UNSC सुधार पर भारत का कड़ा रुख: “वीटो के बिना सुधार अधूरा”….

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UNSC सुधार पर भारत का कड़ा रुख: “वीटो के बिना सुधार अधूरा”

संयुक्त राष्ट्र में भारत ने एक बार फिर वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत आवाज उठाते हुए साफ कर दिया है कि यदि सुरक्षा परिषद (UNSC) में वास्तविक सुधार करना है, तो केवल अस्थायी बदलाव नहीं बल्कि संरचनात्मक परिवर्तन जरूरी हैं। भारत का कहना है कि बिना स्थायी सदस्यता के विस्तार और वीटो अधिकार के सुधार के, UNSC में संतुलन और निष्पक्षता संभव नहीं है।

  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को बताया पुराना और असंतुलित
  • स्थायी सदस्यता के साथ वीटो अधिकार बढ़ाने की मांग
  • भारत ने कहा—वर्तमान ढांचा 21वीं सदी के अनुरूप नहीं
  • UNSC में स्थायी सीट के लिए भारत का मजबूत दावा

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वथानेनी हरीश ने इंटर-गवर्नमेंटल नेगोशिएशंस (IGN) की बैठक में यह स्पष्ट किया कि मौजूदा सुरक्षा परिषद की संरचना असंतुलित है और इसमें सुधार की तत्काल आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि परिषद की विश्वसनीयता और प्रतिनिधित्व पर सवाल उठते रहे हैं, क्योंकि इसकी संरचना आज की वैश्विक राजनीतिक वास्तविकताओं से मेल नहीं खाती।

भारत ने अपने तर्क में दो प्रमुख मुद्दों को सामने रखा—पहला, सदस्य देशों की संख्या और दूसरा, वीटो पावर। हरीश ने कहा कि यही दोनों कारण UNSC को असंतुलित बनाते हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि 80 साल पहले तैयार की गई यह संरचना अब 21वीं सदी की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रही है।

भारत ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए बताया कि 1960 के दशक में सुरक्षा परिषद में जो एकमात्र बड़ा सुधार हुआ था, उसमें केवल अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई थी। उस समय स्थायी और अस्थायी सदस्यों का अनुपात 5:6 था, जिसे बदलकर 5:10 कर दिया गया। इससे वीटो अधिकार रखने वाले देशों की ताकत और बढ़ गई। भारत का कहना है कि अगर अब भी सुधार के नाम पर केवल अस्थायी सीटें बढ़ाई जाती हैं, तो यह असंतुलन और बढ़ेगा।

भारत ने साफ तौर पर कहा कि स्थायी सदस्यता में विस्तार और वीटो अधिकार का समावेश ही वास्तविक सुधार का आधार हो सकता है। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो UNSC में असमानता और अन्याय की स्थिति बनी रहेगी।

इसके साथ ही भारत ने एक नए सदस्य वर्ग बनाने के प्रस्ताव पर भी सवाल उठाए। हरीश ने कहा कि नई श्रेणी बनाना, चाहे उसमें वीटो हो या न हो, पहले से जटिल चर्चा को और उलझा देगा। उन्होंने सुझाव दिया कि सुधार की प्रक्रिया को सरल और प्रभावी बनाने के लिए मौजूदा ढांचे के भीतर ही बदलाव किए जाएं।

भारत लंबे समय से UNSC में सुधार और विस्तार की मांग करता रहा है। भारत का तर्क है कि 1945 में गठित 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद आज के वैश्विक परिदृश्य को प्रतिबिंबित नहीं करती। दुनिया में कई नए शक्ति केंद्र उभर चुके हैं, लेकिन UNSC में उनकी उचित भागीदारी नहीं है।

भारत ने यह भी दोहराया कि उसे सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता मिलनी चाहिए, क्योंकि वह वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और शांति स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारत का मानना है कि उसका प्रतिनिधित्व न केवल उचित है बल्कि जरूरी भी है।

इसके अलावा भारत ने “इफेक्टिव वीटो” यानी प्रभावी वीटो के मुद्दे को भी उठाया। भारत ने कहा कि केवल स्थायी सदस्य ही नहीं, बल्कि अस्थायी सदस्य भी कई बार परिषद के प्रस्तावों और बयानों को रोकने की स्थिति में होते हैं। इससे निर्णय प्रक्रिया प्रभावित होती है और कई बार वैश्विक हितों के बजाय व्यक्तिगत या राष्ट्रीय हित हावी हो जाते हैं।

भारत ने 2022 में पारित उस प्रस्ताव का भी जिक्र किया, जिसमें यह तय किया गया था कि यदि कोई स्थायी सदस्य वीटो का इस्तेमाल करता है, तो 10 दिनों के भीतर महासभा में उस पर चर्चा होगी। लेकिन भारत के अनुसार यह व्यवस्था भी प्रभावी नहीं रही है। आंकड़ों के अनुसार, इस प्रस्ताव के बाद भी कई बार वीटो का इस्तेमाल हुआ है, जिससे स्पष्ट है कि मौजूदा प्रणाली में सुधार की जरूरत बनी हुई है।

भारत का यह रुख साफ संकेत देता है कि वह वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका को और मजबूत करना चाहता है। UNSC में सुधार की मांग केवल भारत की नहीं, बल्कि कई अन्य देशों की भी है, जो मानते हैं कि वर्तमान व्यवस्था असमान और अप्रासंगिक हो चुकी है।

अंततः भारत ने यह संदेश दिया कि यदि संयुक्त राष्ट्र को प्रभावी और विश्वसनीय बनाना है, तो सुरक्षा परिषद में व्यापक और संतुलित सुधार अनिवार्य है। स्थायी सदस्यता में विस्तार और वीटो अधिकार का पुनर्संतुलन ही इस दिशा में सबसे बड़ा कदम हो सकता है।

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