पहले बुवाई में ब्रेक, अब पकती फसल को मौसम का धोखा—खरीफ पैदावार पर कितना बड़ा खतरा?

Weather plays havoc with ripening crops

देश के किसानों के लिए खरीफ सीजन की शुरुआत ही मौसम की चुनौती से हुई थी। जून में कमजोर बारिश और सूखे जैसे हालात ने बुवाई की रफ्तार धीमी कर दी। बाद में मानसून ने रफ्तार पकड़ी तो किसानों ने तेजी से बुवाई पूरी की, लेकिन अब एक नई चिंता सामने आ रही है। सितंबर में सामान्य से कम बारिश और अधिक तापमान का खतरा खरीफ फसलों की पैदावार को प्रभावित कर सकता है। यानी किसानों ने जिस फसल को मुश्किलों के बीच खेत में खड़ा किया है, उसके पकने के अहम दौर में मौसम फिर परीक्षा ले सकता है।

सितंबर क्यों है खरीफ के लिए बेहद अहम?

धान, सोयाबीन और मक्का जैसी प्रमुख खरीफ फसलों के लिए सितंबर का मौसम बेहद महत्वपूर्ण होता है। यही वह समय है जब पौधों में दाने भरने और फसल के अंतिम विकास की प्रक्रिया तेज होती है। इस दौरान पर्याप्त नमी मिलने से दाने का आकार, वजन और गुणवत्ता बेहतर होती है।

अगर इसी चरण में बारिश कम हो जाती है और तापमान सामान्य से ऊपर चला जाता है तो फसलों पर दोहरी मार पड़ सकती है। मिट्टी में नमी घटेगी, पौधों पर गर्मी का दबाव बढ़ेगा और कई इलाकों में सिंचाई की जरूरत बढ़ सकती है। बारिश की कमी लंबी चली तो उत्पादन में गिरावट का जोखिम भी बढ़ जाएगा।

यही वजह है कि सितंबर का मौसम इस साल खरीफ किसानों के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।

अल-नीनो क्यों बढ़ा रहा चिंता?

दक्षिण प्रशांत महासागर के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी यानी अल-नीनो का असर दुनिया के मौसम पर पड़ता है। समुद्र की सतह का तापमान बदलने से वायुमंडलीय परिसंचरण और हवाओं के पैटर्न प्रभावित होते हैं। इसका असर अलग-अलग क्षेत्रों में बारिश और तापमान के स्वरूप पर दिखाई दे सकता है।

एपैक क्लाइमेट सेंटर यानी APCC के सितंबर से नवंबर के पूर्वानुमान में एशिया समेत दुनिया के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान की संभावना जताई गई है। भारत के लिए सितंबर में सामान्य से कम बारिश की आशंका इस पूर्वानुमान का सबसे चिंताजनक हिस्सा है।

हालांकि यह कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं है कि हर क्षेत्र में सूखा पड़ेगा। मौसम का वास्तविक असर क्षेत्र-दर-क्षेत्र अलग हो सकता है। लेकिन कम बारिश और अधिक तापमान का संयोजन कृषि के लिए जोखिम जरूर बढ़ाता है।

खरीफ के बाद रबी पर भी असर?

चिंता सिर्फ खरीफ तक सीमित नहीं है। सितंबर की बारिश रबी सीजन की जमीन तैयार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। गेहूं, चना, सरसों और आलू जैसी फसलों की बुवाई के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होना जरूरी है।

यदि सितंबर में बारिश कमजोर रहती है और अक्टूबर-नवंबर में तापमान भी अधिक रहता है तो खेतों की नमी तेजी से कम हो सकती है। ऐसी स्थिति में किसानों को सिंचाई के लिए ट्यूबवेल, बोरवेल या नहरों पर ज्यादा निर्भर होना पड़ेगा।

इससे खेती की लागत बढ़ सकती है। अगर खेत तैयार करने और बुवाई में देरी हुई तो रबी फसलों के उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। यानी खराब मौसम का असर एक सीजन से दूसरे सीजन तक पहुंचने का जोखिम पैदा हो सकता है।

जून की कमजोरी के बाद मानसून ने संभाला मोर्चा

हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। जून में कमजोर शुरुआत के बाद जुलाई और अगस्त में मानसून की स्थिति में सुधार हुआ। हिंद महासागर में पॉजिटिव इंडियन ओशन डाइपोल यानी IOD की अनुकूल स्थिति ने भी मानसून को समर्थन दिया और देश के कई हिस्सों में अच्छी बारिश हुई।

इसका फायदा यह हुआ कि किसानों ने रुकी हुई खरीफ बुवाई को तेजी से पूरा किया। यानी शुरुआती झटका काफी हद तक संभाल लिया गया।

कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 21 अगस्त 2026 तक देश में करीब 1,056.70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई हो चुकी थी। पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 1,072.77 लाख हेक्टेयर था। यानी इस बार बुवाई का रकबा करीब 16.07 लाख हेक्टेयर या 1.50 फीसदी कम है।

यह अंतर बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन अब चुनौती यह है कि खेतों में खड़ी फसल को सितंबर में पर्याप्त पानी और अनुकूल तापमान मिले।

किसान और सरकार के सामने क्या चुनौती?

अब सबसे जरूरी है कि मौसम की निगरानी लगातार की जाए और किसानों को स्थानीय स्तर पर समय रहते सलाह मिले। जहां बारिश कम हो वहां सिंचाई का बेहतर प्रबंधन, मिट्टी में नमी संरक्षण और फसल की अवस्था के अनुसार पानी का इस्तेमाल नुकसान को कम कर सकता है।

किसानों के लिए भी फसल की स्थिति के अनुसार सिंचाई और नमी संरक्षण बेहद अहम होगा। सरकार और कृषि विभागों को मौसम आधारित सलाह को गांव-गांव तक पहुंचाना होगा।

निष्कर्ष—फसल खड़ी है, लेकिन मौसम की परीक्षा बाकी

इस खरीफ सीजन की कहानी दो हिस्सों में बंटी हुई है। पहले जून की कमजोर बारिश ने बुवाई रोकी, फिर जुलाई-अगस्त की बारिश ने किसानों को संभाला। अब सितंबर तय करेगा कि खेत में खड़ी फसल कितनी अच्छी पैदावार देती है।

अगर बारिश सामान्य के करीब बनी रहती है तो किसानों को बड़ी राहत मिल सकती है। लेकिन कम बारिश और अधिक तापमान का दौर लंबा खिंचा तो धान, मक्का और सोयाबीन समेत कई खरीफ फसलों पर उत्पादन का दबाव बढ़ सकता है।

सबसे बड़ी उम्मीद यही है कि हिंद महासागर की अनुकूल परिस्थितियां मानसून को आगे भी सहारा देती रहें। क्योंकि इस वक्त किसानों की नजर सिर्फ आसमान पर नहीं, बल्कि सितंबर की हर बारिश पर टिकी है।

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