एक समय ऐसा भी था जब कॉमनवेल्थ खेलों में भारत खिलाड़ियों की सबसे बड़ी उम्मीद कुश्ती और वेटलिफ्टिंग के साथ ही साथ बैडमिंटन और शूटिंग से ही जुड़ी होती थीं। कॉमनवेल्थ खेलों में मुक्केबाज भी भारत के लिए पदक लाते थे, लेकिन उससे पूरे कॉमनवेल्थ खेल पर छा जाने की उम्मीदें बहुत कम ही की जाती थीं।
कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का दबदबा
ग्लासगो 2026 ने यह तस्वीर बदल दी
भारतीय मुक्केबाज़ों ने केवल पदक नहीं जीते, बल्कि पूरे टूर्नामेंट पर अपनी छाप छोड़ दी। सात स्वर्ण पदकों के साथ भारत ने कॉमनवेल्थ खेलों में मुक्केबाज़ी का अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और इंग्लैंड व ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को पीछे छोड़ते हुए बॉक्सिंग तालिका में शीर्ष स्थान हासिल किया। लेकिन इस सफलता की सबसे बड़ी कहानी सिर्फ़ स्वर्ण पदकों की संख्या नहीं है। असल कहानी उन बेटियों की है जिन्होंने भारतीय मुक्केबाज़ी का चेहरा बदल दिया।
मैरी कॉम का सपना, जो अब एक आंदोलन बन चुका है
हर खेल में बदलाव की शुरुआत किसी एक खिलाड़ी से होती है। भारतीय मुक्केबाज़ी के लिए वह नाम है—मैरी कॉम। मणिपुर के एक छोटे से गाँव से निकलकर छह बार विश्व चैंपियन बनने वाली मैरी कॉम ने यह विश्वास जगाया कि भारत की बेटियाँ भी दुनिया की सबसे कठिन खेल प्रतियोगिताओं में शीर्ष पर पहुँच सकती हैं। फिर लवलीना बोरगोहेन ने ओलंपिक पदक जीता, निकहत ज़रीन विश्व चैंपियन बनीं और अब एक पूरी नई पीढ़ी उसी राह पर आगे बढ़ रही है। आज भारतीय मुक्केबाज़ी किसी एक स्टार पर निर्भर नहीं है। अब देश के पास प्रतिभाओं की पूरी कतार है।
कौन हैं ये गोल्ड जीतने वाली बेटियाँ?
प्रीति पवार, जैस्मिन लांबोरिया, अरुंधति चौधरी, साक्षी चौधरी, लवलीना बोरगोहेन और निकहत ज़रीन—इनकी कहानियाँ अलग-अलग हैं, लेकिन संघर्ष लगभग एक जैसा है। इनमें से कई किसान परिवारों से आती हैं। किसी के पिता सेना में रहे, किसी के छोटे व्यापारी हैं, तो किसी ने सीमित संसाधनों में बड़े सपने देखने का साहस किया। इनमें से कई ने पुराने पंचिंग बैग, साधारण प्रशिक्षण केंद्रों और सीमित सुविधाओं के बीच अभ्यास किया। कई लड़कियों को शुरुआत में यह भी सुनना पड़ा कि “बॉक्सिंग लड़कियों का खेल नहीं है। आज वही लड़कियाँ भारत के लिए स्वर्ण पदक जीत रही हैं और हजारों परिवारों की सोच बदल रही हैं।
अब सिर्फ़ हरियाणा की कहानी नहीं
एक समय था जब भारतीय मुक्केबाज़ी का मतलब लगभग हरियाणा माना जाता था। भिवानी बॉक्सिंग क्लब को “लिटिल क्यूबा” कहा जाने लगा था क्योंकि वहीं से विजेंदर सिंह सहित कई अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाज़ निकले। लेकिन आज तस्वीर बदल चुकी है। अब चैंपियन हरियाणा के साथ-साथ असम, मणिपुर, तेलंगाना, राजस्थान, दिल्ली और देश के कई अन्य राज्यों से भी आ रहे हैं। यानी मुक्केबाज़ी अब किसी एक राज्य की पहचान नहीं रही, बल्कि पूरे भारत का खेल बनती जा रही है।
आखिर बदला क्या?
यह सफलता किसी एक फैसले का परिणाम नहीं है। इसके पीछे कई वर्षों की मेहनत और योजनाबद्ध बदलाव हैं। सबसे पहले, देश में जूनियर और सब-जूनियर स्तर की प्रतियोगिताएँ बढ़ी हैं। खिलाड़ियों को कम उम्र से ही बड़े मुकाबलों का अनुभव मिलने लगा है। दूसरा, खेल विज्ञान ने बड़ा अंतर पैदा किया है। आज खिलाड़ी सिर्फ़ अभ्यास ही नहीं करते, बल्कि पोषण विशेषज्ञ, फिजियोथेरेपिस्ट, खेल मनोवैज्ञानिक और वीडियो विश्लेषकों की मदद भी लेते हैं।
तीसरा, टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) जैसी योजनाओं ने खिलाड़ियों को आर्थिक और तकनीकी सहायता दी है, जिससे उनका पूरा ध्यान प्रशिक्षण पर रह सके। चौथा, भारतीय टीम में जगह बनाना पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है। देश के भीतर प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गई है कि राष्ट्रीय टीम में चयन ही किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं। यही प्रतिस्पर्धा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को और मजबूत बना रही है।
बेटियों ने बदली समाज की सोच
शायद सबसे बड़ा बदलाव खेल के मैदान में नहीं, बल्कि घरों के भीतर आया है। कुछ दशक पहले तक माता-पिता अपनी बेटियों को बॉक्सिंग में भेजने से डरते थे। चोट लगने का डर था और समाज की सोच भी रास्ते में खड़ी रहती थी। लेकिन जब उन्हीं बेटियों ने विश्व और ओलंपिक स्तर पर भारत का नाम रोशन किया, तो तस्वीर बदलने लगी। आज कई परिवार अपनी बेटियों को आत्मविश्वास, अनुशासन और बेहतर भविष्य के लिए मुक्केबाज़ी की ओर भेज रहे हैं। एक पीढ़ी की सफलता ने अगली पीढ़ी के लिए रास्ता आसान कर दिया है।
मुक्केबाज़ी सिर्फ़ खेल नहीं, उम्मीद भी है
मुक्केबाज़ी उन खेलों में से है जहाँ सफलता केवल महंगे उपकरणों पर निर्भर नहीं करती। मेहनत, अनुशासन, अच्छा कोच और अवसर—यही सबसे बड़ी पूँजी हैं। इसीलिए देश के छोटे शहरों और साधारण परिवारों के युवाओं के लिए यह खेल सामाजिक बदलाव का माध्यम बन गया है। कई खिलाड़ियों के लिए बॉक्सिंग केवल पदक जीतने का रास्ता नहीं है।
यह सम्मान है। यह आत्मनिर्भरता है। यह परिवार की ज़िंदगी बदलने का अवसर है।
आगे की चुनौती
कॉमनवेल्थ खेलों की सफलता महत्वपूर्ण है, लेकिन अंतिम लक्ष्य नहीं। भारत की असली परीक्षा विश्व चैंपियनशिप और ओलंपिक में होगी। अगर जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को इसी तरह अवसर मिलते रहे, खेल विज्ञान का उपयोग बढ़ता रहा और महिला खिलाड़ियों को लगातार समर्थन मिलता रहा, तो ग्लासगो 2026 को भारतीय मुक्केबाज़ी की मंज़िल नहीं, बल्कि एक नए स्वर्णिम युग की शुरुआत के रूप में याद किया जाएगा। आज इतना तो तय है कि भारतीय मुक्केबाज़ अब रिंग में सिर्फ़ हिस्सा लेने नहीं उतरते।





