सनकी ट्रंप से यूरोप परेशान…अब आत्मनिर्भर बनेगा यूरोप! अमेरिका को किया अलग-थलग
ईरान युद्ध और होर्मुज संकट के बीच यूरोप ने बनाई नई रणनीति, “यूरोपियन NATO” की तैयारी से बदल सकता है वैश्विक शक्ति संतुलन
मध्य पूर्व में बढ़ते युद्ध और वैश्विक तनाव के बीच यूरोप अब एक बड़े रणनीतिक बदलाव की ओर बढ़ रहा है। यूरोप के कई देश मिलकर एक नए सुरक्षा ढांचे पर काम कर रहे हैं, जिसे अनौपचारिक तौर पर “यूरोपियन NATO” कहा जा रहा है। खास बात यह है कि इस पहल में अमेरिका को जानबूझकर अलग रखा गया है।
होर्मुज स्ट्रेट बना केंद्र, वैश्विक तेल सप्लाई पर मंडरा रहा संकट
नई रणनीति का सबसे बड़ा फोकस होर्मुज स्ट्रेट है, जो दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में गिना जाता है। इस रास्ते से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है, लेकिन ईरान युद्ध, मिसाइल हमलों और समुद्री खतरों के चलते यहां शिपिंग बुरी तरह प्रभावित हुई है। यूरोप इस रूट को सुरक्षित कर वैश्विक व्यापार को स्थिर करना चाहता है।
ब्रिटेन-फ्रांस की अगुवाई, 40 देशों की बड़ी बैठक की तैयारी
इस मिशन की कमान ब्रिटेन और फ्रांस ने संभाली है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री केयर स्टार्मर और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों इस हफ्ते 40 से ज्यादा देशों की बैठक बुलाने जा रहे हैं। इस बैठक में नए रक्षा गठबंधन की रूपरेखा पर विस्तार से चर्चा होगी।
अमेरिका से दूरी, ट्रंप की नीतियों से बढ़ा मतभेद
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे बड़ा कारण डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों को माना जा रहा है। ईरान युद्ध और होर्मुज ब्लॉकेड को लेकर यूरोपीय देशों और अमेरिका के बीच मतभेद लगातार बढ़े हैं। कई देशों ने अमेरिकी सैन्य रणनीतियों का समर्थन करने से इनकार कर दिया, जिससे रिश्तों में खटास और बढ़ गई।
“यूरोपियन NATO” क्या करेगा? तीन बड़े लक्ष्य तय
इस प्रस्तावित गठबंधन के तीन मुख्य उद्देश्य हैं। पहला, युद्ध में फंसे जहाजों को सुरक्षित निकालना। दूसरा, समुद्र में बिछी बारूदी सुरंगों को हटाना। और तीसरा, भविष्य के लिए जहाजों की सुरक्षा हेतु निगरानी और एस्कॉर्ट सिस्टम तैयार करना। यह पूरा मिशन यूरोपीय कमांड के तहत चलेगा, जो इसे पारंपरिक NATO से अलग बनाता है।
जर्मनी की एंट्री से मजबूत होगा मिशन
इस पहल में जर्मनी की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है। जर्मनी के पास माइन-क्लीयरिंग यानी समुद्री बारूदी सुरंग हटाने की उन्नत क्षमता है। अगर जर्मनी इस गठबंधन में सक्रिय रूप से शामिल होता है, तो मिशन की ताकत कई गुना बढ़ सकती है। यूरोप पहले भी इस तरह की पहल कर चुका है। रेड सी में “ऑपरेशन एस्पाइड्स” के तहत यूरोपीय देशों ने अपने जहाजों की सुरक्षा की थी। यह मिशन अमेरिका के अलग ऑपरेशन से स्वतंत्र था। अब उसी मॉडल को बड़े स्तर पर लागू करने की तैयारी की जा रही है।
चुनौतियां भी कम नहीं, ईरान की मंजूरी और टकराव का खतरा
हालांकि इस योजना के सामने कई चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि ईरान इस मिशन को मंजूरी देगा या नहीं। इसके अलावा, क्षेत्र में पहले से मौजूद अमेरिकी नौसेना और ब्लॉकेड के चलते किसी नए टकराव का खतरा भी बना हुआ है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर “यूरोपियन NATO” सफल होता है, तो यह वैश्विक शक्ति संतुलन को बदल सकता है। यूरोप पहली बार सुरक्षा मामलों में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बढ़ रहा है। इससे अमेरिका की पारंपरिक भूमिका कमजोर हो सकती है और दुनिया में नए शक्ति केंद्र उभर सकते हैं।





