IAS से सियासत तक…कितनी कठिन है राजनीतिक पारी?
उत्तर प्रदेश की पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल के राजनीति में उतरने के ऐलान ने ब्यूरोक्रेसी से सियासत में आने वाली महिलाओं को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। 2013 बैच की अधिकारी दिव्या मित्तल ने करीब 13 साल की प्रशासनिक सेवा के बाद इस्तीफा दिया और अब उत्तर प्रदेश को अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बताते हुए बिना किसी राजनीतिक दल में शामिल हुए जनता के साथ राजनीति करने की बात कही है।
इसी बीच मध्य प्रदेश की पूर्व डिप्टी कलेक्टर निशा बांगरे की सलाह सामने आई है। उनका कहना है कि प्रशासनिक सेवा और राजनीति, दोनों का उद्देश्य जनसेवा है। पढ़ी-लिखी और प्रशासनिक अनुभव रखने वाली महिलाओं की राजनीति में जरूरत है, लेकिन महिलाओं को केवल प्रतिनिधि बनकर नहीं, बल्कि निर्णय प्रक्रिया में पूरी भागीदारी के साथ आगे आना चाहिए।
निशा का अनुभव, दिव्या के लिए संदेश
निशा बांगरे का राजनीतिक सफर खुद कई उतार-चढ़ाव से गुजरा। 2023 में उन्होंने डिप्टी कलेक्टर पद से इस्तीफा देकर आमला विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने की तैयारी की थी। इस्तीफा स्वीकार होने में देरी हुई और कानूनी प्रक्रिया के बीच कांग्रेस ने आमला से मनोज मालवीय को उम्मीदवार घोषित कर दिया।
यानी प्रशासनिक पद से सीधे चुनावी राजनीति में उतरने के बीच सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि संगठन, जनाधार और राजनीतिक समीकरणों के बीच अपनी जगह बनाना भी है। यही वजह है कि निशा बांगरे दिव्या मित्तल को शुभकामनाओं के साथ यह याद रखने की सलाह दे रही हैं कि राजनीति की राह आसान नहीं है।
महिला भागीदारी की असली कसौटी
निशा बांगरे ने महिला प्रतिनिधित्व को लेकर भी महत्वपूर्ण सवाल उठाया है। उनका कहना है कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी केवल संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उन्हें अपने फैसले खुद लेने और राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर मिलना चाहिए।
यह चर्चा महिला आरक्षण के संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि राजनीति में कितनी महिलाएं आएंगी, बल्कि यह भी है कि वे निर्णय लेने वाली भूमिका में कितनी सक्रिय होंगी।
दिव्या के सामने दोहरी चुनौती
दिव्या मित्तल के सामने एक तरफ प्रशासनिक अनुभव की पूंजी है, तो दूसरी तरफ राजनीति की अपनी अलग कार्यशैली। अधिकारी के रूप में आदेश, प्रशासनिक तंत्र और सरकारी व्यवस्था के जरिए काम करने का तरीका होता है, जबकि राजनीति में जनता से लगातार संवाद, संगठन निर्माण और चुनावी प्रक्रिया के साथ काम करना पड़ता है।
दिव्या ने फिलहाल किसी राजनीतिक दल में शामिल होने से इनकार किया है और जनता के साथ स्वतंत्र राजनीतिक मंच बनाने की बात कही है। ऐसे में उनकी अगली चुनौती अपने विचारों को संगठन और जनसमर्थन में बदलने की होगी।
ब्यूरोक्रेसी से सियासत का पुराना रिश्ता
आईएएस या प्रशासनिक सेवा से राजनीति में आने का सिलसिला नया नहीं है। प्रशासनिक अनुभव रखने वाले लोगों के लिए राजनीति में आने का आकर्षण जननीति और शासन में प्रत्यक्ष भूमिका निभाने से जुड़ा रहा है। पूर्व आईएएस अधिकारी अजीता वाजपेयी पांडे ने भी कहा है कि नौकरी छोड़कर राजनीति में जाना व्यक्तिगत निर्णय है और इसकी आलोचना करने के बजाय इसे व्यक्ति की पसंद के तौर पर देखा जाना चाहिए।
दिव्या मित्तल और निशा बांगरे की कहानी एक बड़ा सवाल सामने रखती है—क्या प्रशासनिक अनुभव राजनीति में प्रवेश का आधार बन सकता है, और क्या उस अनुभव को मजबूत जनाधार में बदलना उतना ही आसान है? इसका जवाब चुनावी राजनीति और जनता के बीच उनकी सक्रिय भूमिका से ही सामने आएगा।





