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अमेरिका और NATO की धमकियों के बीच भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की कसौटी”

DigitalDesk by DigitalDesk
July 16, 2025
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India independent foreign policy is being tested amidst threats from the US and NATO
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अमेरिका और NATO की धमकियों के बीच भारत की स्वतंत्र विदेश नीति की कसौटी”

‘शांति’ के नाम पर दंड?
जब कोई अंतरराष्ट्रीय संगठन शांति की अपील के साथ-साथ प्रतिबंधों की धमकी देता है, तो यह सवाल उठता है कि असली एजेंडा क्या है — शांति स्थापना या वैश्विक प्रभुत्व की पुनर्स्थापना?
हाल ही में NATO महासचिव मार्क रूट का बयान, जिसमें उन्होंने भारत, चीन और ब्राजील को रूस से तेल और गैस खरीदने पर कड़े आर्थिक प्रतिबंधों की चेतावनी दी, न केवल भारत की स्वतंत्र विदेश नीति पर सीधा हमला है, बल्कि एकतरफा वैश्विक आदेश थोपने की मंशा भी उजागर करता है। उनकी यह धमकी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक नीति का विस्तार प्रतीत होती है, जिसमें उन्होंने रूस को 50 दिनों के भीतर युद्ध रोकने का अल्टीमेटम दिया है—अन्यथा व्यापारिक साझेदारों पर भी 100 प्रतिशत से अधिक टैरिफ लगा देने की बात कही है।

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भारत का दृष्टिकोण… रणनीतिक स्वायत्तता की मजबूती

भारत की विदेश नीति का मूलमंत्र सदैव रहा है — राष्ट्रीय हित पहले। भारत ने यूक्रेन युद्ध के मामले में बार-बार दोहराया है कि वह शांति, कूटनीति और संवाद का पक्षधर है, लेकिन वह किसी पक्ष विशेष की राजनीतिक धुरी में शामिल नहीं होना चाहता।
भारत रूस से तेल खरीदता है क्योंकि यह हमारी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए किफायती, विश्वसनीय और स्थिर स्रोत है। भारत ने कभी रूस के सैन्य अभियानों का समर्थन नहीं किया, लेकिन न ही वह पश्चिमी दबाव में आकर अपने नागरिकों की भलाई से समझौता करेगा।

‘डैडी’ विवाद… क्या NATO अब अमेरिकी प्रचार मंच बन चुका है?

मार्क रूट द्वारा NATO शिखर सम्मेलन के दौरान ट्रंप को ‘डैडी’ कहे जाने को लेकर उठे विवाद ने भी एक नई बहस को जन्म दिया है। क्या NATO अब एक स्वतंत्र सैन्य संगठन के बजाय अमेरिकी नेतृत्व वाली राजनीतिक कठपुतली बन चुका है? और यदि हां, तो क्या उसका दबाव वास्तव में सामूहिक सुरक्षा के लिए है, या विशुद्ध रूप से अमेरिकी प्रभुत्व बनाए रखने के लिए?

भारत जैसे देश, जो वर्षों से गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व करते आए हैं, इस नई विश्व व्यवस्था के आगे झुकें यह न तो व्यावहारिक है, न ही स्वीकार्य।

भविष्य का रास्ता: संप्रभुता के साथ संतुलन

भारत को चाहिए कि वह रणनीतिक संवाद के जरिए अमेरिका और NATO को स्पष्ट रूप से अपने ऊर्जा और आर्थिक हित समझाए। वैश्विक मंचों पर शांति स्थापना के लिए तटस्थ मध्यस्थ की भूमिका निभाए। रूस और यूक्रेन, दोनों से संवाद बनाकर सार्थक समाधान की दिशा में पहल करे।

वहीं पश्चिम को भी यह समझना होगा कि आदेशों, धमकियों और टैरिफ से विश्व राजनीति नहीं चलती। हर देश को अपनी प्राथमिकताएं तय करने का अधिकार है। जो आज एक देश पर प्रतिबंध है, वही कल एक वैश्विक आर्थिक उथल-पुथल बन सकता है। भारत आज एक प्रमुख वैश्विक शक्ति है—संप्रभु, आत्मनिर्भर और जिम्मेदार। यदि पश्चिमी देश सचमुच शांति चाहते हैं, तो भारत जैसे देशों को धमकाने के बजाय उन्हें विश्व संवाद का पुल बनाना चाहिए। क्योंकि युद्ध धमकियों से नहीं, समझदारी से रोके जाते हैं।

भारत, चीन, ब्राजील को मिली सख्त चेतावनी
दरअसल नाटो महासचिव मार्क रूट ने यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में बेहद सख्त बयान जारी किया है। उन्होंने कहा “अगर आप चीन के राष्ट्रपति, भारत के प्रधानमंत्री या ब्राजील के राष्ट्रपति हैं और रूस से व्यापार जारी रखते हैं, तो समझ लीजिए – मास्को शांति वार्ता को गंभीरता से नहीं लेता तो 100% द्वितीयक प्रतिबंध लागू कर दिए जाएंगे।”
रूट का सीधा इशारा इन देशों के तेल और गैस आयात को लेकर था। उनका मानना है कि यदि ये शक्तिशाली उभरती अर्थव्यवस्थाएं रूस पर दबाव नहीं डालतीं, तो यूक्रेन युद्ध लंबा खिंच सकता है।

ट्रंप की धमकी…50 दिन में शांति, वरना 100% टैरिफ
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि यदि अगले 50 दिनों में रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त नहीं होता या कोई शांति समझौता नहीं होता, तो रूस के निर्यात पर 100% टैरिफ लगाया जाएगा। रूस से व्यापार करने वाले देशों – विशेष रूप से भारत, चीन और ब्राजील – पर भी द्वितीयक प्रतिबंध लगाए जाएंगे। उन्होंने कहा, “यह कोई प्रस्ताव नहीं है, यह चेतावनी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप को कांग्रेस की नई मंजूरी की जरूरत नहीं होगी क्योंकि 85 अमेरिकी सीनेटर पहले से एक ऐसे प्रस्ताव के पक्ष में हैं, जो उन्हें रूस के व्यापारिक साझेदारों पर 500% तक टैरिफ लगाने की शक्ति देता है।…(प्रकाश कुमार पांडेय)

Tags: #India independent foreign policy#US and NATO
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