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जगद्गुरु रामभद्राचार्य वर्सेस संत प्रेमानंद महाराज: “विद्वान नहीं, बालक समान हैं प्रेमानंद” – रामभद्राचार्य के बयान पर संत समाज और श्रद्धालुओं में नाराज़गी

DigitalDesk by DigitalDesk
August 25, 2025
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Jagadguru Rambhadracharya vs Saint Premanand Maharaj Premanand is not a scholar he is like a child
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जगद्गुरु रामभद्राचार्य वर्सेस संत प्रेमानंद महाराज
“विद्वान नहीं, बालक समान हैं प्रेमानंद” – रामभद्राचार्य के बयान पर संत समाज और श्रद्धालुओं में नाराज़गी

जगद्गुरु रामभद्राचार्य बनाम संत प्रेमानंद महाराज – विद्वता और भक्ति की टकराहट ने मचाया संग्राम

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मथुरा-वृंदावन की पावन भूमि हमेशा से संतों, साधुओं और भक्ति परंपरा का केंद्र रही है। यहां के संतों के प्रवचन और भक्ति ने लाखों-करोड़ों लोगों के जीवन को दिशा दी है। ऐसे ही संतों में प्रेमानंद महाराज का नाम प्रमुख है। जिनकी आस्था, तप और भक्ति से आज बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक प्रभावित होते हैं। लेकिन हाल ही में जगद्गुरु रामभद्राचार्य द्वारा दिए गए एक बयान ने संत समाज में हलचल मचा दी है।

रामभद्राचार्य ने प्रेमानंद महाराज को न तो विद्वान बताया और न ही चमत्कारी, बल्कि उन्हें बालक की तरह करार दिया। यही नहीं, उन्होंने यह भी चुनौती दी कि यदि प्रेमानंद में कोई शक्ति है तो वे उनके सामने संस्कृत का एक अक्षर बोलकर या संस्कृत के एक श्लोक का अर्थ समझाकर दिखा दें।

विवादित बयान और उसकी पृष्ठभूमि

दरअसल, एक यूट्यूब चैनल को दिए गए इंटरव्यू में रामभद्राचार्य से सवाल पूछा गया कि सोशल मीडिया पर प्रेमानंद महाराज को चमत्कारी संत कहा जाता है, इस पर उनकी क्या राय है। इस पर रामभद्राचार्य ने बेहद तीखे शब्दों में कहा कोई चमत्कार नहीं है। यदि प्रेमानंद महाराज में शक्ति है तो वे मेरे सामने संस्कृत का एक अक्षर बोल दें या शास्त्रों का अर्थ समझा दें। मैं स्पष्ट कहता हूं कि वे विद्वान नहीं हैं। चमत्कारी नहीं हैं, बल्कि मेरे बालक जैसे हैं। मैं उनसे द्वेष नहीं रखता, लेकिन मैं उन्हें न विद्वान मानता हूं, न साधक और न ही चमत्कारी।
इस बयान के सामने आते ही संत समाज और भक्तों में खलबली मच गई।

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया

जगद्गुरु रामभद्राचार्य का बयान का वीडियो जैसे ही वायरल हुआ, सोशल मीडिया पर भक्तों ने अपनी अपनी प्रतिक्रिया दी। सोशल मीडिया पर एक यूजर ने लिखा है कि “प्रेमानंद महाराज आज के मौजूदा समय के सच्चे संत और महापुरुष हैं। उनके खिलाफ एक शब्द भी मंजूर नहीं होगा। वहीं दूसरे ने लिखा – “माफ करना गुरुदेव, पर आपके व्यक्तित्व में केवल अहंकार झलक रहा है।” एक और भक्त ने कहा – “हमारे भगवान संस्कृत शास्त्रों से नहीं, बल्कि प्रेम भाव से रिझते हैं।” वहीं, कुछ लोगों ने संत प्रेमानंद को “भक्ति और तप का प्रतीक” बताते हुए रामभद्राचार्य की आलोचना की।

प्रेमानंद महाराज की पहचान

प्रेमानंद महाराज को आज किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। मथुरा-वृंदावन क्षेत्र में उनका आशीर्वाद लेने हजारों लोग पहुंचते हैं। वह पिछले 19 वर्षों से गंभीर किडनी रोग से जूझने के बाद भी वे प्रतिदिन परिक्रमा कर अपने अनुयायियों को दर्शन देते हैं। इतना ही नहीं प्रेमानंद जी महाराज की साधना और तप के चलते लाखों लोग उन्हें श्रद्धा भरी नजरों से देखते हैं। प्रेमानंद जी महाराज के भजन और प्रवचन इन दिनों सोशल मीडिया पर बहुत अधिक लोकप्रिय हैं। उनके अनुयायी मानते हैं कि प्रेमानंद महाराज का सबसे बड़ा चमत्कार उनका भक्ति मार्ग पर अडिग रहना है। यही वजह है कि भक्त उन्हें विद्वता से नहीं, बल्कि भक्ति और प्रेम से जोड़कर देखते हैं।

जगद्गुरु रामभद्राचार्य कौन हैं?

रामभद्राचार्य संस्कृत जगत के प्रसिद्ध विद्वान और संत माने जाते हैं।
वे नेत्रहीन होते हुए भी चार वेद, उपनिषद, पुराण और रामायण पर गहरी पकड़ रखते हैं। उन्हें संस्कृत व्याकरण और शास्त्रों का जीवंत कोश कहा जाता है। रामकथा के महान व्याख्याता होने के कारण उनके अनुयायी उन्हें जगद्गुरु की संज्ञा देते हैं। इस पृष्ठभूमि को देखते हुए जब उन्होंने प्रेमानंद महाराज की विद्वता पर सवाल उठाया तो विवाद और भी गहरा गया।

विवाद का असली मुद्दा

अब सवाल यह है कि संत की पहचान आखिर किससे होती है क्या केवल संस्कृत और शास्त्रों के गहन ज्ञान से कोई संत कहलाता है? या फिर भक्ति, आस्था और प्रेम की राह पर चलने वाला साधक ही असली महापुरुष होता है? रामभद्राचार्य का तर्क है कि शास्त्रों की विद्वता ही असली चमत्कार है। वहीं, प्रेमानंद महाराज के भक्त कहते हैं कि “भगवान प्रेम से रिझते हैं, न कि संस्कृत के कठिन श्लोकों से।”

क्या संत की पहचान विद्वता और संस्कृत ज्ञान से होनी चाहिए या प्रेम-भक्ति से?
प्रेमानंद महाराज को चमत्कारी मानना आस्था है या अंधविश्वास?
क्या रामभद्राचार्य का बयान अहंकार का प्रतीक है या विद्वता का आत्मविश्वास?
क्या ऐसे विवाद हिंदू समाज में विभाजन पैदा करते हैं या यह विचार मंथन का अवसर है?
क्या भक्तों की नजर में विद्वता की अहमियत भक्ति से कम है?

मथुरा-वृंदावन की गलियों में यह विवाद अब हर किसी की जुबान पर है। एक ओर जगद्गुरु रामभद्राचार्य का गहन शास्त्रीय ज्ञान है, तो दूसरी ओर प्रेमानंद महाराज की सरल भक्ति और आस्था। सवाल यही है कि आस्था और अध्यात्म की राह में बड़ा क्या है – विद्वता की गहराई या प्रेम की सादगी? भक्तों की नजर में शायद इसका जवाब आसान है – ईश्वर को पाना कठिन संस्कृत शब्दों से नहीं, बल्कि सच्चे प्रेम से संभव है। प्रकाश कुमार पांडेय

Post Views: 532
Tags: #Anger among saints#Jagadguru Rambhadracharya vs Saint Premanand Maharaj#Premanand like a child#Rambhadracharya statement
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