दुनिया की नई ताकतों की गिनती में भारत… अमेरिका का नाम नहीं, तो क्या बदल रहा है ग्लोबल पावर गेम?

“दुनिया के पावर गेम में बदला भारत का कद... अब भारत को नजरअंदाज करके ग्लोबल गेम नहीं खेला जा सकता।”

India among the world new powers the US is missing from the list so is the global power game changing

कभी दुनिया की ताकत का पैमाना तय करते समय अमेरिका और पश्चिमी देशों का नाम सबसे पहले लिया जाता था… लेकिन अब बदलती वैश्विक राजनीति में तस्वीर तेजी से बदल रही है। किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन यानी SCO के मंच से बेलारूस के राष्ट्रपति एलेक्जेंडर लुकाशेंको का बयान इसी बदलाव की एक अहम झलक है।

लुकाशेंको ने दुनिया के तीन ताकतवर देशों के तौर पर चीन, रूस और भारत का नाम लिया। उन्होंने इन तीनों को आर्थिक रूप से ताकतवर, संसाधन-संपन्न और परमाणु शक्ति संपन्न देश बताया। खास बात यह रही कि इस सूची में अमेरिका का नाम नहीं था। अब सवाल यह है कि आखिर भारत की तस्वीर वैश्विक शक्ति के रूप में इतनी तेजी से क्यों मजबूत हो रही है?

यह सिर्फ एक बयान नहीं… बदलती दुनिया का संकेत है

लुकाशेंको का बयान किसी औपचारिक रैंकिंग का हिस्सा नहीं है। इसे दुनिया की आधिकारिक ‘पावर लिस्ट’ मानना भी सही नहीं होगा। लेकिन एक वैश्विक मंच पर रूस और चीन के साथ भारत को एक ही श्रेणी में रखना उस धारणा की ओर जरूर इशारा करता है, जिसमें भारत को अब केवल एक बड़ा बाजार या विकासशील अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि निर्णय को प्रभावित करने वाली शक्ति माना जा रहा है।

SCO का दायरा भी इस बदलाव को समझने में मदद करता है। संगठन में दुनिया की बड़ी आबादी और वैश्विक अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा शामिल है। यानी बिश्केक में जो तस्वीर बन रही है, वह सिर्फ एक संगठन की बैठक की तस्वीर नहीं है… यह उस दुनिया की तस्वीर है जो धीरे-धीरे बहुध्रुवीय यानी Multipolar World की तरफ बढ़ रही है।

भारत की सबसे बड़ी ताकत क्या है?

भारत की ताकत सिर्फ परमाणु हथियारों, बड़ी सेना या अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है।

भारत की असली ताकत है—कई ध्रुवों के बीच संवाद बनाए रखने की क्षमता।

रूस के साथ भारत के पुराने रणनीतिक संबंध हैं। चीन के साथ सीमा और रणनीतिक मतभेद हैं, लेकिन बातचीत के दरवाजे बंद नहीं हैं। अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीक और रणनीतिक सहयोग लगातार महत्वपूर्ण है। वहीं पश्चिम एशिया में भारत इजरायल, अरब देशों और ईरान—सभी के साथ अपने हितों के आधार पर संबंध बनाए रखता है।

यही वजह है कि भारत को किसी एक खेमे का हिस्सा बनने के बजाय अपनी Strategic Autonomy बनाए रखने वाली शक्ति के तौर पर देखा जाता है। SCO पर विश्लेषण भी इस बात की ओर इशारा करता है कि भारत चीन-रूस के किसी औपचारिक गठबंधन में शामिल होने के बजाय अलग-अलग मंचों का इस्तेमाल अपने प्रभाव और रणनीतिक विकल्प बढ़ाने के लिए करता है।

मोदी की विदेश नीति का सबसे बड़ा परिणाम—’भारत से बात करनी होगी’

भारत के बढ़ते प्रभाव को समझने का एक तरीका यह भी है कि आज दुनिया के बड़े संकटों पर भारत की स्थिति को नजरअंदाज करना आसान नहीं है। रूस-यूक्रेन युद्ध हो, पश्चिम एशिया का संकट हो, ऊर्जा सुरक्षा का सवाल हो या ग्लोबल साउथ की आवाज—भारत हर जगह एक ऐसी भूमिका तलाशता दिखाई देता है जिसमें वह किसी खेमे की कठपुतली नहीं, बल्कि अपने हितों और अपने प्रभाव के साथ स्वतंत्र पक्ष बने। बिश्केक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ संपर्क भी इसी व्यापक कूटनीतिक तस्वीर का हिस्सा है। मोदी ने पुतिन से यूक्रेन युद्ध को खत्म करने और शांति की दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत भी दोहराई। यानी भारत की भूमिका सिर्फ यह नहीं है कि वह किसके साथ खड़ा है… बल्कि यह भी है कि भारत किन-किन पक्षों से बात कर सकता है।

अमेरिका का नाम नहीं होना… क्या इसका मतलब अमेरिका कमजोर?

यहां सबसे जरूरी बात समझना होगी। लुकाशेंको की सूची में अमेरिका का नाम नहीं होना यह साबित नहीं करता कि अमेरिका की वैश्विक ताकत खत्म हो गई है। अमेरिका आज भी दुनिया की सबसे प्रभावशाली आर्थिक, तकनीकी, सैन्य और वित्तीय शक्तियों में है। भारत के लिए भी अमेरिका रणनीतिक, तकनीकी और रक्षा सहयोग का महत्वपूर्ण साझेदार बना हुआ है। लेकिन असली बदलाव कहीं और है। दुनिया अब सिर्फ अमेरिका-केंद्रित नहीं रहना चाहती। चीन अपनी शक्ति बढ़ा रहा है। रूस पश्चिमी दबाव के बावजूद अपनी भूमिका बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। और इनके बीच भारत ऐसी शक्ति बनकर उभर रहा है जो किसी एक ध्रुव के अधीन नहीं है। यही भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक पूंजी है।

पाकिस्तान के सामने भी भारत की बढ़ती हैसियत

बिश्केक का मंच इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां पाकिस्तान भी मौजूद था। ऐसे मंच पर भारत को चीन और रूस के साथ तीन प्रमुख ताकतों में गिनना पाकिस्तान के लिए भी एक अलग रणनीतिक संदेश है। भारत-पाकिस्तान के बीच आतंकवाद को लेकर गहरे मतभेद हैं। भारत लगातार यह रेखांकित करता रहा है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। SCO के बिश्केक घोषणापत्र में भी आतंकवाद, अलगाववाद और उग्रवाद के खिलाफ प्रतिबद्धता दोहराई गई। यानी भारत जिस मुद्दे को लंबे समय से वैश्विक मंचों पर उठा रहा है, वह अब सिर्फ भारत-पाकिस्तान का द्विपक्षीय मुद्दा नहीं रह गया है। आतंकवाद वैश्विक सुरक्षा की बहस का केंद्रीय विषय बन चुका है।

भारत की ‘दबदबा’ वाली तस्वीर कैसे बनी?

भारत की वैश्विक स्वीकार्यता अचानक नहीं बनी। इसके पीछे एक साथ कई ताकतें काम कर रही हैं— बड़ी अर्थव्यवस्था, विशाल बाजार, परमाणु क्षमता, सैन्य शक्ति, तकनीकी क्षमता, अंतरिक्ष कार्यक्रम, युवा आबादी, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और सबसे महत्वपूर्ण—स्वतंत्र विदेश नीति। लेकिन इन सबको जोड़ने वाली चीज है विश्वसनीयता और संवाद की क्षमता। भारत पश्चिम के साथ भी संवाद कर सकता है और रूस के साथ भी। ग्लोबल साउथ की आवाज भी उठा सकता है और विकसित देशों के साथ आर्थिक-तकनीकी साझेदारी भी कर सकता है।यही संतुलन भारत को अलग बनाता है।

असली परीक्षा अभी बाकी है

हालांकि बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता का मतलब यह नहीं कि भारत ने दुनिया की नंबर-वन शक्ति बनने की मंजिल हासिल कर ली है। भारत के सामने बड़ी चुनौतियां भी हैं—चीन से रणनीतिक प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा आयात पर निर्भरता के कुछ क्षेत्र, रोजगार और मानव पूंजी, अत्याधुनिक तकनीक में प्रतिस्पर्धा और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की लंबी लड़ाई। इसलिए लुकाशेंको का बयान मंजिल का प्रमाण नहीं, बल्कि दिशा का संकेत है। बिश्केक से निकली सबसे बड़ी तस्वीर शायद यही है— भारत अब दुनिया की मेज पर बैठा देश भर नहीं है… भारत उन देशों में शामिल होता जा रहा है, जिनके बिना मेज पर होने वाले फैसले अधूरे माने जाते हैं। चीन और रूस के साथ भारत का नाम लिया जाना इस बदलती शक्ति-समीकरण की प्रतीकात्मक तस्वीर है। और अमेरिका का नाम उस सूची में नहीं होना किसी एक देश की हार या जीत से ज्यादा महत्वपूर्ण एक बड़े बदलाव की तरफ इशारा करता है— विश्व व्यवस्था अब एकध्रुवीय से बहुध्रुवीय हो रही है… और इस नई व्यवस्था में भारत सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि निर्णायक भूमिका की ओर बढ़ रहा है। यही भारत की बढ़ती स्वीकार्यता है… यही उसकी बढ़ती कूटनीतिक ताकत है… और आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति का सबसे ब ड़ा सवाल शायद यह नहीं होगा कि भारत किसके साथ है? बल्कि सवाल होगा— दुनिया के बड़े फैसलों में भारत की राय क्या है?

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