क्या गेहूं की बेहतर किस्में अब रोबोट चुनेगा?

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सोचिए, खेत में हज़ारों गेहूं के पौधे खड़े हैं और उनमें से सबसे अच्छे पौधे छांटने का काम एक
रोबोट कर रहा है। कौन-सा पौधा ज़्यादा दाने देगा, कौन सूखे में टिकेगा, कौन बढ़ती गर्मी में भी
फ़सल बचा लेगा, इन सवालों के जवाब अब तक कृषि वैज्ञानिक अपनी आंखों और अनुभव से
खोजते आए हैं। इसमें घंटों खेत में खड़े रहना पड़ता है। चीन में अब एक ऐसा AI रोबोट बना है,
जो इस थका देने वाले काम का बोझ हल्का कर सकता है।

इसका प्रोटोटाइप शानतोंग एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने तैयार किया है। क़रीब दो
मीटर आकार का यह रोबोट खेत में अपने-आप चल सकता है। टीम से जुड़े वैज्ञानिक वांग होंगवेई
के मुताबिक़ इसकी ख़ासियत यह है कि इसने सीखा है अनुभवी वैज्ञानिकों की नज़र से।

शोधकर्ताओं ने अलग-अलग परिस्थितियों में गेहूं के लगभग 2,000 नमूने उगाए, उनकी तस्वीरें
लीं और अनुभवी ब्रीडरों से उनका आकलन करवाया। उस आकलन को आंकड़ों में बदलकर रोबोट
के AI मॉडल को सिखाया गया। यानी मशीन के पीछे इंसानी तजुर्बा खड़ा है।

खेत में यह काम कैसे करता है? किसी पौधे के पास पहुंचकर रोबोट रुकता है और अपनी रोबोटिक
भुजा आगे बढ़ाता है। उसमें लगे आठ छोटे कैमरे गेहूं की बाली को अलग-अलग कोणों से देखते
हैं। चंद सेकंड में वह बाली की लंबाई, दानों की संख्या और पौधे की ऊंचाई आंक लेता है। जो पौधे
बेहतर निकलते हैं, उन पर वह पेंट से निशान लगा देता है, ताकि वैज्ञानिक बाद में उन्हें आसानी
से पहचान लें। हर पौधे का डिजिटल रिकॉर्ड भी साथ-साथ बनता जाता है।

इसका फ़ायदा क्या है? पारंपरिक तरीक़े से हज़ारों पौधों को परखना बेहद समय खाने वाला काम
है। ऊपर से अलग-अलग वैज्ञानिकों के आकलन में थोड़ा फ़र्क़ आ जाना भी स्वाभाविक है। रोबोट
हर पौधे को एक ही पैमाने पर जांचता है, इसलिए प्रक्रिया ज़्यादा व्यवस्थित हो जाती है और
अगली ब्रीडिंग के लिए पौधे चुनना आसान होता है। चीन खाद्य सुरक्षा मज़बूत करने के लिए AI
और आधुनिक कृषि तकनीकों पर ज़ोर दे रहा है, और यह रोबोट उसी कड़ी का हिस्सा है। इसे
बनाने वाली टीम अब इसके व्यावसायिक इस्तेमाल की दिशा में भी काम कर रही है।

पर इस ख़बर का मतलब सिर्फ़ चीन तक सीमित नहीं है। भारत में गेहूं करोड़ों थालियों की रोटी है,
ख़ासकर उत्तर भारत में, जहां इसकी खेती बड़े पैमाने पर होती है। लेकिन जलवायु परिवर्तन ने
किसानों की चिंता बढ़ा दी है। कहीं पानी कम पड़ रहा है, तो कहीं दाना भरने के समय अचानक
चढ़ा तापमान उपज घटा देता है। ऐसे में सवाल लाज़िमी है कि क्या ऐसा रोबोट हमें वे किस्में
दिला सकता है, जो कम पानी में भी अच्छी पैदावार दें और गर्मी झेल सकें?

उम्मीद की गुंजाइश है। अगर हज़ारों पौधे कम समय में परखे जा सकें, तो बदलती आबोहवा के
अनुकूल किस्में विकसित करने की रफ़्तार बढ़ सकती है। फिर भी एक सावधानी ज़रूरी है। सिर्फ़
ऊंचाई या बाली के दाने गिन लेने से यह तय नहीं होता कि पौधा हर हाल में बेहतर साबित होगा।
इसके लिए कुल उपज, रोगों से लड़ने की ताक़त और अलग-अलग मौसमों में प्रदर्शन भी जांचना
होगा।

भारत में भी कृषि अनुसंधान में AI और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल बढ़ रहा है। मगर क्या
चीन जैसा रोबोट हमारे खेतों में भी उतना ही काम आएगा? इसका जवाब इतना सीधा नहीं।
हमारे यहां खेतों का आकार, मिट्टी, मौसम और किसानों की आर्थिक हालत जगह-जगह बदल
जाती है। इसलिए ऐसी मशीनें अपनाने से पहले यह परखना होगा कि वे यहां की परिस्थितियों में
कितनी कारगर हैं और उनकी लागत कितनी बैठेगी। यह भी ध्यान रखना होगा कि इस तकनीक
का फ़ायदा बड़े संस्थानों की चारदीवारी में न सिमट जाए, बल्कि छोटे किसान तक भी पहुंचे।
आख़िर में बात एक रोबोट की नहीं, खेती के भविष्य की है। अगर वैज्ञानिकों का अनुभव, किसानों
की पीढ़ियों पुरानी समझ और आधुनिक तकनीक साथ मिलकर चलें, तो ऐसी फ़सलें बन सकती
हैं जो कम पानी में ज़्यादा दें और बदलते मौसम से टक्कर ले सकें। इसका लाभ किसान को भी
मिलेगा और देश की थाली को भी। फ़िलहाल चीन का यह प्रयोग एक नई संभावना की खिड़की
खोलता है। अब देखना है कि इस चुनौती में AI कितना लंबा सफ़र तय करता है।

(अखिल पाराशर, CGTN हिन्दी संवाददाता, बीजिंग)

 

 

 

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