भारत के पड़ोसी देशों की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदलाव आया है। बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के पतन, नेपाल में सत्ता परिवर्तन और श्रीलंका के आर्थिक संकट के बाद नई राजनीतिक व्यवस्थाओं ने दक्षिण एशिया की कूटनीति को बदल दिया है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारत के पड़ोसी देश उससे दूरी बना रहे हैं और क्या चीन-पाकिस्तान इस बदलते समीकरण का फायदा उठा रहे हैं? हालांकि, मौजूदा घटनाक्रम को सीधे तौर पर किसी एक देश की साजिश कहना जल्दबाजी होगी। तस्वीर में राजनीतिक बदलाव, आर्थिक हित और चीन का बढ़ता प्रभाव—तीनों साथ दिखाई देते हैं।
बांग्लादेश में सरकार बदली तो भारत से रिश्तों में क्यों आया तनाव?
अगस्त 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में तनाव बढ़ा। 2026 में तारिक रहमान के नेतृत्व में नई सरकार आने के बाद ढाका ने चीन के साथ भी अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंध बढ़ाए हैं। तारिक रहमान भारत के निमंत्रण के बावजूद हाल में नई दिल्ली नहीं आ सके। हालांकि, अब दोनों देशों के बीच नवंबर में उनकी संभावित भारत यात्रा को लेकर बातचीत चल रही है। बांग्लादेश ने भारत के लिए नए उच्चायुक्त की नियुक्ति भी की है। इससे साफ है कि दोनों देशों के बीच दूरी के साथ-साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश भी चल रही है।
नेपाल में बालेन शाह की भारत यात्रा अभी तक क्यों नहीं हुई?
नेपाल में नई सरकार के आने के बाद प्रधानमंत्री बालेन शाह ने शुरुआती दौर में घरेलू मुद्दों पर ध्यान देने की नीति अपनाई। इसलिए उनका अब तक भारत दौरा न करना अपने आप में भारत से दूरी का प्रमाण नहीं है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक भारत और नेपाल नवंबर 2026 में बालेन शाह की संभावित भारत यात्रा की तैयारी कर रहे हैं। नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वाग्ले की भारत यात्रा के दौरान आर्थिक सहयोग, ऊर्जा, कनेक्टिविटी और बाढ़ के बाद पुनर्निर्माण जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई।
श्रीलंका में आर्थिक संकट के बाद राजनीतिक बदलाव जरूर हुआ, लेकिन भारत के साथ उसके संबंध लगातार बने हुए हैं। राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने राष्ट्रपति बनने के बाद दिसंबर 2024 में अपनी पहली विदेश यात्रा भारत की की थी। फरवरी 2026 में भी वह भारत आए। दोनों देशों के बीच ऊर्जा, कनेक्टिविटी, आर्थिक सहयोग और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में बातचीत जारी है। अप्रैल 2026 में भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने भी श्रीलंका का दौरा किया। इसलिए श्रीलंका के मामले में भारत से लगातार दूरी की तस्वीर सही नहीं बैठती।
चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए क्यों चिंता का विषय है?
दक्षिण एशिया में चीन का आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव पिछले वर्षों में बढ़ा है। बुनियादी ढांचे, निवेश, कर्ज और व्यापार के जरिए चीन ने भारत के कई पड़ोसी देशों में अपनी मौजूदगी मजबूत की है। 2026 के एक कैम्ब्रिज अध्ययन में भी दक्षिण एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव और भारत के पड़ोस में उसकी सक्रियता का उल्लेख किया गया है। पाकिस्तान तो लंबे समय से चीन का रणनीतिक साझेदार है। चीन-पाकिस्तान सहयोग भारत के लिए सुरक्षा और क्षेत्रीय रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण चुनौती बना हुआ है।
क्या चीन-पाकिस्तान भारत के खिलाफ कोई षडयंत्र रच रहे हैं?
अभी उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि चीन और पाकिस्तान मिलकर भारत के सभी पड़ोसी देशों को भारत से दूर करने की कोई एक बड़ी गुप्त योजना चला रहे हैं। हां, चीन का दक्षिण एशिया में प्रभाव बढ़ना चाह रहा है और पाकिस्तान के साथ उसके मजबूत रणनीतिक संबंध हैं। ऐसे में भारत के सामने चुनौती यह है कि वह अपने पड़ोसी देशों को केवल सुरक्षा के नजरिए से न देखे, बल्कि व्यापार, बिजली, निवेश, रोजगार, कनेक्टिविटी और आपदा राहत जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाए। हांलिक इस तरह के सहयोग में भी भारत पीछे नहीं रहता नेपाल में भूंकप की आपादा हा या फिर श्रीलंका में अनाज की कमी ,हर समय भारत ने दोस्ती और सहयोग का हाथ बढाया है।
भारत की कूटनीति के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
भारत के लिए सबसे जरूरी है कि वह पड़ोसी देशों की बदलती सरकारों के साथ लगातार संवाद बनाए रखे। किसी देश में सरकार बदलने के बाद पुराने राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर रहने के बजाय नई सरकारों के साथ नए सिरे से भरोसा कायम करना होगा। बांग्लादेश के साथ व्यापार और सीमा सुरक्षा, नेपाल के साथ बिजली और कनेक्टिविटी तथा श्रीलंका के साथ समुद्री सुरक्षा और आर्थिक सहयोग को और मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा।
इसलिए मौजूदा स्थिति को केवल ‘पड़ोसी भारत से दूर हो रहे हैं’ कहकर समझना अधूरा होगा। दक्षिण एशिया में सभी देश अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों के हिसाब से भारत, चीन और दूसरे देशों के साथ संबंध बना रहे हैं। भारत के सामने असली चुनौती यह है कि वह बदलते समीकरणों में अपने पड़ोसियों के साथ भरोसा और सहयोग कितना मजबूत रख पाता है।