, लेकिन जमीनी भीड़ ने यह भी दिखाया कि योजना और वास्तविक दबाव के बीच अभी बड़ा अंतर है।

7. पर्यटन चाहिए, लेकिन अनियंत्रित भीड़ नहीं

उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था में पर्यटन की बड़ी भूमिका है। नैनीताल और कैंची धाम जैसे स्थानों को पर्यटकों और श्रद्धालुओं से मिलने वाला आर्थिक लाभ भी महत्वपूर्ण है। लेकिन पर्यटन का मतलब यह नहीं हो सकता कि स्थानीय सड़कें हर छुट्टी में जाम हो जाएं और स्थानीय लोगों का जीवन ठहर जाए। अब जरूरत भीड़ बढ़ाने की नहीं, भीड़ को व्यवस्थित करने की है। कैंची धाम आने वाले श्रद्धालुओं के लिए अलग पार्किंग और शटल व्यवस्था हो सकती है। नैनीताल के लिए शहर की वहन क्षमता के हिसाब से वाहन प्रवेश को नियंत्रित किया जा सकता है। पर्यटन को अलग-अलग दिनों और क्षेत्रों में बांटने के लिए नए पर्यटन केंद्र विकसित किए जा सकते हैं।

8. पहाड़ की शांति बचाने का वक्त

नैनीताल और कैंची धाम की पहचान उनकी खूबसूरती और आध्यात्मिक शांति से है। अगर यही जगहें हर लंबे सप्ताहांत में घंटों के जाम, वाहनों के दबाव और अव्यवस्था की तस्वीर बनने लगें तो सवाल सिर्फ पर्यटन व्यवस्था का नहीं रहेगा। सवाल यह होगा कि हम पर्यटक तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन क्या पहाड़ को बचाने की क्षमता भी बढ़ा रहे हैं? पहाड़ की सड़कें सिर्फ पर्यटकों के लिए नहीं हैं। उन्हीं रास्तों से स्थानीय बच्चे स्कूल जाते हैं, कर्मचारी काम पर जाते हैं, किसान बाजार पहुंचते हैं और मरीज अस्पताल जाते हैं। इसलिए समाधान ऐसा होना चाहिए जिसमें पर्यटक भी आएं, स्थानीय अर्थव्यवस्था भी चले और पहाड़ का जीवन भी पटरी से न उतरे। नैनीताल और कैंची धाम का मौजूदा जाम एक चेतावनी की तरह है। पर्यटन बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन अगर पर्यटकों की भीड़ के कारण स्थानीय लोगों का जीवन रुक जाए तो विकास के मॉडल पर सवाल उठना स्वाभाविक है। पहाड़ को पर्यटक चाहिए, रोजगार चाहिए, धार्मिक पर्यटन चाहिए, आर्थिक गतिविधि चाहिए। लेकिन पहाड़ को अपनी सांस लेने की जगह भी चाहिए।  अब नीति का सवाल यही है— क्या हम पहाड़ पर ज्यादा लोग पहुंचाने की योजना बनाएंगे, या उतने ही लोगों को बेहतर तरीके से संभालने की व्यवस्था करेंगे? क्योंकि पहाड़ की खूबसूरती तभी बचेगी, जब वहां रहने वाले लोगों की जिंदगी भी सामान्य रहे।

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