पिछले 48 घंटों में दुनिया के तेल के नक्शे से दो सबसे अहम रास्ते एक साथ गायब हो गए हैं।
हुआ क्या है? दो रास्ते क्यों बंद हुए?
दुनिया का 40% तेल एक ही गली से निकलता है – होर्मुज स्ट्रेट। ईरान-इजराइल युद्ध के कारण वो पहले ही जाम है। उसका विकल्प था सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन। 1980 में बनी ये 1200 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन सऊदी के पूर्वी तेल कुओं को सीधा लाल सागर तक ले जाती है, ताकि होर्मुज से बचा जा सके। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक सऊदी ने जून में ही इस पाइपलाइन से निर्यात दोगुना करके 50 लाख बैरल प्रतिदिन से ज्यादा कर दिया था।
इराकी क्षेत्र से आए ड्रोन हमले के बाद सऊदी ने एहतियातन ये पाइपलाइन बंद कर दी है। झटका यहीं खत्म नहीं होता। यमन के हूतियों ने बाब-अल-मंदेब स्ट्रेट में रणनीतिक मायून द्वीप पर कब्जा कर लिया है। इसी बाब-अल-मंदेब से दुनिया का 12% व्यापार गुजरता है। मतलब लाल सागर वाला रास्ता भी अब खतरे में। एक तरफ होर्मुज बंद, दूसरी तरफ ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन बंद, तीसरी तरफ लाल सागर में खतरा – तेल के पास निकलने को कोई सुरक्षित रास्ता ही नहीं बचा। नतीजा – ब्रेंट क्रूड कुछ समय के लिए 110 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। इराक ने माना है कि हमला उसके क्षेत्र से हुआ और उसने मैसान प्रांत के सैन्य कमांडर को हटा दिया है। सऊदी ने अभी जवाबी कार्रवाई नहीं की है, लेकिन बाजार में पैनिक आ गया है।
2. भारत पर क्यों सबसे ज्यादा मार पड़ेगी?
भारत अपनी जरूरत का करीब 90% कच्चा तेल आयात करता है।* अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होते ही हमें समान मात्रा में तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ेंगे। हिसाब समझिए – भारत रोज करीब 50 लाख बैरल तेल पीता है। अगर क्रूड 80 डॉलर से 110 डॉलर हो गया, तो हर दिन 15 करोड़ डॉलर यानी करीब 1300 करोड़ रुपये ज्यादा देने पड़ेंगे। महीने का हिसाब लगाइए – 40,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ।
इसके तीन सीधे असर होंगे –
पहला – व्यापार घाटा और रुपया: आयात बिल बढ़ेगा तो सरकार को ज्यादा डॉलर बेचने पड़ेंगे। डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होगा। रुपया कमजोर होगा तो आयात और महंगा। ये एक दुष्चक्र है। पिछले हफ्ते ही रुपया 88.50 के पास था।
दूसरा – आपकी थाली और सफर: तेल की ऊंची कीमतों का असर सिर्फ पेट्रोल पंप पर नहीं दिखता। पेट्रोलियम उत्पादों, परिवहन और माल ढुलाई की लागत के जरिए घरेलू महंगाई पर असर पड़ता है। ट्रक का भाड़ा बढ़ेगा तो भोपाल की मंडी में सब्जी, अनाज, दूध सब महंगा होगा। तेल कंपनियों के मार्जिन पर दबाव होगा, तो वो लंबे समय तक घाटा सहकर दाम रोक नहीं पाएंगी।
तीसरा – सरकार का बजट: सरकार ने जो 20,000 करोड़ रुपये तेल कंपनियों को घाटा भरने के लिए देने का प्लान बनाया था, वो इस 110 डॉलर वाले झटके में कम पड़ जाएगा।
3. ये संकट BRICS वाली खबर से कैसे जुड़ा है?
हमने विश्लेषण किया था कि भारत BRICS में स्थानीय करेंसी में व्यापार पर जोर क्यों दे रहा है। ये उसका सबसे बड़ा सबूत है। जब तेल का भुगतान डॉलर में होता है और रास्ता बंद होने से डॉलर महंगा होता है, तो भारत को डबल मार पड़ती है। अगर भारत, रूस, सऊदी अरब के साथ रुपया-रियाल में व्यापार करने लगे, तो डॉलर की इस उछल-पछल से थोड़ी राहत मिल सकती है। इसीलिए कल मोदी-जिनपिंग-पुतिन की तस्वीर में जो “चलो साथ चलते हैं” का संदेश था, वो आज की इस क्रूड क्राइसिस में और ज्यादा प्रासंगिक हो गया है।
4. आगे क्या होगा? 3 सिनेरियो
सिनेरियो 1 – 15 दिन में रास्ता खुला: अगर सऊदी पाइपलाइन की मरम्मत जल्दी हो गई और अमेरिका ने हूतियों पर दबाव बनाकर बाब-अल-मंदेब खाली कराया, तो क्रूड वापस 85-90 डॉलर पर आ जाएगा। ये सबसे अच्छी स्थिति होगी।
सिनेरियो 2 – तनाव लंबा खिंचा: अगर होर्मुज और लाल सागर दोनों में बाधा 2-3 महीने रही, तो क्रूड 110-120 डॉलर पर टिक सकता है। तब सरकार को पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ेगा या फिर महंगाई को झेलना पड़ेगा। RBI ब्याज दरें नहीं घटा पाएगा।
सिनेरियो 3 – युद्ध फैला: अगर सऊदी ने जवाबी कार्रवाई की और ये क्षेत्रीय युद्ध बना, तो 1973 के ऑयल क्राइसिस जैसा संकट आ सकता है। तब क्रूड 150 डॉलर तक भी जा सकता है। ये ड्रोन हमला सिर्फ सऊदी की पाइपलाइन पर नहीं, भारत के घरेलू बजट पर हुआ है। होर्मुज के बाद दूसरा रास्ता बंद होना बताता है कि दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा अब 2-3 पाइपलाइनों और स्ट्रेट पर टिकी है। भारत जैसे देश के लिए जो 90% तेल बाहर से लाता है, यही समय है जब स्ट्रैटेजिक रिजर्व बढ़ाना और स्थानीय करेंसी में तेल खरीदने का विकल्प तैयार करना सबसे ज्यादा जरूरी हो गया है। अगले 10 दिन तय करेंगे कि आपकी गाड़ी का तेल और रसोई का बजट कितना बढ़ेगा।





