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150 साल बाद पहली बार लाल किले पर गूंजा ‘वंदे मातरम्’

DigitalDesk by DigitalDesk
August 15, 2026
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150 साल बाद पहली बार लाल किले पर गूंजा ‘वंदे मातरम्’
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150 साल बाद पहली बार लाल किले पर गूंजा ‘वंदे मातरम्’

 

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कुछ ऐतिहासिक क्षण अपनी भव्यता से नहीं, बल्कि अपने समय और प्रतीकात्मकता से यादगार बन जाते हैं।

15 अगस्त 2026 की सुबह, जब भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा था, तब लाल किले पर स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान पहली बार ‘वंदे मातरम्’ का गायन किया गया।

इस अवसर को और भी खास बनाता है यह तथ्य कि देश इस वर्ष ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहा है।जिस गीत ने कभी स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सभाओं, जुलूसों और आंदोलनों में भारतीयों को एकजुट किया था, वही गीत आज उस लाल किले पर गूंजा, जहां से हर वर्ष स्वतंत्र भारत स्वयं से और दुनिया से संवाद करता है।

एक गीत से आजादी की पुकार तक

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 19वीं शताब्दी में रचित ‘वंदे मातरम्’ बाद में उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा बना।लेकिन यह केवल साहित्यिक रचना बनकर नहीं रहा।

धीरे-धीरे ‘वंदे मातरम्’ स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे शक्तिशाली आवाजों में से एक बन गया। विशेष रूप से 1905 में बंगाल विभाजन के खिलाफ चले स्वदेशी आंदोलन के दौरान यह लोगों को एकजुट करने वाला उद्घोष बना।उस दौर में ‘वंदे मातरम्’ कहना केवल देशभक्ति व्यक्त करना नहीं था। यह औपनिवेशिक शासन के सामने प्रतिरोध, आत्मसम्मान और स्वतंत्र भारत के सपने की अभिव्यक्ति भी था।लाल किले पर इसका गूंजना क्यों महत्वपूर्ण है?स्वतंत्र भारत के इतिहास में लाल किले का अपना विशेष स्थान है।हर 15 अगस्त को प्रधानमंत्री यहां तिरंगा फहराते हैं और देश को संबोधित करते हैं। इसलिए लाल किला केवल एक ऐतिहासिक स्मारक नहीं रहा, बल्कि स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन चुका है।

इसके बावजूद स्वतंत्रता आंदोलन में इतनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला ‘वंदे मातरम्’ अब तक लाल किले के आधिकारिक स्वतंत्रता दिवस समारोह में इस रूप में शामिल नहीं था।

आज यह बदल गया।

इस क्षण में कई प्रतीक एक साथ दिखाई देते हैं।

तिरंगा उस स्वतंत्र और संप्रभु भारत का प्रतीक है जो 1947 में अस्तित्व में आया।‘जन गण मन’ हमारे गणराज्य का राष्ट्रगान है।और ‘वंदे मातरम्’ उस संघर्ष की स्मृति अपने भीतर समेटे हुए है जिसने स्वतंत्र भारत का रास्ता बनाया।

इसलिए लाल किले पर ‘वंदे मातरम्’ का गूंजना स्वतंत्रता के संघर्ष और स्वतंत्रता के उत्सव के बीच एक सेतु जैसा है।

150 साल — केवल एक वर्षगांठ नहीं

किसी ऐतिहासिक घटना की वर्षगांठ केवल समारोह तक सीमित रह सकती है। लेकिन ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष हमें एक बड़ा सवाल पूछने का अवसर देते हैं—

आखिर कुछ शब्द डेढ़ सौ वर्षों तक लोगों की चेतना में क्यों जीवित रहते हैं?शायद इसका उत्तर इसके मूल भाव में छिपा है—वंदे मातरम् — मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं।

आधुनिक भारत के संविधान, संसद और लोकतांत्रिक संस्थाओं के अस्तित्व में आने से बहुत पहले इस गीत ने भारत को एक साझा मातृभूमि के रूप में देखने की भावनात्मक कल्पना को मजबूत किया।

अलग-अलग भाषा, क्षेत्र और सामाजिक पृष्ठभूमि के लोगों को एक स्वतंत्रता आंदोलन में जोड़ने के लिए यह भावना बेहद महत्वपूर्ण थी।इसका इतिहास बहसों से भी जुड़ा है

‘वंदे मातरम्’ के इतिहास को याद करते समय उससे जुड़ी बहसों को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।

गीत के बाद के कुछ हिस्सों में धार्मिक प्रतीकों के प्रयोग को लेकर स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में भी चर्चा और असहमति हुई थी।आखिरकार स्वतंत्र भारत में ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत और ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान का सम्मान मिला।

यही भारत की विशेषता भी है।

हमारे राष्ट्रीय प्रतीक ऐसे समाज से निकले हैं जहां अलग-अलग विचार और आस्थाएं मौजूद हैं। इसलिए उनकी शक्ति केवल उनके इतिहास में नहीं, बल्कि उस साझा जगह में भी है जिसे भारत ने अपनी विविधता के बीच बनाने की कोशिश की है।

बंकिम की कलम से लाल किले तक

इस गीत की यात्रा अपने आप में असाधारण है।19वीं शताब्दी में एक बंगाली लेखक ने इसे लिखा।

यह साहित्य का हिस्सा बना।फिर किताब के पन्नों से निकलकर सड़कों पर पहुंचा।स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे अपनाया।

आंदोलनों में इसकी आवाज गूंजी।

पीढ़ियां इसके शुरुआती शब्द सुनते हुए बड़ी हुईं।

भारत स्वतंत्र हुआ।और फिर 150 वर्ष बाद स्वतंत्र भारत के सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मंचों में से एक — लाल किले — पर यह स्वतंत्रता दिवस समारोह का हिस्सा बना।इतिहास कभी-कभी पूरा चक्र तय करता है।नई पीढ़ी के लिए ‘वंदे मातरम्’ का अर्थ क्या है?शायद आज सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है।

आज की युवा पीढ़ी के लिए स्वतंत्रता आंदोलन इतिहास की किताबों का हिस्सा है। 1947 को अपनी आंखों से देखने वाली पीढ़ी भी धीरे-धीरे हमारे बीच से विदा हो रही है।ऐसे में ‘वंदे मातरम्’ जैसे गीत उस इतिहास और आज की पीढ़ी के बीच पुल बन सकते हैं।

लेकिन 2026 की देशभक्ति केवल 1905 के नारों को दोहराने तक सीमित नहीं रह सकती।

यदि ‘वंदे मातरम्’ का अर्थ मातृभूमि के प्रति सम्मान है, तो वह सम्मान आज हमारे व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए—हम देश के लोगों, नदियों, जंगलों, शहरों, संस्थाओं और उसकी विविधता के साथ कैसा व्यवहार करते हैं।

देश से प्रेम का अर्थ उसकी सेवा करना भी है।

जहां सुधार की आवश्यकता हो, वहां सवाल पूछना भी है।

पिछली पीढ़ियों ने जो बनाया, उसकी रक्षा करना भी है।

और यह सुनिश्चित करना भी है कि स्वतंत्रता और अवसर उन लोगों तक पहुंचें जो आज भी विकास की यात्रा में पीछे छूटे हुए हैं।शायद यही डेढ़ सौ साल पुराने ‘वंदे मातरम्’ का सबसे आधुनिक अर्थ हो सकता है।

जब इतिहास फिर गूंजा

इसलिए आज लाल किले पर ‘वंदे मातरम्’ का गायन केवल स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में जोड़ी गई एक नई परंपरा नहीं थी।कुछ क्षणों के लिए ऐसा लगा जैसे 19वीं शताब्दी का भारत, स्वतंत्रता आंदोलन, 1947 और 2026 का भारत एक ही जगह आकर मिल गए हों।जिन पीढ़ियों ने पहली बार ‘वंदे मातरम्’ कहा था, वे एक स्वतंत्र भारत का सपना देख रही थीं।आज की पीढ़ी को वह स्वतंत्रता विरासत में मिली है।

अब उसकी चुनौती अलग है—वह इस स्वतंत्रता का उपयोग कैसा भारत बनाने के लिए करती है?शायद इसीलिए, गीत के 150 वर्ष पूरे होने पर लाल किले से ‘वंदे मातरम्’ का गूंजना केवल अतीत को याद करने का क्षण नहीं था।यह भविष्य के प्रति हमारी जिम्मेदारी याद दिलाने वाला क्षण भी था।शब्द वही थे —

लेकिन उन्हें सुनने वाला भारत बदल चुका था।

Tags: #vande-mataram red-fort
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