रुपये ने तोड़ा पुराना रिकॉर्ड, बाजार में चिंता बढ़ी
भारतीय करेंसी में गुरुवार को बड़ी गिरावट दर्ज की गई और रुपया डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 96.32 पर पहुंच गया। दिनभर के कारोबार में यह करीब 0.5% तक कमजोर हुआ और मार्च के अंत में बने पिछले रिकॉर्ड 95.21 को भी पार कर गया। अचानक आई इस गिरावट ने बाजार में अस्थिरता बढ़ा दी है और निवेशकों के बीच चिंता का माहौल बना दिया है, क्योंकि लगातार गिरता रुपया देश की आर्थिक सेहत पर भी असर डालता है।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल बना मुख्य वजह, आयात बिल बढ़ने का खतरा
रुपये की कमजोरी के पीछे सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल को माना जा रहा है। ब्रेंट क्रूड करीब 126 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया है, जो चार साल का उच्चतम स्तर है। भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील है, क्योंकि महंगा तेल सीधे तौर पर आयात बिल बढ़ाता है और इससे महंगाई तथा आर्थिक संतुलन दोनों पर दबाव पड़ता है।
एशियाई करेंसी पर भी दबाव, विदेशी निवेशकों की निकासी ने बढ़ाई मुश्किलें
केवल भारत ही नहीं, बल्कि एशिया की कई अन्य मुद्राएं भी दबाव में हैं। इंडोनेशियाई रुपिया, फिलिपीनी पेसो और थाई बहत में भी कमजोरी देखी गई है। विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) लगातार पैसा निकाल रहे हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ रही है और रुपये पर अतिरिक्त दबाव बन रहा है। अप्रैल महीने में ही बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश बाहर गया है, जिससे बाजार की स्थिति और नाजुक हो गई है।
एक्सपर्ट की चेतावनी: 96 के पार टिके तो 97 तक जा सकता है रुपया
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा हालात जारी रहे और कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो रुपया 96 के ऊपर टिककर 97 के स्तर की ओर बढ़ सकता है। वहीं, 94.80 को फिलहाल अहम सपोर्ट माना जा रहा है। अगर तेल की कीमतों में गिरावट नहीं आती, तो रुपये में सुधार की संभावना सीमित ही नजर आती है।
नजरें ग्लोबल हालात और तेल बाजार पर टिकीं
विश्लेषकों के अनुसार, रुपया फिलहाल पूरी तरह ग्लोबल फैक्टर्स—खासकर तेल कीमतों और जियोपॉलिटिकल हालात—पर निर्भर है। यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव कम होता है और तेल सस्ता होता है, तभी रुपये को राहत मिल सकती है। फिलहाल बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है और निवेशक सतर्क रुख अपना रहे हैं।





