मध्य-पूर्व में जारी तनाव और ईरान युद्ध के असर ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। सबसे बड़ा खतरा होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बंद होने से पैदा हुआ है, क्योंकि दुनिया की करीब 20 प्रतिशत ऊर्जा सप्लाई इसी समुद्री रास्ते से होती है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द हालात सामान्य नहीं हुए तो वैश्विक तेल बाजार “रेड ज़ोन” में पहुंच सकता है। इसका असर सिर्फ तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि परिवहन, विमानन, खाद्य वस्तुओं और आम लोगों की जेब पर भी भारी पड़ सकता है।
दुनिया की सबसे अहम ऊर्जा सप्लाई लाइन पर मंडराया बड़ा खतरा
होर्मुज़ Hormuz Strait दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में गिना जाता है। यह सिर्फ 21 किलोमीटर चौड़ा समुद्री रास्ता है, लेकिन इसके जरिए हर दिन करोड़ों बैरल तेल और गैस दुनिया के अलग-अलग देशों तक पहुंचती है। मौजूदा तनाव के कारण यहां जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी यानी IEA के प्रमुख Fatih Birol ने कहा कि इस संकट की वजह से वैश्विक बाजार से प्रतिदिन लगभग 1.4 करोड़ बैरल तेल की आपूर्ति कम हो गई है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह रास्ता लंबे समय तक बंद रहा तो दुनिया को बड़े सप्लाई संकट का सामना करना पड़ सकता है। मार्च में IEA और उसके सदस्य देशों ने रिकॉर्ड 40 करोड़ बैरल तेल रिज़र्व जारी किए थे, लेकिन लगातार खपत बढ़ने के कारण अब वे भंडार भी तेजी से कम हो रहे हैं।
तेल बाजार के ‘रेड ज़ोन’ में पहुंचने का क्या मतलब है और क्यों बढ़ी चिंता
ऊर्जा बाजार में “रेड ज़ोन” ऐसी स्थिति को कहा जाता है जब मांग और सप्लाई के बीच संतुलन टूटने लगता है और बाजार को संभालना मुश्किल हो जाता है। इसका मतलब है कि तेल के भंडार इतने कम हो जाते हैं कि सप्लाई में थोड़ी भी रुकावट कीमतों को तेजी से ऊपर ले जा सकती है।
इस समय ब्रेंट क्रूड ऑयल 104 से 105 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है, जबकि युद्ध शुरू होने से पहले इसकी कीमत करीब 72 डॉलर थी। मई की शुरुआत में यह 114 डॉलर तक पहुंच चुका था। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर हालात और बिगड़े तो तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती हैं। इसका असर दुनिया भर में पेट्रोल, डीजल और विमान ईंधन की कीमतों पर पड़ेगा।
भारत समेत कई देशों में ईंधन महंगा होने लगा और दबाव बढ़ा
तेल संकट का असर भारत में भी दिखाई देने लगा है। विमान ईंधन यानी जेट फ्यूल की कीमतों में अप्रैल और मई के दौरान बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई। दिल्ली में इसकी कीमत 1,511 डॉलर प्रति किलोलीटर तक पहुंच गई थी। इसके बाद दिल्ली और मुंबई सरकारों ने VAT में कटौती कर राहत देने की कोशिश की।
इसके अलावा पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भी तेजी आई। दिल्ली और मुंबई समेत कई शहरों में ईंधन महंगा हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर होर्मुज़ जलडमरूमध्य जल्दी नहीं खुला तो आने वाले हफ्तों में कीमतों में और उछाल देखने को मिल सकता है। इसका सीधा असर ट्रांसपोर्ट, खेती, खाद्य वस्तुओं और महंगाई पर पड़ेगा।
गर्मियों की छुट्टियों और बढ़ती यात्रा मांग ने संकट को और बढ़ाया
इस समय दुनिया के कई देशों में गर्मियों की छुट्टियां शुरू हो चुकी हैं, जिससे हवाई यात्रा और ईंधन की मांग तेजी से बढ़ रही है। एयरलाइंस कंपनियां पहले ही महंगे जेट फ्यूल की मार झेल रही हैं। ऐसे में वे टिकट कीमतों में बढ़ोतरी करने को मजबूर हो सकती हैं।
ऊर्जा विश्लेषकों के अनुसार मौजूदा हालात 2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध से भी ज्यादा गंभीर माने जा रहे हैं। उस समय भी तेल बाजार पर असर पड़ा था, लेकिन इस बार सप्लाई रुकावट का दायरा कहीं बड़ा है। अफ्रीका, एशिया और यूरोप के कई गरीब देशों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है। वहां खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ सकती हैं।
अगर जुलाई तक संकट जारी रहा तो दुनिया को झेलना पड़ सकता है बड़ा आर्थिक झटका
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जुलाई तक होर्मुज़ जलडमरूमध्य में सामान्य आवाजाही बहाल नहीं हुई तो वैश्विक तेल संकट और गहरा सकता है। कई देशों के रणनीतिक तेल भंडार तेजी से खत्म हो सकते हैं। इसके बाद कंपनियां वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करेंगी, जिससे कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिलेगा।
अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम फिलहाल लागू है, लेकिन हालात पूरी तरह स्थिर नहीं माने जा रहे। रिपोर्ट्स के मुताबिक Donald Trump प्रशासन बातचीत के जरिए समाधान की कोशिश कर रहा है। हालांकि अगर संघर्ष दोबारा बढ़ा और ऊर्जा ढांचों पर हमले हुए, तो तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकती हैं।
IEA ने साफ कहा है कि दुनिया को लंबे समय तक संकट से बचाने के लिए सबसे जरूरी कदम होर्मुज़ जलडमरूमध्य को जल्द से जल्द फिर से खोलना होगा।