मल्टी-लेयर इम्पैक्ट” …ईरान जंग से सप्लाई-चेन पर असर… तेल के साथ संकट में खाद-हीलियम
नई दिल्ली। मध्य पूर्व में जारी मिडिल ईस्ट तनाव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित करना शुरू कर दिया है। ईरान से जुड़े युद्ध हालात अब केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं रहे, बल्कि इसका असर खेती से लेकर टेक्नोलॉजी सेक्टर तक फैल गया है। सप्लाई-चेन पर दबाव बढ़ने के कारण खाद (यूरिया) और टेक इंडस्ट्री के लिए जरूरी हीलियम की उपलब्धता भी संकट में आ गई है।
इस पूरे संकट का केंद्र होर्मुज स्ट्रेट है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक स्तर पर तेल और गैस का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। लेकिन युद्ध के कारण इस मार्ग में बाधा उत्पन्न होने से न केवल ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हुई है, बल्कि अन्य महत्वपूर्ण संसाधनों की आवाजाही भी प्रभावित हो रही है।
तेल की कीमतों में तेज उछाल इस संकट का पहला बड़ा संकेत है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने लगे हैं, जिससे दुनियाभर में महंगाई बढ़ने की आशंका गहरा गई है। लेकिन इस बार संकट की कहानी सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस युद्ध का सबसे बड़ा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ रहा है। दुनिया में इस्तेमाल होने वाली यूरिया खाद का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से निर्यात होता है और इसका एक प्रमुख मार्ग होर्मुज स्ट्रेट ही है। सप्लाई बाधित होने के कारण यूरिया की कीमतों में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। रिपोर्टों के मुताबिक, पिछले साल की तुलना में इसकी कीमतें करीब 60 प्रतिशत तक बढ़ चुकी हैं। इससे किसानों की लागत बढ़ेगी और अंततः खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर भी असर पड़ेगा।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह स्थिति और गंभीर हो सकती है। यदि खाद की उपलब्धता प्रभावित होती है, तो रबी और खरीफ दोनों सीजन की तैयारी पर असर पड़ेगा। इससे उत्पादन में गिरावट और महंगाई में बढ़ोतरी की आशंका है। पहले से ही मौसम की मार झेल रहे किसानों के लिए यह एक और बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है। वहीं, टेक्नोलॉजी सेक्टर भी इस संकट से अछूता नहीं है। हीलियम, जो सेमीकंडक्टर निर्माण, मेडिकल उपकरणों और अंतरिक्ष अनुसंधान में बेहद महत्वपूर्ण गैस है, उसकी सप्लाई भी प्रभावित हो रही है। खाड़ी क्षेत्र हीलियम उत्पादन का एक प्रमुख केंद्र है और यहां से इसकी आपूर्ति में बाधा आने से वैश्विक टेक इंडस्ट्री पर दबाव बढ़ सकता है।
सेमीकंडक्टर निर्माण में हीलियम का उपयोग चिप निर्माण प्रक्रिया को स्थिर रखने के लिए किया जाता है। ऐसे में इसकी कमी से पहले से ही दबाव में चल रही चिप इंडस्ट्री को और झटका लग सकता है। इसका असर स्मार्टफोन, कंप्यूटर, ऑटोमोबाइल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की कीमतों और उपलब्धता पर भी पड़ सकता है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट “मल्टी-लेयर इम्पैक्ट” वाला है, जहां एक ही घटना कई क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है। ऊर्जा, कृषि और तकनीक—तीनों क्षेत्रों में एक साथ दबाव बढ़ने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर पड़ सकता है।
इस स्थिति में सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सप्लाई-चेन को स्थिर बनाए रखने की है। वैकल्पिक मार्गों और स्रोतों की तलाश की जा रही है, लेकिन होर्मुज स्ट्रेट जैसा रणनीतिक मार्ग आसानी से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। कुल मिलाकर, ईरान से जुड़े युद्ध ने यह साफ कर दिया है कि आधुनिक दुनिया में किसी एक क्षेत्र में पैदा हुआ संकट कितनी तेजी से वैश्विक स्तर पर असर डाल सकता है। तेल की बढ़ती कीमतों से शुरू हुआ यह संकट अब खेतों, फैक्ट्रियों और टेक्नोलॉजी सेक्टर तक पहुंच चुका है। आने वाले दिनों में यदि हालात नहीं सुधरे, तो इसका असर आम लोगों की थाली से लेकर डिजिटल दुनिया तक गहराई से महसूस किया जा सकता है