देशभर में बढ़ती भीषण गर्मी और लगातार चल रही लू अब किसानों की चिंता बढ़ाने लगी है। तापमान में लगातार हो रही बढ़ोतरी का असर सीधे फसलों पर दिखाई देने लगा है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसानों ने समय रहते सही प्रबंधन नहीं किया तो हरी-भरी फसलें झुलस सकती हैं और भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। ऐसे में खेतों को बचाने के लिए आधुनिक सिंचाई तकनीक और वैज्ञानिक उपाय अपनाना बेहद जरूरी हो गया है।
- भीषण गर्मी से फसलों पर संकट
- ड्रिप सिंचाई बनेगी किसानों का सहारा
- लू से बचाव को अपनाएं मल्चिंग
- ग्रीन नेट से सुरक्षित रहेंगी फसलें
- खेतों की मेढ़ पर लगाएं पेड़
- पोटाश और जैविक खाद का बढ़ाएं उपयोग
- समय रहते सावधानी से बचेगा नुकसान
भीषण गर्मी फसलों पर बनेगी बड़ा खतरा समय रहते इंतजाम नहीं किए तो खेत हो सकते हैं बर्बाद
विशेषज्ञों के मुताबिक गर्मी के मौसम में फसलों को सबसे ज्यादा जरूरत पर्याप्त नमी और संतुलित पोषण की होती है। पारंपरिक सिंचाई पद्धति के बजाय अब किसानों को ड्रिप और स्प्रिंकलर इरिगेशन जैसी आधुनिक तकनीकों का सहारा लेना चाहिए। इससे पानी की बचत होती है और पौधों की जड़ों तक सीधे आवश्यक मात्रा में पानी पहुंचता है। तेज धूप और गर्म हवाओं के बीच यह तकनीक फसलों को सूखने से बचाने में काफी प्रभावी मानी जा रही है।
ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम बने सहारा
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि ड्रिप इरिगेशन तकनीक पौधों की जड़ों तक बूंद-बूंद पानी पहुंचाती है, जिससे नमी लंबे समय तक बनी रहती है। वहीं स्प्रिंकलर सिस्टम खेतों में फव्वारे की तरह पानी का छिड़काव करता है, जिससे तापमान का असर कम होता है और पौधों को ठंडक मिलती है।
विशेषज्ञों के अनुसार इन तकनीकों से पानी की बर्बादी भी काफी कम होती है। खासकर उन इलाकों में जहां पानी की कमी है, वहां यह तकनीक किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती है।
मल्चिंग तकनीक बनेगी सुरक्षा कवच
भीषण गर्मी से फसलों को बचाने के लिए मल्चिंग तकनीक को भी बेहद कारगर माना जा रहा है। इसमें फसल के आसपास की मिट्टी को सूखी घास, पुआल या प्लास्टिक शीट से ढक दिया जाता है। इससे जमीन के अंदर की नमी लंबे समय तक सुरक्षित रहती है और धूप के कारण पानी तेजी से नहीं सूखता।
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि मल्चिंग से न सिर्फ पानी की जरूरत कम होती है बल्कि खरपतवार भी कम उगते हैं। इससे किसानों की मेहनत और लागत दोनों में कमी आती है।
ग्रीन नेट से मिलेगी राहत
यदि किसान पत्तेदार सब्जियां, नर्सरी या विदेशी सब्जियों की खेती कर रहे हैं तो उन्हें ग्रीन नेट का उपयोग करना चाहिए। पालक, धनिया, ब्रोकली, चेरी टमाटर जैसी फसलें तेज धूप में जल्दी प्रभावित होती हैं। ऐसे में ग्रीन नेट पौधों को सीधे सूर्य की किरणों से बचाने में मदद करता है।
विशेषज्ञों के अनुसार ग्रीन नेट लगाने से खेत का तापमान नियंत्रित रहता है और पौधों की बढ़वार बेहतर होती है। इससे उत्पादन की गुणवत्ता भी प्रभावित नहीं होती।
पेड़ बनेंगे प्राकृतिक सुरक्षा दीवार
खेतों की मेढ़ों पर ऊंचे और घने पेड़ लगाना भी गर्म हवाओं से बचाव का प्रभावी तरीका माना जा रहा है। ये पेड़ प्राकृतिक विंडब्रेकर का काम करते हैं और लू की तेज रफ्तार को कम कर देते हैं।
कृषि जानकारों का कहना है कि इससे खेत का माइक्रोक्लाइमेट संतुलित बना रहता है और फसलें झुलसने से बच जाती हैं। नीम, शीशम और करंज जैसे पेड़ इस काम के लिए उपयोगी माने जाते हैं।
जैविक खाद बढ़ाएगी फसल की ताकत
विशेषज्ञों का मानना है कि गर्मी के मौसम में फसलों को अतिरिक्त पोषण की जरूरत होती है। ऐसे में किसानों को रासायनिक खादों के बजाय जैविक और पोटाश युक्त खादों का अधिक उपयोग करना चाहिए।
पोटाश पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और उन्हें गर्मी व सूखे जैसी परिस्थितियों से लड़ने की ताकत देता है। वहीं जैविक खाद मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में मदद करती है।
किसानों को दी गई सतर्क रहने की सलाह
कृषि विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि वे मौसम विभाग की चेतावनियों पर लगातार नजर रखें और फसलों की नियमित निगरानी करें। खेतों में सुबह या शाम के समय सिंचाई करना ज्यादा फायदेमंद माना जा रहा है, क्योंकि दोपहर में पानी जल्दी वाष्पित हो जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि सही तकनीक और समय पर सावधानी अपनाकर किसान अपनी फसलों को भीषण गर्मी और लू से बचा सकते हैं।





