ग्लेशियर का दर्द और क्षेत्रीय समाधान—हिमालय पर्यावरण सहयोग की तत्काल आवश्यकता

26 अगस्त 2026 को नेपाल में उच्च-स्तरीय ग्लेशियर चट्टान विस्फोट
हुआ। समुद्र तल से लगभग 5,300 मीटर की ऊँचाई पर स्थित ग्लेशियर
क्षेत्र से बर्फ का विशाल खंड टूटकर गिरा और खड़ी घाटियों से होते हुए
अत्यधिक गति से बहता हुआ अंततः एक विशाल भूस्खलन में बदल
गया। इसकी शुरुआत से लेकर चीन के शीत्सांग(तिब्बत) के चीलोंग
बंदरगाह पर प्रहार करने तक मात्र 7 से 8 मिनट का समय लगा। इस
भूस्खलन आपदा ने चीन और नेपाल दोनों देशों में भारी जनहानि की है,
जिसमें अब तक सैंकड़ों लोगों की मौत और हजारों लोग लापता हैं। यह
कोई अलग-थलग प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन के
दीर्घकालिक प्रभाव के तहत हिमालय क्रायोस्फीयर की अस्थिरता का एक
भीषण विस्फोट है, और यह सभी हिमालयी देशों के लिए एक गंभीर
चेतावनी है।

यह आपदा बिना किसी पूर्व संकेत के नहीं आई। चीनी विज्ञान अकादमी
के छेंगतू पर्वत आपदा एवं पर्यावरण संस्थान के निदेशक खांग शिछांग ने
बताया कि पिछले 60 वर्षों में, छिंगहाई-शीत्सांग पठार के ग्लेशियरों में
24% की कमी आई है, जिसमें हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर संकुचन दर
लगभग 40% है। चीन की तीन ग्लेशियर सूचियों से पता चलता है कि
छिंगहाई-शीत्सांग पठार के ग्लेशियर का क्षेत्रफल 61,000 वर्ग किलोमीटर
से घटकर 39,000 वर्ग किलोमीटर रह गया है। ग्लेशियरों के लगातार
पिघलने से सीधे तौर पर ग्लेशियर झीलों की संख्या और क्षेत्रफल में भारी
वृद्धि हुई है। वर्तमान में छिंगहाई-शीत्सांग पठार में 14,000 से अधिक
ग्लेशियर झीलें हैं, जिनका कुल क्षेत्रफल 1,100 वर्ग किलोमीटर से अधिक
है। दक्षिणी सीमा पर हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों का क्षेत्रफल प्रति
वर्ष लगभग 1% बढ़ रहा है, और 100 से अधिक ग्लेशियर झीलों को उच्च
जोखिम स्तर पर वर्गीकृत किया गया है। ग्लोबल वार्मिंग की पृष्ठभूमि में,
हिमालय के साथ-साथ उच्च-ऊँचाई वाली ग्लेशियर झीलों के टूटने और
चट्टान-बर्फ के ढहने से भूस्खलन का जोखिम लगातार बढ़ रहा है। इसी

क्षेत्र में 8 जुलाई 2025 को ग्लेशियर झील के टूटने से अचानक बाढ़ और
भूस्खलन हुआ, जिसमें 17 चीनी नागरिक लापता हो गए।
ग्लेशियर की कोई सीमा नहीं होती, और आपदाएँ पूर्व या पश्चिम नहीं
पूछतीं। इस आपदा से सबसे गहरा सबक यह है कि हिमालय की
पर्यावरणीय समस्याएँ कभी भी किसी एक देश का "घरेलू मामला" नहीं
रही हैं। ग्लेशियर सीमाओं को पार करते हैं, नदियाँ कई देशों से होकर
बहती हैं, और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव राजनीतिक सीमाओं से सीमित
नहीं होता। नेपाल की ओर से ग्लेशियर के ढहने से चीनी क्षेत्र में बड़े
पैमाने पर जनहानि हुई, और ग्लेशियर के पिघले पानी से बनने वाली
नदियाँ इस क्षेत्र में करोड़ों लोगों का पोषण करती हैं। यही कारण है कि
हिमालय पर्यावरण संरक्षण को एकतरफा कार्रवाई की तार्किकता से परे
जाकर वास्तविक क्षेत्रीय सहयोग की ओर बढ़ना चाहिए। जुलाई 2026 में,
पाँचवाँ चीनी शीत्सांग "ट्रांस हिमालय" अंतरराष्ट्रीय सहयोग मंच शीत्सांग
के न्यिंगची में आयोजित किया गया, जिसमें 30 से अधिक देशों के
गणमान्य व्यक्तियों और विशेषज्ञों ने भाग लिया, जिसमें पाकिस्तान के
जलवायु परिवर्तन मंत्री जैसे वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। चीन ने भारत,
पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका आदि देशों के साथ पर्यावरण सहयोग समझौतों
पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन मौजूदा सहयोग ढाँचा बढ़ती चुनौतियों का
सामना करने के लिए अभी भी अपर्याप्त है।

यह आपदा न केवल निगरानी एवं प्रारंभिक चेतावनी में कमियों को
उजागर करती है, बल्कि संपूर्ण क्षेत्रीय आपदा निवारण प्रणाली की
कमजोरियों को भी उजागर करती है। ग्लेशियर के टूटने से आपदा आने
तक केवल 7-8 मिनट का समय होता है, भले ही असामान्यता का समय
पर पता चल जाए, लेकिन नीचे की ओर के लोगों के पास सुरक्षित स्थान
पर पहुँचने के लिए बहुत कम समय होता है। इस प्रकार की "चेतावनी
देना मुश्किल, बचाव करना मुश्किल" नई ग्लेशियर आपदा ने सभी
हिमालयी देशों के लिए निगरानी नेटवर्क के सह-निर्माण, डेटा
अंतरसंचालनीयता, चेतावनी तंत्र समन्वय और संयुक्त आपातकालीन
प्रतिक्रिया के मामले में अभूतपूर्व तात्कालिकता पैदा कर दी है। सबसे

पहले, ग्लेशियर निगरानी में कमियों को दूर किया जाना चाहिए। इस क्षेत्र
में ग्लेशियरों की संख्या विशाल है और वे व्यापक रूप से वितरित हैं,
अकेले किसी एक देश के लिए व्यापक निगरानी प्रणाली स्थापित करना
मुश्किल है। चीन, नेपाल, पाकिस्तान और अन्य देशों को उपग्रह रिमोट
सेंसिंग निगरानी में समन्वय बढ़ाना चाहिए, ग्लेशियर परिवर्तन डेटा साझा
करना चाहिए और उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की संयुक्त रूप से पहचान
करनी चाहिए। साथ ही, सभी देशों को बहुपक्षीय ढाँचे के तहत एक संयुक्त
चेतावनी केंद्र स्थापित करने को बढ़ावा देना चाहिए, निगरानी डेटा से
चेतावनी जारी करने और फिर आपातकालीन प्रतिक्रिया तक पूरी श्रृंखला
सूचना चैनल को सुगम बनाना चाहिए, यह सुनिश्चित करना चाहिए कि
किसी भी देश में निगरानी असामान्यता पहले समय में सभी संभावित
प्रभावित पड़ोसी देशों को सूचित की जाए, ताकि बहुमूल्य सुरक्षा समय
प्राप्त किया जा सके।

हिमालय को "एशिया की जल मीनार" के रूप में जाना जाता है, इसकी
सुरक्षा अरबों लोगों के अस्तित्व और विकास से जुड़ी है। जैसा कि नेपाल
राष्ट्रीय प्रोफेसर संघ के अध्यक्ष बालमुकुंद रेग्मी ने पीपल्स डेली में लिखा
है: "विशाल हिमालय ने दोनों देशों को बारीकी से जोड़ा है, सीमा-पार
आपदाओं ने पीड़ा पहुँचाई है, जिससे लोगों को साझा भाग्य के सही अर्थ
को समझने में मदद मिली है।" इस आपदा की भारी कीमत हमें बताती
है कि जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौती का सामना करते हुए, कोई
भी देश अकेले सुरक्षित नहीं रह सकता, और कोई भी देश अकेले इसका
सामना नहीं कर सकता। चीन, नेपाल, पाकिस्तान और सभी हिमालयी देश,
पारिस्थितिक जोखिमों के सह-भागी हैं। निगरानी नेटवर्क को बेहतर बनाने
से लेकर चेतावनी जानकारी साझा करने, संयुक्त वैज्ञानिक अनुसंधान से
लेकर समन्वित आपदा न्यूनीकरण, वर्तमान संकट से निपटने से लेकर
दीर्घकालिक प्रबंधन की योजना बनाने तक — प्रत्येक कार्य को राष्ट्रीय
सीमाओं से परे दृष्टि और कार्रवाई की आवश्यकता होती है।
चीनी विज्ञान अकादमी के छेंगतू पर्वत आपदा एवं पर्यावरण संस्थान के
शोधकर्ता न्यी योंग ने बताया कि ग्लेशियर आपदाओं की सबसे बड़ी

जोखिम विशेषता "श्रृंखलाबद्ध प्रवर्धन प्रभाव" है — बर्फ का टूटना,
चट्टान-बर्फ का गिरना, और ग्लेशियर झील का टूटना आसानी से
श्रृंखलाबद्ध द्वितीयक आपदाओं का निर्माण कर सकता है, जिनकी
विनाशकारी शक्ति परत दर परत बढ़ती जाती है। इसके अनुरूप, हिमालयी
पर्यावरण संरक्षण और आपदा निवारण को भी "श्रृंखलाबद्ध" अंतरराष्ट्रीय
सहयोग की आवश्यकता है, किसी भी कड़ी की कमी पूरे तंत्र की विफलता
का कारण बन सकती है। आपदा आ चुकी है, जिन्होंने जान गँवाई है उन्हें
वापस नहीं लाया जा सकता, लेकिन इससे सीखे गए सबक को साझा घर
की रक्षा के लिए एक शक्तिशाली प्रेरणा में बदला जा सकता है — यह
मृतकों को सबसे अच्छी श्रद्धांजलि है और आने वाली पीढ़ियों के लिए
सबसे जिम्मेदार विकल्प है।

(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)

 

 

 

Exit mobile version