भारतीय सिनेमा में संतों और आध्यात्मिक व्यक्तित्वों की कहानियां बहुत कम पर्दे तक पहुंच पाती हैं। वजह सिर्फ यह नहीं कि ऐसी फिल्मों का बाजार सीमित माना जाता है। असली चुनौती यह है कि जब किरदार लाखों लोगों की आस्था से जुड़ा हो, तो उसे पर्दे पर उतारने में कहानी, शोध, अभिनय और संवेदनशीलता—चारों का संतुलन जरूरी हो जाता है। नीम करौली बाबा की जीवनी पर बनी फिल्म ‘हनुमान अंश’ इसी चुनौती से निकली कहानी है। इसकी सबसे बड़ी खासियत शायद फिल्म नहीं, बल्कि फिल्म के पीछे की करीब डेढ़ दशक लंबी यात्रा है।
2009 में शुरू हुई रिसर्च, 2023 में बढ़ा दायरा
डॉक्टर विशाल चतुर्वेदी ने 2009 में नीम करौली बाबा के जीवन पर रिसर्च शुरू की। शुरुआती मकसद बाबा की जीवनी को सिल्वर स्क्रीन तक पहुंचाना था, लेकिन समय के साथ यह एक सामान्य बायोपिक से कहीं बड़ा प्रोजेक्ट बनता गया। 2017 तक बाबा के जीवन से जुड़े अलग-अलग प्रसंग एक व्यवस्थित कहानी का रूप लेने लगे। इसके बाद 2023 में रिसर्च का दायरा और विस्तृत किया गया। किताबों, यात्राओं, लोगों से बातचीत और उपलब्ध दस्तावेजों के जरिए बाबा के जीवन और उनके प्रभाव से जुड़े प्रसंगों को समझने की कोशिश हुई। यानी जिस कहानी को दर्शक आज करीब ढाई घंटे के सिनेमाई अनुभव में देखता है, उसके पीछे वर्षों की खोज और तैयारी है।
कहानी तैयार थी, लेकिन बाजार तैयार नहीं था
रिसर्च पूरी हुई, स्क्रिप्ट बनी और अगली चुनौती सामने आई—इसे बनाया कैसे जाए? विशाल ने कहानी को वेब सीरीज के रूप में बनाने के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्म्स का रुख किया, लेकिन संतों की कहानी में निवेश को लेकर अपेक्षित रुचि नहीं मिली। बाजार के लिहाज से यह प्रोजेक्ट जोखिम वाला माना गया। यहीं से इस फिल्म की असली परीक्षा शुरू हुई। ओटीटी के इनकार के बाद प्रोजेक्ट बंद नहीं हुआ। फिल्म बनाने का फैसला कायम रहा। लेकिन इसके लिए निवेश जुटाना आसान नहीं था। बड़े स्टार नहीं थे, विषय पारंपरिक कमर्शियल फॉर्मूले से अलग था और फिल्म का आधार आस्था तथा आध्यात्मिक जीवन था। आखिरकार कुछ निवेशकों ने कहानी और विशाल की प्रतिबद्धता पर भरोसा किया। यही भरोसा फिल्म को स्क्रिप्ट से सेट तक ले गया।
स्टार नहीं, किरदार सबसे बड़ा
फिल्म की कास्टिंग भी अपने आप में एक प्रयोग रही। विशाल की कोशिश थी कि नीम करौली बाबा की भूमिका निभाने वाला अभिनेता अपनी स्टार इमेज के साथ पर्दे पर न आए। मकसद था कि दर्शक अभिनेता को नहीं, किरदार को देखें। यह फैसला व्यावसायिक नजरिए से जोखिम भरा था, लेकिन आध्यात्मिक व्यक्तित्व की बायोपिक के लिए इसका अपना महत्व है। अगर किसी लोकप्रिय स्टार की स्क्रीन इमेज बहुत मजबूत हो, तो दर्शक कई बार किरदार के बजाय अभिनेता को देखने लगता है। यहां प्राथमिकता बाबा की गरिमा और चरित्र की विश्वसनीयता को दी गई। फिल्म के निर्माण के दौरान भी विषय के प्रति इसी संवेदनशीलता को बनाए रखने की कोशिश हुई। सेट पर शाकाहारी भोजन रखा गया, रोज आरती और हनुमान चालीसा का पाठ किया गया। फिल्म की टीम के लिए यह सिर्फ शूटिंग नहीं, बल्कि आस्था से जुड़े विषय पर काम करने का अनुभव भी था।
जब मुख्य अभिनेता बीमार हुआ, सेकंड असिस्टेंट बना बाबा
फिल्म की कहानी में सबसे अप्रत्याशित मोड़ तब आया जब मुख्य भूमिका के लिए चुना गया अभिनेता बीमार पड़ गया। अब सवाल था—बाबा की भूमिका कौन निभाएगा? यहीं प्रोडक्शन टीम के भीतर से एक ऐसा नाम सामने आया जिसकी शायद किसी ने कल्पना नहीं की थी। सेकंड असिस्टेंट डायरेक्टर शोभिनव सत्य को मुख्य भूमिका की जिम्मे दारी दी गई। जो व्यक्ति अब तक कैमरे के पीछे काम कर रहा था, वह अचानक कैमरे के सामने सबसे महत्वपूर्ण किरदार बन गया। यह फैसला किसी स्थापित अभिनेता को लेने से कहीं ज्यादा जोखिम भरा था। लेकिन फिल्म की टीम ने इसे स्वीकार किया। आस्था के नजरिए से टीम इस घटना को हनुमान बाबा की इच्छा से जोड़ती है। यह विश्वास फिल्म की निर्माण यात्रा को एक आध्यात्मिक कहानी का रंग भी देता है।
चमत्कार नहीं, इंसान के भीतर बदलाव भी कहानी
किसी संत की बायोपिक बनाते समय सबसे आसान रास्ता उनके चमत्कारों को कहानी का केंद्र बनाना होता है। लेकिन यही रास्ता कहानी को एकतरफा भी कर सकता है। ‘हनुमान अंश’ में कोशिश बाबा की लीलाओं के साथ उनकी करुणा, सेवा, मानवीय संवेदनाओं और लोगों के जीवन पर पड़े प्रभाव को सामने लाने की है। यही फिल्म का सबसे महत्वपूर्ण क्रिएटिव एंगल है। कहानी सिर्फ यह बताने की कोशिश नहीं करती कि नीम करौली बाबा कौन थे, बल्कि यह सवाल भी उठाती है कि उनके संपर्क में आने वाले लोगों के जीवन में क्या बदला। यानी संत की कहानी को सिर्फ धार्मिक आख्यान की तरह नहीं, बल्कि मानवीय बदलाव की कहानी के रूप में देखने की कोशिश की गई है।
बॉक्स ऑफिस ने दिया एक संकेत
फिल्म ने अब तक करीब 100 करोड़ रुपये का कारोबार किया है। अगर बिना बड़े स्टार और बड़े कमर्शियल फॉर्मूले वाली फिल्म दर्शकों तक अपनी पहुंच बना रही है, तो इसका अर्थ सिर्फ एक फिल्म की कमाई नहीं है। यह कंटेंट आधारित सिनेमा के लिए एक संकेत भी हो सकता है। बाजार में अक्सर माना जाता है कि बड़े बजट, बड़े स्टार और बड़े प्रचार के बिना दर्शकों को सिनेमाघर तक लाना मुश्किल है। लेकिन ऐसे प्रोजेक्ट बताते हैं कि अगर विषय का अपना दर्शक वर्ग है और कहानी ईमानदारी से कही गई है, तो सीमित संसाधनों के बावजूद जगह बनाई जा सकती है।
बायोपिक से ट्राइलॉजी तक
विशाल चतुर्वेदी की योजना इस कहानी को एक फिल्म पर खत्म करने की नहीं है। नीम करौली बाबा के जीवन पर ट्राइलॉजी बनाने की योजना है। अगर यह योजना आगे बढ़ती है, तो मौजूदा फिल्म सिर्फ एक शुरुआत होगी। और इसका महत्व बॉक्स ऑफिस से बड़ा है। भारतीय सिनेमा में आध्यात्मिक और संत परंपरा से जुड़े कई ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनकी कहानियां अभी भी बड़े पर्दे पर पर्याप्त जगह नहीं पा सकी हैं। अगर ‘हनुमान अंश’ का प्रयोग सफल होता है, तो फिल्मकारों और निवेशकों को यह भरोसा मिल सकता है कि आध्यात्मिक विषय भी दर्शकों के लिए सिनेमाई अनुभव बन सकते हैं—बशर्ते कहानी सिर्फ आस्था पर निर्भर न हो, बल्कि मजबूत रिसर्च और मानवीय दृष्टिकोण के साथ पेश की जाए।
असली कहानी फिल्म से पहले शुरू हो गई थी
दरअसल, ‘हनुमान अंश’ की सबसे बड़ी कहानी फिल्म रिलीज होने के बाद नहीं, बल्कि 2009 में शुरू हुई थी। करीब डेढ़ दशक की रिसर्च, 2023 में रिसर्च का विस्तार, ओटीटी का इनकार, निवेशकों को मनाने की चुनौती, स्टार के बजाय किरदार को प्राथमिकता देना और फिर मुख्य अभिनेता के बीमार पड़ने के बाद सेकंड असिस्टेंट डायरेक्टर को बाबा की भूमिका सौंपना—यह पूरा सफर किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं है। इस कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि हर कहानी को बड़े स्टार की जरूरत नहीं होती। कई बार कहानी की ताकत ही उसका सबसे बड़ा स्टार बन जाती है। ‘हनुमान अंश’ के सामने अब असली चुनौती सिर्फ बॉक्स ऑफिस नहीं, बल्कि यह है कि क्या यह नीम करौली बाबा की कहानी को उन दर्शकों तक पहुंचा पाएगी जो आध्यात्मिक विषयों से जुड़ते हैं और साथ ही उन दर्शकों को भी आकर्षित कर पाएगी जो सिर्फ एक अच्छी कहानी देखने सिनेमाघर पहुंचते हैं। अगर यह संतुलन बन गया, तो यह फिल्म सिर्फ एक बायोपिक नहीं रहेगी—यह भारतीय सिनेमा में आध्यात्मिक और संत कथाओं के लिए एक नए रास्ते की शुरुआत बन सकती है।





