E20 पेट्रोल पर सरकार का जोर: पश्चिम एशिया युद्ध के बीच तेल आयात घटाने की रणनीति, जानिए फायदे और विवाद

ऊर्जा संकट के दौर में E20 पेट्रोल बना भारत की रणनीति का अहम हिस्सा

पश्चिम एशिया में बढ़ते युद्ध और तेल सप्लाई पर मंडराते संकट के बीच भारत सरकार वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर तेजी से काम कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में कहा कि इथेनॉल मिश्रित E20 पेट्रोल देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। सरकार का मानना है कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने से कच्चे तेल पर निर्भरता कम हुई है, जिससे वैश्विक संकट का असर सीमित रखने में मदद मिल रही है।

इथेनॉल ब्लेंडिंग से कम हुआ तेल आयात, पिछले वर्षों में तेजी से बढ़ी क्षमता

सरकार के अनुसार पिछले एक दशक में इथेनॉल उत्पादन और ब्लेंडिंग की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। पहले जहां पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा लगभग 1 प्रतिशत थी, वहीं अब 20 प्रतिशत ब्लेंडिंग का लक्ष्य हासिल करने के करीब पहुंच चुके हैं। इसके चलते पिछले वर्ष भारत को लगभग 4.5 करोड़ बैरल कम तेल आयात करना पड़ा, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत भी हुई है।

E20 ईंधन से पर्यावरण और किसानों दोनों को फायदा मिलने की उम्मीद

E20 ईंधन में 80 प्रतिशत पेट्रोल और 20 प्रतिशत इथेनॉल होता है, जो गन्ने से तैयार किया जाता है। इससे न केवल कार्बन उत्सर्जन कम करने में मदद मिलती है बल्कि किसानों की आय बढ़ाने में भी सहायक माना जा रहा है। सरकार का मानना है कि इस कदम से पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा आत्मनिर्भरता दोनों लक्ष्यों को हासिल किया जा सकता है।

कुछ वाहन मालिकों ने माइलेज और इंजन को लेकर जताई चिंता

हालांकि E20 पेट्रोल को लेकर कुछ उपभोक्ताओं ने माइलेज कम होने और इंजन पर असर पड़ने की आशंका जताई है, खासकर पुराने वाहनों में। विशेषज्ञों के अनुसार अप्रैल 2023 के बाद बने वाहन E20 के अनुरूप डिजाइन किए गए हैं, जबकि पुराने वाहनों में कुछ तकनीकी समस्याएं सामने आ सकती हैं। सरकार और ऑटो इंडस्ट्री से जुड़े संगठनों ने इन चिंताओं को काफी हद तक गलतफहमी बताया है।

भविष्य में 30% ब्लेंडिंग और फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक पर भी विचार

इंडस्ट्री से जुड़े संगठनों ने सुझाव दिया है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग को धीरे-धीरे 30 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। साथ ही ब्राजील की तरह फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा देने और इथेनॉल आधारित अन्य ऊर्जा विकल्पों पर भी काम किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे आयात पर निर्भरता कम होगी और ऊर्जा क्षेत्र में स्थिरता आएगी।

 

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