सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया लंबे समय तक एक ऐसी व्यवस्था में रही, जहां अमेरिका की आर्थिक, सैन्य और रणनीतिक ताकत का प्रभाव सबसे ज्यादा दिखाई देता था… लेकिन पिछले दो दशक में वैश्विक राजनीति की तस्वीर तेजी से बदली है… और इसी बदलाव की कहानी में ब्रिक्स का विस्तार और उसकी बढ़ती भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है…
ब्रिक्स की शुरुआत भले ही रूस, भारत और चीन के बीच संवाद से हुई हो… लेकिन आज यह मंच केवल कुछ उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रह गया है… यह उन देशों की सामूहिक आवाज बनने की कोशिश कर रहा है, जो वैश्विक फैसलों में अधिक प्रतिनिधित्व और अधिक संतुलन चाहते हैं…
आरआईसी से ब्रिक्स तक… लंबा सफर
ब्रिक्स की कहानी अचानक शुरू नहीं हुई… इसकी वैचारिक नींव रूस-भारत-चीन यानी आरआईसी के संवाद में दिखाई देती है…
भारत और चीन के बीच अविश्वास… चीन की आर्थिक ताकत और दूसरे सदस्यों के बीच बड़ा अंतर… रूस-पश्चिम संघर्ष… अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाएं… अलग-अलग विदेश नीति प्राथमिकताएं… ये सभी इस समूह के सामने गंभीर प्रश्न हैं…
ब्रिक्स के पास यूरोपीय संघ जैसी साझा संधि, साझा बजट या मजबूत स्थायी राजनीतिक ढांचा नहीं है…
इसलिए इसे एकीकृत राजनीतिक या आर्थिक संघ मानना जल्दबाजी होगी…
सबसे बड़ा सवाल यह भी रहेगा कि क्या ब्रिक्स वास्तव में समान भागीदारी वाला बहुध्रुवीय मंच बन पाएगा या धीरे-धीरे चीन की आर्थिक और रणनीतिक ताकत का प्रभाव इसमें ज्यादा बढ़ जाएगा…
यहीं भारत की भूमिका बेहद अहम हो जाती है…
भारत के लिए चुनौती है कि वह ब्रिक्स को किसी एक देश-केंद्रित मंच बनने से रोके और इसे वास्तविक बहुपक्षीय सहयोग का मंच बनाए रखे…
आगे की राह… टकराव नहीं, संतुलन
ब्रिक्स की असली परीक्षा अभी बाकी है…
सिर्फ सदस्य देशों की संख्या बढ़ना सफलता नहीं है… असली सफलता तब होगी जब यह मंच वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार, विकासशील देशों के लिए वित्त, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, तकनीकी सहयोग और वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर ठोस परिणाम दे…
दुनिया शायद फिर से शीत युद्ध जैसी दो ध्रुवीय व्यवस्था नहीं चाहती… बल्कि एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ रही है जहां कई शक्तियां एक साथ प्रभाव डालें…
और यही बहुध्रुवीय दुनिया ब्रिक्स की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा दिखाई देती है…
ब्रिक्स को न तो पश्चिम विरोधी सैन्य गठबंधन समझना सही होगा और न ही इसे तुरंत किसी नए वैश्विक शासन तंत्र का विकल्प मानना…
लेकिन इसे नजरअंदाज करना भी मुश्किल है…
आरआईसी से शुरू हुआ संवाद… ब्रिक बना… ब्रिक्स बना… और अब ग्लोबल साउथ की बड़ी आवाज बनने की कोशिश कर रहा है…
इसके सामने अंतर्विरोध हैं, लेकिन इसकी प्रासंगिकता भी उतनी ही बड़ी है…
आने वाले वर्षों में दुनिया का सवाल शायद यह नहीं होगा कि अमेरिका जीतेगा या ब्रिक्स… बल्कि सवाल यह होगा कि क्या दुनिया एक ऐसी व्यवस्था बना पाएगी, जिसमें अमेरिका, चीन, भारत, रूस, यूरोप और ग्लोबल साउथ की दूसरी शक्तियां एक-दूसरे को संतुलित करते हुए साथ चल सकें…
और अगर ऐसा हुआ… तो ब्रिक्स की सबसे बड़ी उपलब्धि किसी एक शक्ति को हराना नहीं, बल्कि एकध्रुवीय दुनिया से संतुलित बहुध्रुवीय दुनिया की ओर संक्रमण को गति देना होगी…