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जज की कुर्सी से ‘महावीर’ के मार्ग तक; बैतूल की बेटी प्रखरश्री का गोल्ड मेडल से लेकर वैराग्य तक का पूरा सफर…

DigitalDesk by DigitalDesk
November 2, 2026
in इंदौर, मध्य प्रदेश, स्पेशल
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From the judge chair to the path of Mahavir Betul daughter journey from gold medal to renunciation
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आधुनिकता की अंधी दौड़ और करियर को सर्वोपरि मानने वाले इस दौर में मध्य प्रदेश के बैतूल से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने देश के युवाओं और समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है। बीए, एलएलबी और एलएलएम में गोल्ड मेडलिस्ट और हाल ही में सिविल जज के पद पर चयनित हुईं ब्रह्मचारिणी प्रखरश्री दीदी ने जॉइनिंग लेटर हाथ में आने से पहले ही सांसारिक जीवन को अलविदा कह दिया है। 
1 नवंबर को बैतूल की सड़कों पर जब विंटेज कारों, शाही बग्घियों और उदयपुर के शाही बैंड के साथ उनकी भव्य ‘बिनौली’ (विदाई चल समारोह) निकली, तो हर आंख श्रद्धा और विस्मय से नम थी। 
माता-पिता का सपना किया पूरा, फिर चुना अपना रास्ता
प्रखरश्री दीदी भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) में कार्यरत जितेंद्र कुमार जैन की इकलौती बेटी हैं। उन्होंने बताया, “मेरे माता-पिता की इच्छा थी कि मैं जज बनूं। मैंने दिन-रात मेहनत की, गोल्ड मेडल हासिल किए और जज की कठिन परीक्षा पास कर उनका यह सपना पूरा कर दिया। लेकिन प्रखरश्री के मन में बचपन से ही वैराग्य की लौ जल रही थी। उनका मानना है कि कोर्ट की चारदीवारी में जज या वकील बनकर वह समाज की उतनी व्यापक सेवा नहीं कर पातीं, जितनी भगवान महावीर के बताए अहिंसा और आत्म-कल्याण के मार्ग पर चलकर कर सकती हैं।
विंटेज कारों से ‘अंतिम सांसारिक विदाई’
रविवार को बैतूल सकल जैन समाज के सहयोग से आयोजित इस समारोह में प्रखरश्री दीदी के साथ 4 अन्य दीक्षार्थी बहनें भी शामिल हुईं। रंग-बिरंगे वस्त्रों और आभूषणों से सजी इन बहनों की विदाई बेहद अनूठी थी:
    • शाही ठाट-बाट: समारोह में शामिल विंटेज कारें और शाही बग्घियां इस बात का प्रतीक थीं कि ये बेटियां किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम ऐश-ओ-आराम को ठुकराकर संयम का रास्ता चुन रही हैं
    • गोदभराई की रस्म: जैन दादावाड़ी पहुंचकर पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ दीक्षार्थियों की गोदभराई की गई।
    • श्वेत वस्त्रों का संकल्प: दीक्षार्थी रंगोली दीदी ने भावुक होते हुए कहा, “यह एक बेटी की अंतिम सांसारिक विदाई है। आज हम इन रंगीन कपड़ों में हैं, लेकिन इसके बाद हमारे पास केवल श्वेत वस्त्र (संन्यास का प्रतीक) होंगे।”

सोनागिरि में होगी मुख्य दीक्षा
के अनुसार, 1 नवंबर को बैतूल में भव्य बिनौली और गोदभराई संपन्न होने के बाद, अब इन पांचों बहनों की मुख्य जैनेश्वरी दीक्षा 24 नवंबर को दतिया के प्रसिद्ध जैन तीर्थ सोनागिरि में संपन्न होगी।
भौतिकवादी युग में ‘सफलता’ की नई परिभाषा
आज का समाज सिविल सेवा, न्यायपालिका या कॉर्पोरेट जगत में शीर्ष पदों को सफलता का पैमाना मानता है। प्रखरश्री ने पहले इस कठिन परीक्षा को पास करके यह साबित किया कि वे सांसारिक अर्थों में पूरी तरह सक्षम और मेधावी हैं। उन्होंने माता-पिता की इच्छा पूरी की, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनका वैराग्य किसी असफलता या निराशा (Escapism) से नहीं, बल्कि एक सचेत और जागरूक इच्छा (Conscious Choice) से उपजा है।
 न्याय की अवधारणा: लौकिक (Legal) बनाम आध्यात्मिक (Spiritual)
एक जज के रूप में उनका काम कानून की किताबों के दायरे में रहकर न्याय करना होता, जो कि समाज को सुचारू चलाने के लिए जरूरी है। लेकिन, भगवान महावीर के मार्ग को चुनकर उन्होंने “आध्यात्मिक न्याय” का रास्ता चुना। प्रखरश्री का यह बयान कि ‘जज बनकर वे समाज की उतनी सेवा नहीं कर पातीं’ यह दिखाता है कि वे दंडात्मक न्याय प्रणाली से ऊपर उठकर, अहिंसा और करुणा के माध्यम से इंसानी चेतना को बदलने वाले व्यापक कल्याणकारी मार्ग पर चलना चाहती हैं।
भव्य विदाई और उत्सव का सामाजिक महत्व (बिनौली समारोह)
अक्सर आधुनिक समाज में संन्यास या वैराग्य को दुख या वैराग्य से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन जैन परंपरा में इसे ‘दीक्षा कल्याणक’ या महाभिनिष्क्रमण (महान प्रस्थान) के रूप में मनाया जाता है।
  • विंटेज कारें और शाही बग्घियां: यह केवल दिखावा नहीं, बल्कि इस बात का प्रतीक है कि दीक्षार्थी संसार के सर्वश्रेष्ठ भौतिक सुखों और वैभव को अपनी मर्जी से मुस्कुराते हुए छोड़ रहा है।
  • समाज की स्वीकृति: बैतूल के सकल जैन समाज द्वारा दिया गया यह सम्मान दिखाता है कि भारतीय समाज आज भी भौतिक सफलताओं से ऊपर आध्यात्मिक ऊंचाइयों को सम्मान देता है।
  •  आधुनिक पीढ़ी और आंतरिक शांति की खोज
यह घटना एक बड़े ट्रेंड की ओर इशारा करती है, जहां उच्च शिक्षित और सफल युवा (जैसे इंजीनियर्स, डॉक्टर्स, और अब जज) कॉर्पोरेट और प्रशासनिक जीवन के तनाव और चूहा-दौड़ (Rat Race) के बजाय आंतरिक शांति की तलाश में अध्यात्म की ओर मुड़ रहे हैं। 22 नवंबर को होने वाली यह दीक्षा केवल पांच बहनों की अंतिम विदाई नहीं है, बल्कि आधुनिक समाज के लिए एक दर्पण है कि असली सुख और तृप्ति बाहरी पदों में नहीं, बल्कि आंतरिक संयम में है।
Tags: #judge chair #path of Mahavir #Betul daughter #journey from gold medal to renunciation
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