मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर देश की राजनीति में विवाद लगातार बढ़ रहा है। विपक्ष चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है। वहीं चुनाव आयोग इन आरोपों को खारिज करता रहा है और कहता है कि SIR समेत उसके फैसले नियमों के तहत लिए गए हैं। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने भी SIR से जुड़े फैसलों और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर जवाब मांगा है। अदालत ने कहा है कि यदि कोई आदेश कानून के अनुरूप नहीं है या आयोग के तीन सदस्यों की सर्वसम्मति अथवा बहुमत से पारित नहीं हुआ है, तो उसे रद्द किया जा सकता है।
क्या ज्ञानेश कुमार का मुद्दा बड़ा होता जा रहा है?
ज्ञानेश कुमार को लेकर विवाद अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं है। SIR से जुड़े मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं पहुंची हैं और अदालत ने चुनाव आयोग तथा संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगा है। इससे पूरे मामले का कानूनी पक्ष भी महत्वपूर्ण हो गया है। विपक्ष इसे मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जोड़ रहा है, जबकि चुनाव आयोग अपने फैसलों को नियमों के अनुरूप बता रहा है।
क्या इस मुद्दे का देश की राजनीति पर कोई असर पड़ेगा?
इस विवाद का राजनीतिक असर पहले ही दिखाई देने लगा है। 6 और 7 अक्टूबर को दिल्ली में विपक्षी सांसदों ने प्रदर्शन किया और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठाई। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत कई नेताओं ने SIR और चुनाव प्रक्रिया से जुड़े सवालों को लेकर धरना दिया, जिसके बाद पुलिस ने कई नेताओं को हिरासत में लिया।
क्यों कांग्रेस इस मुद्दे पर लगातार सरकार को घेरने की कोशिश कर रही?
कांग्रेस और उसके सहयोगी दल SIR को सीधे मतदाता के अधिकार से जोड़ रहे हैं। राहुल गांधी समेत विपक्षी नेता आरोप लगा रहे हैं कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर बदलाव से योग्य मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं। इसी मुद्दे को लेकर विपक्ष लगातार सड़क से संसद तक दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि ये विपक्ष के आरोप हैं, जिन्हें चुनाव आयोग स्वीकार नहीं करता।
क्या कांग्रेस के आरोपों में कोई दम है या सिर्फ विपक्ष की मौजूदगी दिखाने के लिए रोज प्रदर्शन किए जा रहे हैं?
इस सवाल का अंतिम जवाब अभी सामने नहीं आया है। सितंबर में रिपोर्ट सामने आई थी कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों पर आपत्ति दर्ज की थी। रिपोर्ट में SIR, मतदाता डेटा और अन्य चुनावी प्रक्रियाओं से जुड़े मुद्दों का उल्लेख था। हालांकि चुनाव आयोग के अधिकारियों ने कहा था कि SIR समेत फैसले तीनों आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे। इसलिए आरोप और आयोग का पक्ष दोनों सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा हैं।
विपक्ष के इन प्रदर्शनों पर सरकार का क्या रुख हो सकता है?
सरकार और भाजपा विपक्ष के आरोपों को स्वीकार नहीं कर रहे हैं और चुनाव आयोग की प्रक्रिया का बचाव कर रहे हैं। दूसरी ओर विपक्ष आंदोलन को आगे बढ़ाने की तैयारी में है। अब इस पूरे विवाद की दिशा सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, चुनाव आयोग के जवाब और आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम से तय होगी। फिलहाल SIR और ज्ञानेश कुमार का मुद्दा देश की राजनीति में लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है।