पूर्ण विधि-विधान से श्राद्ध न कर पाएं तो ऐसे करें पितरों का स्मरण
पितृपक्ष चल रहा है और सबसे बड़ा सवाल यही है – जिनके पास पंडित, पूरा सामान, और विधि-विधान का समय नहीं है, वो क्या करें? गरुड़ पुराण का हवाला देकर इसी का जवाब दिया गया है।
1. गरुड़ पुराण क्या कहता है?
श्राद्धकर्म करने से संतुष्ट होकर पितृ आयु, पुत्र, यश, मोक्ष, स्वर्ग, कीर्ति, बल, वैभव, सुख, धन और धान्य वृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
लेकिन साथ में ये भी कहा है – श्राद्ध का मतलब सिर्फ महंगा कर्मकांड नहीं है। सामर्थ्य न हो, तो कैसे करें श्राद्धकर्म? – यही असली मुद्दा है।
2. 4 आसान विकल्प जो ग्रंथों में बताए गए हैं –
अगर आप पूर्ण श्राद्ध नहीं कर पा रहे तो ये कर सकते हैं:
a) तर्पण और प्रार्थना: अपनी क्षमता के अनुसार जल, तिल और कुश से तर्पण करें। पितरों का स्मरण करके भावपूर्वक प्रार्थना और संकल्प करें।
b) जरूरतमंद को भोजन: सबसे आसान पुण्य – किसी जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराएं अपनी सामर्थ्य के अनुसार।
c) गाय, कौए और कुत्ते को ग्रास: यदि भोजन कराने की स्थिति न हो तो गाय, कुत्ते, कौए के लिए भोजन निकालने की परंपरा भी कई परिवारों में निभाई जाती है।
d) दीपक और जल अर्पित करें: घर पर सरल रूप से कर सकते हैं स्मरण – यदि परिस्थितियां अनुकूल न हों तो घर पर स्वच्छ स्थान पर दीपक जलाकर पितरों का ध्यान किया जा सकता है, उनके नाम का स्मरण करते हुए जल अर्पित करें।
3. पितरों तक कैसे पहुंचता है आपका दिया?
बहुत सुंदर लाइन है – सूर्य की रश्मियों के साथ ही पितृगण पृथ्वी पर अवतरित होते हैं, अतः सूर्योदय के साथ ही पितरों का बोध होता है और वे आपके द्वारा किए गए भाव से प्रसन्न होते हैं।
और सूर्यास्त को हाथ जोड़कर प्रार्थना करें तो वे भाव से लीन होकर जल्दी ब्रह्म और साधन न होते तो पितरों का वास करते हैं असमय में, इसलिए आप मेरे पितरों तक मेरी भावनाओं और प्रेम से भरे प्रणाम पहुंचाएं और उनके तुल करें।
इसका अर्थ साफ है – पितरों को आपका पैसा नहीं, आपका भाव चाहिए। गीता में भी कहा गया है – पत्रं पुष्पं फलं तोयं।
आज की भागदौड़ में हर किसी के लिए 16 दिन तक रोज ब्राह्मण भोज, पंचबली, पिंडदान संभव नहीं। गरुड़ पुराण खुद कहता है – अत्यधिक खर्च, दिखावा या कर्ज लेकर श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं है।
यदि आप सच्चे मन से जल का लोटा, एक दीया, और एक रोटी भी निकालते हैं तो आपके पितर संतुष्ट होते हैं। पितृ पक्ष का मूल तर्पण है – यानी तृप्त करना। और तृप्ति धन से नहीं, श्रद्धा से होती है।





