ईरान में जारी संघर्ष का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था और खासतौर पर कृषि क्षेत्र पर साफ दिखाई देने लगा है। यह संघर्ष भारत की उर्वरक (फर्टिलाइजर) आपूर्ति श्रृंखला के लिए एक बड़ा संकट बनकर उभर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी, तो इसका सबसे बड़ा असर किसानों पर पड़ेगा, खासकर खरीफ सीजन के दौरान।
- ईरान संघर्ष से भारत की खाद आपूर्ति पर असर
- खरीफ सीजन में बढ़ सकती है किसानों की चिंता
- मिडिल ईस्ट पर निर्भरता बनी बड़ी चुनौती
- महंगी होगी खाद, बढ़ेगा सरकार पर बोझ
- संकट से निपटने को केंद्र सरकार अलर्ट
एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपनी उर्वरक जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, जिसमें पश्चिम एशिया की हिस्सेदारी करीब 26 प्रतिशत है। ऐसे में इस क्षेत्र में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण आपूर्ति बाधित होने का खतरा बढ़ गया है। इससे देश में खाद की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है और कीमतों में भी तेजी देखने को मिल सकती है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत को उर्वरक आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों में जॉर्डन, रूस, मोरक्को, चीन, मिस्र, कनाडा और टोगो शामिल हैं। इनमें जॉर्डन की हिस्सेदारी करीब 19.2 प्रतिशत और रूस की 15.5 प्रतिशत है। हालांकि पश्चिम एशिया की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण बनी हुई है, क्योंकि यहां से आने वाली आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर भारत पर पड़ता है।
ईरान संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में सप्लाई बाधित होने की आशंका भी बढ़ गई है, जो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक अहम मार्ग है। इसके चलते एलएनजी (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) की कीमतों में उछाल देखा जा रहा है। एलएनजी उर्वरक उत्पादन के लिए एक महत्वपूर्ण कच्चा माल है, खासकर यूरिया के निर्माण में इसका उपयोग होता है।
भारत की यूरिया उत्पादन क्षमता काफी हद तक एलएनजी आयात पर निर्भर है, खासकर कतर से आने वाली सप्लाई पर। जैसे-जैसे यह आपूर्ति प्रभावित हो रही है, वैसे-वैसे देश के कई उर्वरक संयंत्रों ने अपने उत्पादन में कटौती शुरू कर दी है। इससे बाजार में खाद की उपलब्धता कम हो सकती है।
इसके अलावा अमोनिया, सल्फर, डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) जैसे महत्वपूर्ण उर्वरकों के कच्चे माल की आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है। ये सभी तत्व कृषि उत्पादन के लिए बेहद जरूरी हैं और इनकी कमी से फसलों की पैदावार पर सीधा असर पड़ सकता है। स्थिति को और गंभीर बनाता है वैश्विक बाजार में बढ़ती कीमतों का दबाव। रूस जैसे वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता देशों ने भी कीमतें बढ़ानी शुरू कर दी हैं, क्योंकि कई देश अब वहां से कच्चा माल खरीदने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की कमजोरी भी आयात को महंगा बना रही है, जिससे कुल लागत और बढ़ रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह संकट ऐसे समय पर आया है जब देश खरीफ सीजन की तैयारी कर रहा है। इस दौरान खाद की मांग सबसे अधिक होती है। साथ ही एल नीनो के प्रभाव की आशंका भी बनी हुई है, जो पहले से ही कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में खाद की कमी या महंगाई किसानों के लिए दोहरी मार साबित हो सकती है।
इस संभावित संकट को देखते हुए केंद्र सरकार भी सतर्क हो गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई, जिसमें पेट्रोलियम, कच्चा तेल, गैस, बिजली और उर्वरक क्षेत्रों पर पड़ने वाले प्रभाव की समीक्षा की गई। इस बैठक का उद्देश्य देश में आवश्यक संसाधनों की निर्बाध आपूर्ति, लॉजिस्टिक्स की स्थिरता और प्रभावी वितरण सुनिश्चित करना था।
सरकार यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है कि देश में खाद की कोई कमी न हो और किसानों को समय पर पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध हो सके। इसके लिए वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की तलाश, भंडारण बढ़ाने और सब्सिडी व्यवस्था को मजबूत करने जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान संघर्ष लंबा खिंचता है, तो इसका असर केवल उर्वरक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी कृषि अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। इससे खाद्य उत्पादन, कीमतों और महंगाई पर भी असर देखने को मिल सकता है। कुल मिलाकर, ईरान संघर्ष ने भारत के लिए एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। यह संकट न केवल आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियों को उजागर करता है, बल्कि यह भी बताता है कि वैश्विक घटनाओं का असर स्थानीय स्तर पर कितना गहरा हो सकता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत इस चुनौती से कैसे निपटता है और किसानों को राहत देने के लिए क्या कदम उठाए जाते हैं।





