दक्षिण चीन सागर को लेकर चीन ने एक बार फिर अपने ऐतिहासिक और कानूनी दावों को प्रमुखता से रखा है। बीजिंग का कहना है कि इस क्षेत्र पर उसके अधिकार सदियों पुराने ऐतिहासिक दस्तावेजों, प्राचीन समुद्री मार्गों और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर आधारित हैं। चीन का दावा है कि ‘गेंगलू बु’ जैसे प्राचीन नौवहन अभिलेख और 1943 की काहिरा घोषणा तथा 1945 की पॉट्सडैम घोषणा उसके दावों को मजबूती प्रदान करती हैं।
इतिहास, कानून और रणनीति के बीच उलझा दुनिया का सबसे संवेदनशील समुद्री विवाद
हालांकि, दक्षिण चीन सागर को लेकर विवाद केवल चीन तक सीमित नहीं है। फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया और ब्रुनेई सहित कई देश इस क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों पर दावा करते हैं। वर्ष 2016 में हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायालय ने चीन के ‘नाइन-डैश लाइन’ दावे को अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं माना था, लेकिन चीन ने इस फैसले को अस्वीकार करते हुए इसे अधिकार-क्षेत्र से बाहर बताया।
बीजिंग का कहना है कि दक्षिण चीन सागर उसकी ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। वहीं अमेरिका और उसके सहयोगी देश इस क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता (FONOPs) के तहत नियमित नौसैनिक अभियान चलाते हैं, जिसे चीन क्षेत्रीय तनाव बढ़ाने वाला कदम मानता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण चीन सागर का विवाद केवल समुद्री सीमाओं का नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन, अंतरराष्ट्रीय कानून, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का भी प्रश्न बन चुका है। एक ओर चीन ऐतिहासिक अधिकारों और प्रत्यक्ष वार्ता के जरिए समाधान की वकालत करता है, तो दूसरी ओर कई देश संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून (UNCLOS) और 2016 के मध्यस्थता फैसले के आधार पर नियम-आधारित व्यवस्था पर जोर देते हैं।
फिलहाल चीन और ASEAN देशों के बीच Code of Conduct (COC) पर बातचीत जारी है। माना जा रहा है कि यदि इस पर सहमति बनती है तो दक्षिण चीन सागर में तनाव कम करने और क्षेत्रीय स्थिरता बढ़ाने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि कूटनीतिक संवाद इस लंबे समय से चले आ रहे विवाद को शांतिपूर्ण समाधान तक पहुंचा पाता है या महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा इसे और जटिल बनाती है।