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5 ट्रिलियन डॉलर का सपना अभी अधूरा! आखिर क्यों तय लक्ष्य से पीछे रह गई भारतीय अर्थव्यवस्था?

DigitalDesk by DigitalDesk
June 10, 2026
in बिजनेस, मुख्य समाचार
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5 ट्रिलियन डॉलर का सपना अभी अधूरा! आखिर क्यों तय लक्ष्य से पीछे रह गई भारतीय अर्थव्यवस्था?
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भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, लेकिन 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य अभी भी अधूरा है। सरकार ने वित्त वर्ष 2024-25 तक यह उपलब्धि हासिल करने का लक्ष्य रखा था, मगर ताजा आर्थिक आंकड़े बताते हैं कि देश की जीडीपी अभी करीब 4.15 ट्रिलियन डॉलर के आसपास है। यानी लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अभी लगभग 850 अरब डॉलर का सफर बाकी है। सवाल यह है कि जब देश की अर्थव्यवस्था रुपये के हिसाब से लगातार बढ़ी है, तो फिर डॉलर के पैमाने पर लक्ष्य क्यों नहीं हासिल हो सका?

रुपये की कमजोरी ने डॉलर में जीडीपी का आकार बढ़ने नहीं दिया

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आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि सबसे बड़ा कारण भारतीय रुपये का लगातार कमजोर होना है। जब 5 ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य तय किया गया था, उस समय एक डॉलर की कीमत करीब 70 रुपये थी। अब डॉलर के मुकाबले रुपया 95.63 के स्तर तक पहुंच चुका है। ऐसे में भले ही देश की अर्थव्यवस्था रुपये के लिहाज से मजबूत हुई हो, लेकिन डॉलर में उसकी वैल्यू अपेक्षित गति से नहीं बढ़ पाई। यही वजह है कि वास्तविक विकास के बावजूद लक्ष्य दूर दिखाई दे रहा है।

कोरोना महामारी ने विकास की रफ्तार को कई साल पीछे धकेला

वर्ष 2020 में आई वैश्विक महामारी ने दुनिया की लगभग सभी अर्थव्यवस्थाओं को झटका दिया था। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। उस दौरान आर्थिक गतिविधियां ठप हो गईं और विकास दर नकारात्मक स्तर तक पहुंच गई। महामारी के कारण उत्पादन, व्यापार, निवेश और रोजगार पर असर पड़ा। इसके बाद अर्थव्यवस्था ने वापसी तो की, लेकिन लक्ष्य तक पहुंचने के लिए जो गति चाहिए थी, वह लंबे समय तक नहीं बन सकी।

महंगे कच्चे तेल ने बढ़ाया आयात बिल और रुपये पर दबाव

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। हाल के वर्षों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव, ईरान-अमेरिका टकराव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी अनिश्चितताओं के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिला। जब तेल महंगा होता है तो भारत का आयात खर्च बढ़ जाता है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार और चालू खाते पर दबाव पड़ता है, जिसका असर सीधे रुपये की कीमत पर दिखाई देता है।

वैश्विक सुस्ती के कारण निर्यात क्षेत्र को नहीं मिला अपेक्षित समर्थन

भारत की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में निर्यात की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में संघर्ष और दुनिया के कई हिस्सों में आर्थिक सुस्ती के कारण वैश्विक मांग कमजोर रही। इसका असर भारतीय निर्यात पर पड़ा। अपेक्षा के अनुरूप निर्यात नहीं बढ़ पाने से विनिर्माण क्षेत्र और औद्योगिक उत्पादन को भी सीमित गति मिली, जिससे आर्थिक विस्तार की रफ्तार प्रभावित हुई।

5 ट्रिलियन डॉलर की मंजिल कब तक हो सकती है हासिल?

हालांकि चुनौतियों के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था लगातार आगे बढ़ रही है। वर्तमान में देश की विकास दर 6.5 से 6.6 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है, जो दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज मानी जाती है। आर्थिक जानकारों और विभिन्न शोध संस्थानों का अनुमान है कि यदि विकास दर इसी तरह बनी रहती है और रुपया डॉलर के मुकाबले स्थिर रहता है, तो भारत वित्त वर्ष 2028-29 या 2029-30 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हासिल कर सकता है। यही कारण है कि फिलहाल लक्ष्य टला जरूर है, लेकिन उसकी दिशा में बढ़ता भारत अभी भी मजबूत स्थिति में माना जा रहा है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Tags: #IndianEconomy #5TrillionEconomy #GDP #EconomicGrowth #IndiaGrowthStory #BusinessNews
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