कहाँ हैं केजरीवाल?…कभी सत्ता के सुपरस्टार, आज सियासत के सबसे बड़े सवाल

Kejriwal

दिल्ली की राजनीति में एक दौर था जब अरविंद केजरीवाल सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि एक आंदोलन का नाम थे।
एंटी करप्शन आंदोलन से निकला एक साधारण सा दिखने वाला आदमी देश की सबसे ताकतवर राजनीतिक पार्टियों को चुनौती दे रहा था। लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। कभी दिल्ली की राजनीति पर पूरी तरह छाए रहने वाले केजरीवाल आज खुद राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ते दिखाई दे रहे हैं। दिल्ली की सत्ता हाथ से जा चुकी है, पार्टी लगातार दबाव में है, बड़े नेता असहज दिख रहे हैं और कानूनी लड़ाइयों ने उनकी राजनीति को घेरे रखा है।

एक समय था जब केजरीवाल सवाल पूछते थे।
आज सबसे बड़ा सवाल खुद वही बन गए हैं —
आखिर आज केजरीवाल हैं कहाँ?

दिल्ली गई, चमक गई?

दिल्ली कभी अरविंद केजरीवाल का अभेद्य किला मानी जाती थी। मुफ्त बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य मॉडल ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा चेहरा बना दिया था। लेकिन सत्ता जाने के बाद अब वही केजरीवाल रक्षात्मक राजनीति करते दिखाई दे रहे हैं। जो नेता कभी “नई राजनीति” की बात करता था, आज वही खुद लगातार सफाई देने की राजनीति में फंसा नजर आता है।

अदालत, आरोप और आक्रामक बीजेपी

दिल्ली शराब नीति मामला अभी भी केजरीवाल की राजनीति का पीछा नहीं छोड़ रहा। भले ही निचली अदालत से राहत मिली हो, लेकिन कानूनी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। बीजेपी लगातार उन्हें भ्रष्टाचार के मुद्दे पर घेर रही है। वहीं केजरीवाल इसे राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताते रहे हैं। लेकिन जनता के बीच सवाल अब सिर्फ कानूनी नहीं, नैतिक भी बन चुका है।
जो राजनीति “ईमानदारी” के नाम पर शुरू हुई थी, क्या वही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई?

पार्टी में सब ठीक है?

आम आदमी पार्टी अब सिर्फ एक आंदोलनकारी पार्टी नहीं रही। सत्ता में आने के बाद उसके भीतर भी वही समस्याएं दिखने लगीं जिनके खिलाफ वह पैदा हुई थी। नेताओं की नाराजगी, अंदरूनी असहमति और लगातार राजनीतिक दबाव ने पार्टी को कमजोर किया है। कई पुराने चेहरे अब पहले जैसी ऊर्जा के साथ नजर नहीं आते।

क्या खत्म हो गए हैं केजरीवाल? शायद नहीं।

भारतीय राजनीति ने कई बार ऐसे नेताओं को वापसी करते देखा है जिन्हें लोग खत्म मान चुके थे। और केजरीवाल की सबसे बड़ी ताकत हमेशा रही है — खुद को नए रूप में पेश करने की क्षमता। वह अब भी एक शानदार वक्ता हैं। उनकी राजनीति अब भी शहरी गरीब और मध्यवर्ग के बीच असर रखती है। और बीजेपी विरोधी राजनीति में उनका नाम अब भी महत्वपूर्ण है।

असली चुनौती अब शुरू

कभी केजरीवाल “सिस्टम के खिलाफ” राजनीति करते थे। अब उन्हें खुद यह साबित करना है कि वे सिर्फ विरोध की राजनीति नहीं, बल्कि संकट से बाहर निकलने की राजनीति भी कर सकते हैं। आज केजरीवाल एक चौराहे पर खड़े हैं। एक रास्ता उन्हें धीरे-धीरे राजनीतिक हाशिये की ओर ले जा सकता है। दूसरा रास्ता उन्हें फिर से राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा खिलाड़ी बना सकता है। लेकिन फिलहाल इतना तय है — भारतीय राजनीति में अरविंद केजरीवाल की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।

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