नेपाल की ग्लेशियर त्रासदी के बाद बड़ा सवाल, क्या ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ देगा समय पर राहत?…जानें आखिर है क्या ‘लॉस एंड डैमेज’?

what Loss and Damage actually is

नेपाल में ग्लेशियर, भूस्खलन और अचानक आई बाढ़ से हुई तबाही ने एक बार फिर दुनिया के सामने जलवायु न्याय और जलवायु वित्त का सवाल खड़ा कर दिया है। हिमालयी देश होने के कारण नेपाल जलवायु परिवर्तन के उन प्रभावों का सामना कर रहा है, जिनमें उसकी भूमिका अपेक्षाकृत कम रही है। अब सवाल यह है कि ऐसी आपदाओं से हुए नुकसान की भरपाई के लिए बनाया गया अंतरराष्ट्रीय ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ वास्तव में प्रभावित देशों तक कितनी तेजी और कितनी राशि पहुंचा सकता है।

1. हिमालय में बढ़ता आपदा का खतरा

तिब्बत-नेपाल सीमा के आसपास पहाड़ी क्षेत्र में भूस्खलन और ल्हेन्डे खोला में आई बाढ़ जैसी घटनाएं हिमालयी इलाकों की बढ़ती संवेदनशीलता को सामने लाती हैं। पहाड़ों में तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव के साथ ग्लेशियरों और हिम झीलों से जुड़े खतरे भी बढ़ रहे हैं। ऐसी घटनाओं में नुकसान केवल घरों और सड़कों तक सीमित नहीं रहता। पुल, बिजली परियोजनाएं, सिंचाई व्यवस्था, पर्यटन, कृषि और स्थानीय आजीविका पर भी इसका सीधा असर पड़ सकता है।

2. ‘लॉस एंड डैमेज’ आखिर है क्या?

जलवायु परिवर्तन की बहस में ‘लॉस एंड डैमेज’ का मतलब उन आर्थिक और गैर-आर्थिक नुकसान से है, जिन्हें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के कारण झेलना पड़ता है और जिन्हें केवल अनुकूलन या आपदा प्रबंधन से पूरी तरह टाला नहीं जा सकता। इसी अवधारणा के तहत संयुक्त राष्ट्र जलवायु प्रक्रिया में लॉस एंड डैमेज फंड बनाने का फैसला हुआ। इसका उद्देश्य विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से होने वाले नुकसान और क्षति से निपटने में वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना है।

3. नेपाल के लिए यह फंड इतना महत्वपूर्ण क्यों?

नेपाल जैसे पर्वतीय विकासशील देशों के सामने समस्या दोहरी है। एक तरफ प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बना रहता है, दूसरी तरफ बड़े पैमाने पर आपदा के बाद पुनर्निर्माण के लिए आर्थिक संसाधन सीमित हो सकते हैं। अगर किसी बाढ़ में सड़क, पुल और बिजली ढांचा बह जाता है तो तत्काल राहत के साथ-साथ लंबे समय तक पुनर्निर्माण और स्थानीय अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा करने के लिए भी पैसा चाहिए। यहीं लॉस एंड डैमेज फंड की उपयोगिता सामने आती है।

4. फंड बना, लेकिन पैसा कब पहुंचेगा?

यही इस पूरी बहस का सबसे बड़ा सवाल है। लॉस एंड डैमेज फंड की स्थापना एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सहमति थी, लेकिन फंड की घोषणा और प्रभावित देश तक वास्तविक धन पहुंचने के बीच संस्थागत प्रक्रिया जुड़ी हुई है। फंड के संचालन के लिए बोर्ड, वित्तीय व्यवस्था, पात्रता और धन तक पहुंचने के नियम जरूरी हैं। इसलिए किसी आपदा के तुरंत बाद प्रभावित देश को उसी फंड से सीधे मुआवजा मिल जाना अपने आप नहीं होता। नेपाल के मामले में भी असली परीक्षा यही होगी कि क्या अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था आपदा के बाद तेज, पर्याप्त और वास्तविक जरूरत के अनुरूप वित्तीय सहायता उपलब्ध करा पाती है।

5. ‘मुआवजा’ और ‘जलवायु वित्त’ में फर्क

यहां एक और महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। लॉस एंड डैमेज फंड को अक्सर आम भाषा में जलवायु आपदा का ‘मुआवजा फंड’ कहा जाता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में इसका स्वरूप अधिक जटिल है। विकसित और विकासशील देशों के बीच लंबे समय से यह बहस रही है कि जलवायु परिवर्तन से हुए नुकसान की जिम्मेदारी किसकी है और वित्तीय सहायता किस रूप में दी जानी चाहिए। इसलिए किसी एक आपदा के बाद मिलने वाली सहायता को सीधे कानूनी क्षतिपूर्ति मान लेना सही नहीं होगा।

6. नेपाल का मामला बनेगा वास्तविक परीक्षा

नेपाल की भौगोलिक स्थिति इस मामले को खास बनाती है। हिमालय में जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरे केवल नेपाल तक सीमित नहीं हैं। भारत, भूटान, पाकिस्तान और चीन के हिमालयी क्षेत्रों में भी ग्लेशियर, हिम झील, भूस्खलन और अचानक बाढ़ से जुड़े जोखिम मौजूद हैं। अगर लॉस एंड डैमेज व्यवस्था नेपाल जैसे देश की जरूरत के मुताबिक काम करती है, तो इससे दूसरे पर्वतीय और जलवायु-संवेदनशील देशों के लिए भी एक मॉडल तैयार हो सकता है। लेकिन अगर सहायता हासिल करने की प्रक्रिया बहुत लंबी, जटिल या अपर्याप्त रही, तो यह सवाल और मजबूत होगा कि अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त वास्तव में सबसे ज्यादा प्रभावित देशों तक कितना पहुंच रहा है।

7. सिर्फ पैसा नहीं, नुकसान का सही आकलन भी जरूरी

किसी आपदा के बाद नुकसान का मूल्यांकन केवल टूटे पुल, मकान या सड़क की लागत से नहीं किया जा सकता। कई नुकसान ऐसे होते हैं जिन्हें पैसे में मापना कठिन है—पारंपरिक आजीविका का खत्म होना, विस्थापन, सांस्कृतिक विरासत को नुकसान, मानसिक आघात और पर्यावरणीय क्षति। लॉस एंड डैमेज फंड की वास्तविक उपयोगिता इस बात से भी तय होगी कि ऐसी गैर-आर्थिक क्षतियों को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था किस तरह पहचानती और संबोधित करती है। नेपाल की मौजूदा आपदा ने ग्लेशियर और भूस्खलन के खतरे से आगे एक बड़ा वैश्विक सवाल खड़ा किया है—जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान का वित्तीय बोझ कौन उठाएगा और मदद प्रभावित देश तक कितनी जल्दी पहुंचेगी? ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ इसी चुनौती के जवाब के रूप में सामने आया है। लेकिन इसकी सफलता का असली पैमाना फंड का बन जाना नहीं, बल्कि नेपाल जैसे जलवायु-संवेदनशील देशों को वास्तविक संकट के समय तेज, पर्याप्त और सुलभ वित्तीय सहायता मिलना होगा। यानी नेपाल की त्रासदी सिर्फ एक हिमालयी आपदा नहीं, बल्कि वैश्विक जलवायु वित्त व्यवस्था की जमीनी परीक्षा भी है।

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