मुजफ्फराबाद से रावलाकोट तक विरोध की लहर, प्रदर्शनकारियों ने पाकिस्तान सरकार और सुरक्षा बलों पर लगाए गंभीर आरोप
पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) में 5 अगस्त को उस समय बड़ा घटनाक्रम देखने को मिला, जब पाकिस्तान सरकार के आधिकारिक ‘यौम-ए-इस्तेहसाल’ कार्यक्रम के समानांतर कई शहरों में पाकिस्तान विरोधी प्रदर्शन हुए। मुजफ्फराबाद, रावलाकोट, दादयाल, कोटली, धीरकोट और नीलम घाटी सहित कई इलाकों में स्थानीय लोगों ने रैलियां और प्रदर्शन किए। प्रदर्शनकारियों ने चुनाव प्रक्रिया, सुरक्षा बलों की कार्रवाई, खाद्य संकट और प्रशासनिक नीतियों को लेकर पाकिस्तान सरकार के खिलाफ नाराजगी जताई।
हालांकि, इन घटनाओं से जुड़े कई दावे स्थानीय आंदोलनकारी संगठनों और पाकिस्तान सरकार के आलोचकों की ओर से किए गए हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और पाकिस्तान सरकार का पक्ष अलग है। ऐसे में इन घटनाओं को दोनों पक्षों के दावों के साथ समझना आवश्यक है।
‘यौम-ए-इस्तेहसाल’ के बीच विरोध प्रदर्शन ने बदला माहौल
पाकिस्तान हर वर्ष 5 अगस्त को भारत द्वारा अनुच्छेद 370 हटाए जाने के विरोध में ‘यौम-ए-इस्तेहसाल’ मनाता है। लेकिन इस बार PoJK में कई स्थानों पर स्थानीय लोगों ने इसी दिन पाकिस्तान सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किए। रिपोर्टों के अनुसार, मुजफ्फराबाद, रावलाकोट और अन्य कस्बों में लोगों ने सड़कों पर उतरकर विरोध जताया। कई स्थानों पर महिलाओं ने भी बड़ी संख्या में भाग लिया और प्रशासन पर दमनकारी कार्रवाई के आरोप लगाए। स्थानीय प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनकी मांगें लंबे समय से अनसुनी की जा रही हैं और क्षेत्र में नागरिक अधिकारों की स्थिति पर गंभीर सवाल हैं।
नीलम घाटी में फायरिंग के दावे, बढ़ा तनाव
प्रदर्शन के दौरान नीलम घाटी में सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव बढ़ने की खबरें सामने आईं। आंदोलन से जुड़े नेताओं का दावा है कि बस स्टैंड के पास सुरक्षा बलों की गोलीबारी में दो लोगों की मौत हुई और पांच अन्य घायल हुए। प्रदर्शनकारी संगठनों का यह भी आरोप है कि पिछले कई सप्ताह से सुरक्षा बलों की कार्रवाई में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई है। हालांकि इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और पाकिस्तान सरकार की ओर से इस संबंध में अलग रुख सामने आया है।
इसी बीच स्थानीय संगठनों ने खाद्य आपूर्ति बाधित होने और आवश्यक वस्तुओं की कमी का भी आरोप लगाया है। उनका कहना है कि कई ट्रक सीमा पर रोके गए हैं, जिससे मानवीय संकट गहरा रहा है।
चुनाव प्रक्रिया पर उठे सवाल, नेताओं ने लगाए धांधली के आरोप
रावलाकोट के चिनार चौक में आयोजित सभा में कई आंदोलनकारी नेताओं ने हालिया चुनावों को लेकर गंभीर आरोप लगाए। आंदोलन के प्रमुख नेता सरदार उमर नजीर ने दावा किया कि चुनाव निष्पक्ष नहीं थे और उन पर सुरक्षा एजेंसियों का प्रभाव रहा।
उन्होंने कहा कि यदि जनता की मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो आंदोलन और तेज किया जाएगा। नेताओं ने पाकिस्तान सरकार से वार्ता शुरू करने की मांग करते हुए चेतावनी दी कि यदि बातचीत नहीं हुई तो आंदोलन का दायरा बढ़ सकता है।
इन आरोपों पर पाकिस्तान सरकार की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है।
ISI और प्रशासन पर भी लगाए गए गंभीर आरोप
स्वतंत्रता समर्थक नेता सरदार अमन खान ने अपने संबोधन में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI पर चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप के आरोप लगाए। उनका दावा था कि हालिया चुनावों में उम्मीदवारों के चयन और परिणामों को प्रभावित किया गया।
उन्होंने यह भी कहा कि दशकों से क्षेत्र में विकास की तुलना में सुरक्षा और सैन्य मुद्दों को प्राथमिकता दी गई, जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे बुनियादी क्षेत्रों की अनदेखी हुई।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और पाकिस्तान की ओर से ऐसे आरोपों को पहले भी खारिज किया जाता रहा है।
पूंछ चुनाव से पहले आंदोलन तेज करने की चेतावनी
10 अगस्त को पूंछ डिवीजन की 11 सीटों पर प्रस्तावित चुनाव से पहले आंदोलनकारी नेताओं ने विरोध और तेज करने के संकेत दिए हैं। उन्होंने चुनाव के बहिष्कार और बड़े स्तर पर प्रदर्शन की चेतावनी दी है।
नेताओं का कहना है कि यदि प्रशासन ने जनता की मांगों पर ध्यान नहीं दिया तो चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। वहीं पाकिस्तान सरकार का कहना है कि चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत कराए जा रहे हैं और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।
क्या है पूरा मामला?
PoJK में हाल के महीनों से आर्थिक समस्याएं, महंगाई, प्रशासनिक फैसलों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर असंतोष की खबरें आती रही हैं। 5 अगस्त को पाकिस्तान के आधिकारिक कार्यक्रम के समानांतर हुए विरोध प्रदर्शनों ने इस असंतोष को अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया है।
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को लेकर दोनों पक्षों के दावे अलग-अलग हैं। आंदोलनकारी इसे जनता के अधिकारों की लड़ाई बता रहे हैं, जबकि पाकिस्तान सरकार इसे कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा मानती है। ऐसे में स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच के बिना किसी भी पक्ष के सभी दावों को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक और सामाजिक तनाव बना हुआ है। आने वाले दिनों में पूंछ क्षेत्र के चुनाव, सरकार की प्रतिक्रिया और आंदोलन की दिशा इस पूरे घटनाक्रम की अगली तस्वीर तय करेंगे।