केन-बेतवा लिंक परियोजना सिर्फ दो नदियों को जोड़ने की योजना नहीं है। यह बुंदेलखंड के भविष्य, हजारों परिवारों के पुनर्वास, पर्यावरण संरक्षण और विकास की दिशा तय करने वाली बड़ी परियोजना है। एक तरफ सरकार इसे सूखे से जूझते बुंदेलखंड के लिए उम्मीद की सबसे बड़ी परियोजनाओं में गिन रही है, तो दूसरी तरफ प्रभावित किसान और आदिवासी परिवार मुआवजे और पुनर्वास को लेकर सवाल उठा रहे हैं। यही वजह है कि केन-बेतवा परियोजना एक बार फिर सुर्खियों में है। छतरपुर और पन्ना क्षेत्र में प्रभावित परिवारों के आंदोलन ने सवाल खड़ा किया है कि क्या विकास की कीमत विस्थापित परिवारों के अधिकारों की अनदेखी करके चुकाई जा सकती है?
बुंदेलखंड की प्यास बनाम परियोजना का विरोध
बुंदेलखंड लंबे समय से अनियमित बारिश, सूखे, भूजल स्तर में गिरावट और सीमित सिंचाई सुविधाओं की समस्या से जूझता रहा है। यहां खेती का बड़ा हिस्सा मानसून पर निर्भर है। बारिश कमजोर हुई तो फसल प्रभावित होती है और ग्रामीणों के सामने रोजगार के लिए पलायन की मजबूरी खड़ी हो जाती है। सरकार का तर्क है कि केन-बेतवा परियोजना इस तस्वीर को बदल सकती है। परियोजना के जरिए केन नदी का पानी जल-संकट वाले बुंदेलखंड के इलाकों तक पहुंचाने की योजना है। दावा है कि इससे सिंचाई, पेयजल और कृषि उत्पादकता में बढ़ोतरी होगी। यानी परियोजना के समर्थकों के लिए यह सिर्फ बांध और नहर नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की अर्थव्यवस्था को बदलने की कोशिश है।
आखिर क्या है केन-बेतवा परियोजना?
केन-बेतवा देश की पहली बड़ी नदी जोड़ो परियोजना है। इसके तहत मध्यप्रदेश की केन नदी के पानी को उत्तरप्रदेश की जल-संकट वाली बेतवा नदी की ओर ले जाने की योजना है। इसमें दौधन बांध, करीब 221 किलोमीटर लंबी लिंक नहर, सुरंगें और बिजलीघर जैसी संरचनाएं शामिल हैं। परियोजना की अनुमानित लागत करीब 44,600 करोड़ रुपये बताई गई है। लक्ष्य 10 लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में सिंचाई, बुंदेलखंड के कई जिलों में पेयजल आपूर्ति और जलविद्युत उत्पादन से जुड़ा है। लेकिन इतने बड़े सपने के साथ उतनी ही बड़ी चुनौती भी है—इस परियोजना से प्रभावित होने वाले परिवारों को उनका हक कैसे और कितनी पारदर्शिता से मिलेगा?
आंदोलन के आरोप बनाम सरकार का जवाब
प्रभावित परिवारों और आंदोलनकारियों की ओर से मुआवजे में गड़बड़ी, पुनर्वास सर्वे में पात्र परिवारों के नाम छूटने और ग्रामसभा की कार्यवाही में अनियमितताओं जैसे आरोप लगाए गए हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि उनका विरोध विकास के खिलाफ नहीं है। उनकी मांग है कि विस्थापन से पहले कानून के मुताबिक पुनर्वास और मुआवजा सुनिश्चित किया जाए। कांग्रेस ने भी विधानसभा में इन आरोपों को उठाया है। विपक्ष की ओर से मुआवजा और पुनर्वास से जुड़े मामलों में करीब 400 करोड़ रुपये की कथित अनियमितताओं का आरोप लगाया गया है। हालांकि, इन आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है। दूसरी तरफ मध्यप्रदेश सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोपों को खारिज किया है। सरकार के मुताबिक पात्र परिवारों के लिए पुनर्वास पैकेज स्वीकृत किए गए हैं और जहां पात्र परिवारों के नाम छूटने की शिकायतें आईं, वहां दोबारा सर्वे कराया गया। सरकार के अनुसार छतरपुर में पहले 3,080 परिवारों के लिए लाभ स्वीकृत था और बाद के सर्वे में 638 अतिरिक्त पात्र परिवारों को भी निर्धारित राशि स्वीकृत की गई। यानी सरकार का दावा है कि शिकायतों को नजरअंदाज नहीं किया गया, बल्कि दोबारा जांच करके पात्र लोगों को शामिल किया गया।
असली परीक्षा सिर्फ मुआवजे की नहीं
केन-बेतवा परियोजना की चुनौती केवल पुनर्वास और मुआवजे तक सीमित नहीं है। इसका सबसे बड़ा पर्यावरणीय सवाल पन्ना टाइगर रिजर्व से जुड़ा है। दौधन बांध के कारण पन्ना के जंगल और वन्यजीव क्षेत्र पर असर पड़ने को लेकर पर्यावरणविदों ने चिंता जताई है। वन क्षेत्र के डूबने, वन्यजीवों के आवास के प्रभावित होने और प्राकृतिक नदी प्रवाह में बदलाव जैसे सवाल लगातार उठते रहे हैं। बाघों के अलावा गिद्ध, घड़ियाल और दूसरी संरक्षित प्रजातियों पर संभावित प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई गई है। दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि परियोजना में पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय, वन्यजीव प्रबंधन योजना और प्रतिपूरक वनीकरण जैसे प्रावधान शामिल किए गए हैं। यहां एक और बड़ा सवाल है—क्या भविष्य में जलवायु परिवर्तन और बारिश के बदलते पैटर्न के बीच केन नदी में पर्याप्त अतिरिक्त पानी उपलब्ध रहेगा? पर्यावरण विशेषज्ञ इसी बिंदु पर परियोजना की दीर्घकालिक उपयोगिता को लेकर सवाल उठाते हैं।
चार दशक की देरी के बाद अब असली चुनौती
केन-बेतवा परियोजना का विचार करीब चार दशक पुराना है। मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के बीच पानी के बंटवारे का विवाद, पर्यावरणीय और वन्यजीव मंजूरियां, जमीन अधिग्रहण, पुनर्वास और कानूनी प्रक्रियाओं के कारण परियोजना लंबे समय तक अटकी रही। 2021 में दोनों राज्यों के बीच समझौते और इसके बाद केंद्र की मंजूरी के साथ परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हुआ। अब जब परियोजना जमीन पर आगे बढ़ रही है, तो उसकी सबसे बड़ी कसौटी यही है कि विकास का लाभ जिन लोगों तक पहुंचाने का दावा किया जा रहा है, कहीं वही लोग विकास की कीमत तो नहीं चुका रहे? बुंदेलखंड को पानी चाहिए। किसानों को सिंचाई चाहिए। गांवों को रोजगार और पेयजल चाहिए। लेकिन जिन परिवारों की जमीन, घर और आजीविका परियोजना के कारण प्रभावित हो रही है, उन्हें भी न्यायपूर्ण पुनर्वास और पारदर्शी मुआवजे का अधिकार है। इसलिए केन-बेतवा परियोजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि कितने हेक्टेयर में सिंचाई पहुंची या कितने गांवों को पानी मिला। सफलता का असली पैमाना यह भी होगा कि विकास की इस यात्रा में विस्थापित परिवारों को कितना न्याय मिला, पर्यावरण की कितनी रक्षा हुई और सरकार अपने वादों को जमीन पर कितनी पारदर्शिता से पूरा कर पाई। अगर यह संतुलन कायम होता है, तो केन-बेतवा परियोजना सिर्फ बुंदेलखंड के लिए पानी की परियोजना नहीं रहेगी, बल्कि भारत में विकास, पर्यावरण और प्रभावित समुदायों के अधिकारों के बीच संतुलन का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकती है।




