‘School Thik Karo’: सरकारी स्कूलों की चिंता या नई राजनीति की शुरुआत?
एक सरकारी स्कूल में कुछ बच्चे अपनी कक्षा की सफाई करते दिखाई देते हैं। कहीं खिड़कियां टूटी हैं, कहीं पर्याप्त बेंच नहीं हैं, कहीं पानी या शौचालय को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कैमरा इन तस्वीरों को रिकॉर्ड करता है और कुछ ही समय में वे सोशल मीडिया पर पहुंच जाती हैं।
इसके बाद बहस शुरू होती है।
क्या यह हमारे सरकारी स्कूलों की वह सच्चाई है जिसे हम लंबे समय से नजरअंदाज करते आए हैं? या फिर कुछ चुनिंदा तस्वीरों के जरिए पूरे सरकारी शिक्षा तंत्र को बदहाल दिखाया जा रहा है? और सबसे बड़ा सवाल स्कूल सुधारने की कोशिश हो रही है या स्कूलों के जरिए नई राजनीति की जमीन तैयार की जा रही है?
यही बहस CJP के ‘School Thik Karo’ अभियान ने शुरू कर दी है। स्कूल देखने निकले लोग अभिजीत दीपके और CJP से जुड़े लोग सरकारी स्कूलों में जाकर उनकी स्थिति देखने और बुनियादी सुविधाओं को लेकर सवाल उठा रहे हैं। इसे वे social audit कहते हैं।
विचार सुनने में बेहद सरल है।
सरकारी स्कूल जनता के पैसे से चलते हैं। उनमें लाखों परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं। तो फिर उन स्कूलों में पानी है या नहीं, toilet काम करता है या नहीं, बच्चों के बैठने के लिए पर्याप्त जगह है या नहीं यह जानने का अधिकार जनता को क्यों नहीं होना चाहिए?
यही इस अभियान की सबसे बड़ी ताकत भी है।
सरकारी शिक्षा पर बहस अक्सर बड़े आंकड़ों के बीच फंस जाती हैकितना बजट आया, कितने स्कूल खुले, कितने शिक्षक नियुक्त हुए। लेकिन माता-पिता के लिए शिक्षा का मतलब आंकड़े नहीं हैं।
उनका सवाल ज्यादा सीधा है:
मेरा बच्चा जिस स्कूल में रोज जाता है, वहां उसे क्या मिल रहा है?
कैमरा पहुंचा और व्यवस्था हरकत में आई?
इस अभियान के बाद कुछ जगहों से स्कूलों में मरम्मत और सुविधाएं बढ़ाए जाने की बातें भी सामने आई हैं। यदि किसी स्कूल में वर्षों से कोई समस्या है और एक वीडियो सामने आने के बाद प्रशासन अचानक सक्रिय हो जाता है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेगा यह काम पहले क्यों नहीं हुआ? लेकिन यहां सावधानी भी जरूरी है।
हर सुधार का श्रेय किसी एक campaign को दे देना भी ठीक नहीं होगा। हो सकता है कुछ काम पहले से मंजूर हों, कुछ प्रक्रियाएं पहले से चल रही हों।
इसलिए सवाल होना चाहिए, दावा नहीं:
क्या सार्वजनिक दबाव ने व्यवस्था की रफ्तार बढ़ाई?
अगर जवाब हां है, तो यह citizen accountability की ताकत दिखाता है।
लेकिन क्या कोई भी स्कूल में कैमरा लेकर जा सकता है?
यहीं से कहानी का दूसरा पक्ष शुरू होता है।
सरकारी स्कूल जनता के पैसे से जरूर चलता है, लेकिन स्कूल कोई सार्वजनिक पार्क नहीं है। वहां बच्चे हैं और अधिकतर नाबालिग हैं। उनकी privacy, dignity और security की जिम्मेदारी स्कूल और सरकार की है। इसलिए CJP से भी सवाल पूछे जाने चाहिए।
स्कूल में जाने से पहले क्या अनुमति ली जाती है? बच्चों को रिकॉर्ड करने के क्या नियम हैं? किसी शिक्षक पर कैमरे के सामने सवाल उठाने से पहले क्या उसका पक्ष समझा जाता है? अगर कोई बच्चा कैमरे पर नहीं आना चाहता तो उसकी privacy कैसे सुनिश्चित होती है?
अच्छा उद्देश्य अपने आप हर तरीका सही नहीं बना देता।
Social audit जरूरी हो सकता है, लेकिन उसकी भी एक मर्यादा होनी चाहिए।
‘छापा’ या Social Audit?
सोशल मीडिया पर इन visits को कई लोग मजाकिया या राजनीतिक अंदाज में ‘छापा’ कह रहे हैं। लेकिन ये कोई सरकारी या पुलिस raid नहीं हैं। यही अंतर समझना जरूरी है।
एक नागरिक या राजनीतिक संगठन सवाल पूछ सकता है, कमियां सामने ला सकता है और प्रशासन से जवाब मांग सकता है। लेकिन उसके पास सरकारी inspector जैसी कानूनी शक्ति नहीं होती। इसलिए अगर CJP इसे social audit कहती है तो उस audit की विश्वसनीयता भी जांची जानी चाहिए।
क्या केवल खराब स्कूल दिखाए जाएंगे?
अगर कोई शानदार सरकारी स्कूल मिले तो क्या उसे भी उतनी ही ताकत से दिखाया जाएगा? क्या एक महीने बाद वापस जाकर देखा जाएगा कि जिस समस्या को उठाया गया था वह ठीक हुई या नहीं? क्योंकि यदि लक्ष्य केवल viral video बनाना है तो वह activism से ज्यादा content बनकर रह जाएगा। लेकिन यदि समस्या दर्ज की जाती है, प्रशासन से जवाब मांगा जाता है और फिर उसका follow-up किया जाता है तब यह वास्तव में social audit का रूप ले सकता है।
सरकार भी केवल नियमों के पीछे नहीं छिप सकती
दूसरी तरफ सरकारों का तर्क भी महत्वपूर्ण है। स्कूल में कौन प्रवेश करे, कौन बच्चों को film करे और कौन interview ले इसके नियम होना गलत नहीं है। बच्चों की सुरक्षा के नाम पर सावधानी जरूरी है। लेकिन सवाल तब पैदा होता है जब पूरी बहस “आप अंदर कैसे आए?” पर समाप्त हो जाए और “अंदर जो दिखाई दिया उसका क्या?” पीछे छूट जाए। अगर किसी स्कूल में पानी नहीं है, toilet खराब है या बच्चे बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं तो कैमरा बंद करने से समस्या समाप्त नहीं होती।
इसलिए सरकार से एक सीधा सवाल पूछा जाना चाहिए:
अगर CJP का तरीका गलत है, तो उसने जो समस्या दिखाई है वह सही है या गलत?
अगर गलत है तो तथ्य सामने रखिए।
अगर सही है तो उसे ठीक कीजिए।
यही जवाबदेही है।
सबसे असहज सवाल नेताओं के बच्चे कहां पढ़ते हैं?
इस अभियान ने एक और दिलचस्प बहस छेड़ी है।
अगर सरकारी स्कूल इतने अच्छे हैं कि करोड़ों भारतीय परिवारों के बच्चों को वहां पढ़ना चाहिए, तो हमारे मंत्री, बड़े अधिकारी और व्यवस्था चलाने वाले लोग अपने बच्चों के लिए अक्सर दूसरी व्यवस्था क्यों चुनते हैं? यह सवाल किसी नेता के बच्चे को निशाना बनाने के लिए नहीं होना चाहिए। बच्चे किसी राजनीतिक बहस का हिस्सा नहीं बनने चाहिए। लेकिन व्यवस्था पर भरोसे का सवाल जरूर पूछा जा सकता है। जो लोग public education system चलाते हैं, उनका खुद उस system पर कितना विश्वास है? बेशक हर माता-पिता को अपने बच्चे के लिए स्कूल चुनने की स्वतंत्रता है। लेकिन यदि policy बनाने वाले लोग खुद public system को नहीं चुनते तो जनता का यह पूछना अनुचित नहीं कि आखिर क्यों।
और क्या हर सरकारी स्कूल खराब है?
बिल्कुल नहीं।
यही वह गलती है जिससे ‘School Thik Karo’ को भी बचना होगा। भारत में अनेक सरकारी स्कूल अच्छा काम कर रहे हैं। बहुत से सरकारी शिक्षक कठिन परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के बावजूद बच्चों के लिए असाधारण मेहनत करते हैं। Private school का मतलब अपने आप अच्छी शिक्षा नहीं होता और government school का मतलब अपने आप खराब शिक्षा नहीं होता। अगर social audit ईमानदार है तो उसका उद्देश्य सच्चाई खोजना होना चाहिए, पहले से तय कहानी को साबित करना नहीं।
खराब स्कूल मिले तो उसे दिखाइए।
अच्छा स्कूल मिले तो उसे भी दिखाइए।
और शायद सबसे उपयोगी काम होगा यह दिखाना कि एक सरकारी स्कूल अच्छा कर रहा है तो दूसरा उससे क्या सीख सकता है। शिक्षकों को अकेला दोष देना भी आसान रास्ता है किसी स्कूल की टूटी इमारत देखकर शिक्षक को दोषी ठहरा देना आसान है। लेकिन शिक्षक बजट मंजूर नहीं करता। वह नई इमारत sanction नहीं करता। शिक्षक भर्ती की संख्या भी तय नहीं करता। दूसरी तरफ जहां संसाधन मौजूद हैं और फिर भी लापरवाही है, वहां शिक्षक और principal से सवाल पूछना भी जरूरी है। जवाबदेही का मतलब किसी एक villain की तलाश नहीं है। शिक्षक, principal, शिक्षा विभाग, स्थानीय प्रशासन और सरकारजिसकी जितनी जिम्मेदारी है, उससे उतना सवाल होना चाहिए।
School Thik Karo या Politics Thik Karo?
और फिर आता है वह सवाल जिससे CJP भी बच नहीं सकती।
क्या यह केवल स्कूल सुधारने का अभियान है?
या सरकारी स्कूलों के जरिए CJP गांव, कस्बों, माता-पिता और युवाओं तक अपनी पहुंच भी बना रही है? यदि ऐसा है भी तो क्या अपने आप इसमें कुछ गलत है? आखिर राजनीति का काम ही सार्वजनिक मुद्दों को उठाना है। समस्या तब होगी जब स्कूल बहाना बन जाए और राजनीति असली मकसद। लेकिन अगर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण कोई पार्टी गांव के स्कूल का toilet ठीक करवाने, शिक्षक उपलब्ध कराने या बच्चों को बेहतर सुविधाएं दिलाने की होड़ शुरू करती है तो शायद आम नागरिक को ऐसी राजनीति से शिकायत कम ही होगी। इसलिए यह जरूरी नहीं कि दो विकल्पों में से केवल एक ही सच हो। School Thik Karo एक वास्तविक public issue भी उठा सकता है और CJP को राजनीतिक फायदा भी पहुंचा सकता है। दोनों बातें एक साथ संभव हैं। असल सवाल CJP का नहीं, हमारे सरकारी स्कूलों का है इस पूरी बहस में कहीं ऐसा न हो कि CJP और सरकार की लड़ाई इतनी बड़ी हो जाए कि बच्चा पीछे छूट जाए। उस बच्चे को शायद फर्क भी नहीं पड़ता कि कैमरा लेकर आने वाला किस पार्टी से है । उसे यह जानना है कि कल सुबह स्कूल पहुंचेगा तो पीने का पानी मिलेगा या नहीं। Toilet साफ होगा या नहीं। बैठने की जगह होगी या नहीं।
Teacher आएगा या नहीं। और स्कूल जाते समय वह सुरक्षित रहेगा या नहीं। यही इस कहानी का सबसे मानवीय पक्ष है। हम CJP से पूछ सकते हैं: आपको स्कूल में जाने का अधिकार किसने दिया? लेकिन सरकार से भी पूछना होगा: जनता के स्कूल का हिसाब मांगने से आपको किसने रोका? CJP से permission, privacy और politics पर सवाल होने चाहिए। सरकार से infrastructure, teachers और accountability पर सवाल होने चाहिए। और शायद आखिर में बहस को एक बेहद साधारण सवाल पर आकर रुकना चाहिए
स्कूल ठीक है या नहीं?
क्योंकि CJP जीते या सरकार, इससे बच्चे का भविष्य नहीं बदलता। बच्चे की असली जीत उस दिन होगी जब किसी को ‘School Thik Karo’ अभियान चलाने की जरूरत ही न पड़े।





