साझा विरासत, साझा भविष्य: सांस्कृतिक आदान-प्रदान से मजबूत भारत-चीन संबंध

तीन वर्ष पहले, अक्तूबर 2023 में पेइचिंग में राष्ट्रीय प्रचार, वैचारिक और
सांस्कृतिक कार्य सम्मेलन में संस्कृति पर शी चिनफिंग विचारधारा औपचारिक
रूप से प्रस्तुत की गई। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने सांस्कृतिक आत्मविश्वास
को मजबूत कर सिद्धांतों का मार्गदर्शन करने, लोगों को एकजुट करने और विश्व
को प्रभावित करने में सक्षम समाजवादी संस्कृति के निर्माण पर बल दिया, जिसे
नए युग में चीनी विशेषताओं वाले समाजवाद पर शी चिनफिंग विचारधारा में
शामिल किया गया।

यह विचारधारा चीन के पुनरुत्थान के लिए भौतिक आधार और आध्यात्मिक
शक्ति दोनों प्रदान करती है। यह सांस्कृतिक अवशेषों की खोज, शोध और संरक्षण
के माध्यम से उत्कृष्ट पारंपरिक संस्कृति को आगे बढ़ाने और उसे मार्क्सवाद के
चीनी अनुकूलन के साथ एकीकृत करने का आह्वान करती है।

वैश्विक स्तर पर, यह विचारधारा सभ्यताओं के बीच आदान-प्रदान और आपसी
सीख पर बल देती है जो आज की विभाजित दुनिया के लिए विशेष रूप से
प्रासंगिक है। राष्ट्रपति शी द्वारा 2013 में मॉस्को स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ
इंटरनेशनल रिलेशंस में प्रस्तावित मानव जाति के साझा भविष्य वाले समुदाय
का दूरदर्शी दृष्टिकोण केवल एक कूटनीतिक नारा नहीं रहा, बल्कि फरवरी 2017
में संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव में शामिल होकर इसे व्यापक वैश्विक स्वीकृति मिली।
रवींद्रनाथ टैगोर का सेतु : भिन्नता से ऊपर समानता

आखिरकार, सांस्कृतिक भिन्नताएं मुख्य विषय नहीं हैं। संस्कृतियों की समानता
और मानवता की सहानुभूति ही आदान-प्रदान और आपसी सीख की असली कुंजी
है। प्रसिद्ध भारतीय कवि और दार्शनिक रवींद्रनाथ टैगोर इसके जीवंत उदाहरण हैं।
1913 में नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले एशियाई के रूप में उन्होंने सिद्ध किया
कि प्राच्य संस्कृति को सभी राष्ट्र समझ सकते हैं। टैगोर की रचनाओं में भाषा

सांस्कृतिक सीमाओं को पार कर जाती है, क्योंकि उनमें चीनी ज्ञान और दर्शन
समाहित है। कई बार चीन की यात्रा करने वाले टैगोर ने चीनी संस्कृति के प्रति
अपने प्रेम को लेखन में पिरोया और वे लाओत्से (Lao Tzu) के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘ताओ
ते चिंग’(Tao Te Ching) के प्रशंसक थे। वे मानते थे कि चीन और भारत जैसी
प्राचीन सभ्यताओं को निरंतर संवाद करना चाहिए।

2014 में भारत यात्रा के दौरान राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने 18 सितंबर को भारतीय
विश्व मामलों की परिषद में टैगोर की कविताओं का उल्लेख किया और कहा कि
उन्होंने ‘गीतांजलि’, ‘स्ट्रे बर्ड्स’, ‘द गार्डनर’ और ‘द क्रिसेंट मून’ पढ़ी हैं और इन
रचनाओं ने उनके जीवन-दर्शन को गहराई से प्रेरित किया है।

चीन यात्रा से लौटने के बाद टैगोर ने 1937 में पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन
स्थित विश्वभारती में चीना भवन की स्थापना की। तब से यह संस्थान भारत-
चीन सांस्कृतिक अध्ययन का केंद्र और मित्रता का महत्वपूर्ण सेतु बना हुआ है।
आधुनिक भारत-चीन आदान-प्रदान के प्रतिनिधि के रूप में टैगोर का यह
सभ्यतागत सेतु दोनों देशों के विश्वास और सहयोग को गहरा करने के लिए आज
भी प्रासंगिक है, जिसका उपयोग आधुनिक मंचों के माध्यम से बंधनों को मजबूत
करने में किया जा सकता है।
नालंदा सेतु : जीवंत विरासत के रूप में ह्वेन त्सांग स्मारक
सांस्कृतिक संबंध चीन-भारत संबंधों का एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। इस वर्ष फरवरी
में नालंदा में ह्वेन त्सांग (Xuanzang) स्मारक हॉल की 19वीं वर्षगांठ के समारोह
में भाग लेते हुए कोलकाता में चीन के महावाणिज्य दूत शू वेई ने कहा कि महान
आचार्य ह्वेन त्सांग भारत-चीन सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अग्रदूत थे और
उनमें निहित मूल्य, सत्य के प्रति श्रद्धा, खुलापन और समावेशिता तथा अंतर-
सांस्कृतिक समझ की खोज, आज भी अत्यंत प्रासंगिक हैं।

ह्वेन त्सांग स्मारक हॉल न केवल सांस्कृतिक आदान-प्रदान और पारस्परिक
अधिगम का जीवंत प्रमाण है, बल्कि साझा विरासत के संरक्षण का आदर्श भी है।
प्राचीन काल से वर्तमान तक के आदान-प्रदान पर विचार करते हुए हम दोनों देशों

के लोगों को पारस्परिक समझ को और गहरा करना चाहिए और अपनी
सभ्यताओं की सामूहिक शक्ति को उजागर करना चाहिए।
सिनेमा का सेतु: कोलकाता चीनी फिल्म महोत्सव की वापसी
सिनेमा भारत और चीन के बीच सांस्कृतिक सेतु है। हाल के वर्षों में दंगल, 3
इडियट्स, धूम 3, पीके, सीक्रेट सुपरस्टार, बजरंगी भाईजान और महाराजा जैसी
भारतीय फिल्मों ने चीन में नई लोकप्रियता बनाई है।

17 से 19 अप्रैल 2026 तक कोलकाता चीनी फिल्म महोत्सव दस वर्ष बाद नंदन में
लौटा। इससे पहले अंतिम बार 2016 में इसका आयोजन हुआ था। भारत-चीन
सह-निर्मित उद्घाटन फिल्म 'ह्वेन त्सांग', जो 1300 वर्ष पूर्व एक भिक्षु की नालंदा
तक की यात्रा पर आधारित है, दोनों देशों के फिल्मी सहयोग के क्षेत्र में एक मील
का पत्थर है।

महोत्सव का उद्घाटन करते हुए चीनी महावाणिज्य दूत शू वेई ने कहा कि यह
आपसी समझ बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण आयोजन है। क्रिएशन ऑफ द गॉड्स I:
किंगडम ऑफ स्टॉर्म्स (2023) सहित सात चीनी फिल्में दिखाई गईं। यह
महोत्सव दिखाता है कि सिनेमा कैसे जीवंत कूटनीति बनता है।
जहाँ इतिहास जीवंत है: हनान से सीख

पिछले अप्रैल में मैंने चीन के हनान प्रांत का दौरा किया, जहाँ हनान संग्रहालय,
व्हाइट हॉर्स टेम्पल और ल्वोयांग शहर में स्थित लोंगमेन ग्रोटोज देखे।
कलाकृतियां चीन की दीर्घ सभ्यता की कहानी कहती हैं, व्हाइट हॉर्स टेम्पल चीनी
और विदेशी सभ्यताओं के बीच हजारों वर्षों के आदान-प्रदान का साक्षी है, और
लोंगमेन की चट्टानों पर बनी नक्काशियां प्राचीन कला का प्रतीक हैं।

इन अनमोल धरोहरों को इतिहास में मौसम की मार से बार-बार नुकसान झेलना
पड़ा है। फिर भी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में ग्रोटोज के जीर्णोद्धार,
प्राचीन मंदिरों के संरक्षण और आधुनिक संग्रहालयों के निर्माण में भारी संसाधन

और उन्नत तकनीक लगाई गई है।
जिस बात ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया, वह व्हाइट हॉर्स टेम्पल में
भारतीय शैली की वास्तुकला का उत्कृष्ट संरक्षण है, जो भारत-चीन सांस्कृतिक
आदान-प्रदान के मैत्रीपूर्ण इतिहास को सहेजे हुए है। यह संस्कृति पर शी चिनफिंग
के विचार का सजीव प्रतिबिंब है, जो सभ्यताओं के बीच आदान-प्रदान और
पारस्परिक सीख को बढ़ावा देता है।एशियाई सदी के लिए आपसी जुड़ाव और जन-
संपर्क

एशियाई सदी के लिए आपसी जुड़ाव और जन-संपर्क
बेल्ट एंड रोड पहल अपनी कनेक्टिविटी और जन-जन के बीच संबंधों के जरिए
लोगों के बीच मैत्रीपूर्ण सेतु बनाने का मंच प्रदान करती है। भारत और चीन जैसे दो
करीबी पड़ोसी, जो दुनिया के दो सबसे बड़े विकासशील देश और वैश्विक प्रभाव
वाले देश हैं, यदि आपसी जुड़ाव और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को और बढ़ावा दें
तो बेहतर आधुनिक सभ्यता का निर्माण करेंगे।

सांस्कृतिक आदान-प्रदान मतभेदों को खत्म नहीं करता, पर लेन-देन की कूटनीति
से अलग तीखे किनारों को नरम कर आपसी विश्वास बनाता है। पारंपरिक
संस्कृति को द्विपक्षीय संबंधों से जोड़कर और जन-संपर्क के मंचों को मजबूत कर
दोनों देश एक-दूसरे के विकास को गति दे सकते हैं और परस्पर सम्मान,
पारस्परिक सीख और साझा भविष्य वाली एशियाई सदी को साकार कर सकते हैं।

(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक— रविशंकर बसु)

 

 

 

 

 

 

 

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