भारत में राजनीतिक दल अब युवाओं और खासकर Gen Z तक पहुंच बनाने के लिए अपने तरीके तेजी से बदल रहे हैं। इंस्टाग्राम पर सवाल-जवाब, छोटे वीडियो, कॉलेजों में बातचीत, मीम्स और एआई जैसे मुद्दों के जरिए नेता युवा मतदाताओं से जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इसके पीछे बड़ी वजह यह है कि 2029 के लोकसभा चुनाव तक Gen Z देश के सबसे प्रभावशाली युवा वोटर समूहों में शामिल हो जाएगी।
Gen Z आखिर कौन है और राजनीति के लिए इतनी महत्वपूर्ण क्यों हो गई है?
आमतौर पर 1997 से 2012 के बीच जन्म लेने वाले लोगों को Gen Z कहा जाता है। इस पीढ़ी में कॉलेज छात्र, नौकरी करने वाले युवा और पहली बार वोट देने वाले लोग शामिल हैं। 18 से 29 साल की उम्र के लोग भारत की वोटर आबादी का करीब एक-तिहाई हिस्सा हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में युवाओं की हिस्सेदारी और भी ज्यादा है। ऐसे में 2029 के चुनाव में युवा मतदाताओं की पसंद चुनावी नतीजों पर असर डाल सकती है।
परीक्षा, नौकरी और भर्ती में देरी ने युवाओं की नाराजगी को राजनीतिक मुद्दा बनाया
युवा वर्ग से जुड़े आंदोलनों ने भी राजनीतिक दलों का ध्यान खींचा है। परीक्षा में गड़बड़ी, भर्ती में देरी और रोजगार के अवसरों को लेकर हुए प्रदर्शनों ने दिखाया कि युवा सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी जताने के साथ उसे सड़क तक भी ले जा सकते हैं। कई बार किसी पारंपरिक राजनीतिक संगठन के बजाय सोशल मीडिया पेज, वायरल वीडियो या ऑनलाइन समुदाय ही युवाओं को एकजुट कर देते हैं।
बीजेपी से कांग्रेस तक, Gen Z तक पहुंचने के लिए अलग रणनीति तैयार
बीजेपी ने Gen Z तक पहुंच बनाने के लिए विशेष टीम तैयार की है। पार्टी की योजना इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, रेडिट और छोटे वीडियो के जरिए युवाओं से संवाद बढ़ाने की है। इसके साथ कॉलेज, विश्वविद्यालय, कोचिंग सेंटर और खेल क्लबों में भी बातचीत की तैयारी है। एआई ट्रेनिंग, ऑनलाइन कोचिंग, टैबलेट, कौशल विकास और उद्यमिता से जुड़ी योजनाओं को भी युवाओं तक पहुंचाने पर जोर दिया जा रहा है।
कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी भी युवाओं से सीधे संवाद की कोशिश कर रहे हैं। उनके इंस्टाग्राम सवाल-जवाब कार्यक्रमों में छात्रों और Gen Z से जुड़े सवाल लिए गए हैं। परीक्षा विवाद और युवाओं से जुड़े दूसरे मुद्दों पर भी वह छात्रों और अभिभावकों से बातचीत करते नजर आए हैं।
युवा वोटर सिर्फ सोशल मीडिया और योजनाओं से प्रभावित नहीं होने वाला
Gen Z को एक जैसा वोट बैंक मानना राजनीतिक दलों के लिए बड़ी गलती हो सकती है। दिल्ली का कॉलेज छात्र, पंजाब का युवा किसान, उत्तर प्रदेश का आईटीआई छात्र या बेंगलुरु में काम करने वाला युवा अलग-अलग समस्याओं से जूझता है। किसी के लिए नौकरी और परीक्षा महत्वपूर्ण है तो कोई महंगाई, सुरक्षा, जलवायु, सामाजिक न्याय या अभिव्यक्ति की आजादी को प्राथमिकता दे सकता है।
युवाओं को केवल सोशल मीडिया पर मौजूदगी या योजनाओं की घोषणा से प्रभावित करना आसान नहीं होगा। टैबलेट तभी उपयोगी है जब उसके साथ इंटरनेट और अच्छी पढ़ाई की सुविधा मिले। कौशल प्रमाणपत्र तभी मायने रखता है जब उससे नौकरी का रास्ता खुले। इसी तरह स्टार्टअप के लिए पैसा मिलने के साथ सही मार्गदर्शन और अवसर भी जरूरी हैं।
2029 की असली लड़ाई सोशल मीडिया की नहीं, युवाओं के भरोसे की होगी
राजनीतिक दल Gen Z को आकर्षित करने के लिए रील, मीम और अनौपचारिक बातचीत का सहारा ले रहे हैं, लेकिन युवा यह भी देखेंगे कि किए गए वादों का कितना असर जमीन पर हुआ। निष्पक्ष परीक्षा, समय पर भर्ती, बेहतर रोजगार और राजनीति में युवाओं की वास्तविक भागीदारी उनके लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकती है।
युवाओं को पार्टी के सोशल मीडिया पेज चलाने या चुनाव प्रचार तक सीमित रखने के बजाय उन्हें निर्णय लेने और संगठन में आगे बढ़ने का मौका देना भी जरूरी होगा। 2029 तक राजनीतिक दलों के लिए असली चुनौती यही होगी कि वे Gen Z का ध्यान तो खींचें ही, साथ ही उसका भरोसा भी जीतें।