इंस्टाग्राम पर कथित तौर पर बाल यौन शोषण सामग्री (CSAM) तक पहुंच बनाने वाले पेड विज्ञापनों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। मामला सामने आने के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और दिल्ली पुलिस से कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। फिलहाल पूरे मामले की जांच होनी बाकी है, लेकिन इसने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की विज्ञापन जांच व्यवस्था और जवाबदेही पर बड़ी बहस छेड़ दी है।
पेड विज्ञापन और सामान्य पोस्ट में बड़ा अंतर, क्योंकि विज्ञापन को प्लेटफॉर्म की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है
इंस्टाग्राम पर हर दिन बड़ी संख्या में फोटो, वीडियो, रील और दूसरे कंटेंट अपलोड होते हैं। प्लेटफॉर्म के लिए हर पोस्ट की पहले से जांच करना मुश्किल हो सकता है। लेकिन पेड विज्ञापन का मामला अलग है। विज्ञापनदाता पैसे देकर किसी सामग्री को लोगों तक पहुंचाता है और प्लेटफॉर्म अपनी व्यवस्था के जरिए उसे चुनिंदा यूजर्स तक पहुंचाता है। ऐसे में अगर किसी विज्ञापन में गैरकानूनी सामग्री होने का आरोप सामने आता है, तो सवाल सिर्फ कंटेंट हटाने का नहीं रहता, बल्कि यह भी पूछा जाता है कि वह विज्ञापन शुरुआती जांच में पास कैसे हुआ।
बच्चों से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री को सामान्य कंटेंट मानना सबसे गंभीर गलती, पीड़ितों की सुरक्षा होनी चाहिए पहली प्राथमिकता
बाल यौन शोषण सामग्री कोई सामान्य सोशल मीडिया उल्लंघन नहीं है। इसके पीछे बच्चों की गरिमा, सुरक्षा और निजता से जुड़ा गंभीर नुकसान होता है। ऐसी सामग्री का दोबारा प्रसारित होना पीड़ितों के लिए नुकसान को और बढ़ा सकता है। इसलिए किसी संदिग्ध सामग्री को हटाने के साथ उसके स्रोत की पहचान, डिजिटल सबूतों को सुरक्षित रखने और पीड़ित बच्चों को जरूरी सहायता उपलब्ध कराने पर भी ध्यान देना जरूरी है। मामले की चर्चा करते समय भी ऐसी सामग्री को दोहराने या सनसनीखेज बनाने से बचना चाहिए।
AI से विज्ञापन जांच के बावजूद इंसानी निगरानी जरूरी, क्योंकि गलत इरादे वाले लोग सिस्टम को चकमा दे सकते हैं
बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म विज्ञापनों की जांच के लिए ऑटोमेटेड सिस्टम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करते हैं। इनमें विज्ञापन की तस्वीर, टेक्स्ट, लिंक और विज्ञापनदाता की गतिविधियों जैसी चीजों का विश्लेषण किया जा सकता है। लेकिन प्रतिबंधित सामग्री फैलाने वाले लोग इन तकनीकी जांचों से बचने के तरीके भी तलाशते हैं। इसलिए संवेदनशील मामलों में मानव समीक्षा, विज्ञापनदाता की पहचान की जांच और विज्ञापन हटने के बाद भी लगातार निगरानी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
प्लेटफॉर्म खुद को केवल मध्यस्थ बताता है तो भी पेड प्रमोशन में उसकी भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है
सोशल मीडिया कंपनियां अक्सर खुद को यूजर्स द्वारा तैयार सामग्री उपलब्ध कराने वाला डिजिटल माध्यम बताती हैं। लेकिन प्लेटफॉर्म के एल्गोरिदम यह तय करते हैं कि कौन-सा कंटेंट किस यूजर तक पहुंचेगा। पेड विज्ञापन में कंपनी को सीधे तौर पर उसे वितरित करने से कमाई भी होती है। इसका मतलब यह नहीं कि केवल आरोप के आधार पर प्लेटफॉर्म को कानूनी रूप से दोषी माना जाए, लेकिन विज्ञापन स्वीकार करने, उसे दिखाने और उससे राजस्व कमाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सवाल जरूर उठते हैं।
सिर्फ विज्ञापन हटाना काफी नहीं, जांच एजेंसियों और प्लेटफॉर्म को मिलकर पूरी कड़ी तक पहुंचना होगा
भारत में बच्चों से जुड़ी यौन शोषण सामग्री के निर्माण, रखने और प्रसार पर कानूनी रोक है। ऐसे मामलों में विज्ञापन हटाना शुरुआती कदम है, अंतिम कार्रवाई नहीं। यह पता लगाना जरूरी है कि विज्ञापन किसने बनाया, भुगतान किस तरह हुआ और क्या इसी तरह के अन्य विज्ञापन भी चलाए गए। प्लेटफॉर्म को संबंधित डिजिटल रिकॉर्ड सुरक्षित रखने चाहिए, ताकि जांच एजेंसियां आरोपियों तक पहुंच सकें। साथ ही यूजर्स को ऐसी सामग्री मिलने पर उसे डाउनलोड या शेयर करने के बजाय तुरंत रिपोर्ट करना चाहिए। बच्चों की सुरक्षा के मामले में ‘सिस्टम फेल हो गया’ जवाबदेही का अंतिम उत्तर नहीं हो सकता।





