छत्तीसगढ़ नक्सलवाद खात्मे की डेडलाइन…Z+ सुरक्षा पर सियासत तेज, नक्सल मुक्त ऐलान से पहले उठे बड़े सवाल

Deadline to end Naxalism

Z+ सुरक्षा पर सियासत तेज, नक्सल मुक्त ऐलान से पहले उठे बड़े सवाल

कांग्रेस का तर्क—जब माओवाद खत्म, तो VIP सुरक्षा क्यों बरकरार? बीजेपी का जवाब—खतरा पूरी तरह टला नहीं

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खात्मे की डेडलाइन नजदीक आते ही अब Z+ और Z सुरक्षा को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने 31 मार्च 2026 तक “नक्सल मुक्त भारत” का लक्ष्य तय किया है, लेकिन इससे पहले ही सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं।

कांग्रेस का सवाल—“खतरा खत्म तो सुरक्षा क्यों?”

कांग्रेस का कहना है कि अगर माओवाद खत्म होने की कगार पर है, तो नेताओं को दी गई भारी-भरकम सुरक्षा अब तक क्यों जारी है।

कांग्रेस नेता सुशील आनंद शुक्ला ने सरकार से पूछा जब प्रदेश भर से नक्सलवाद पूरी तरह से खत्म हो चुका है, तो Z+ सुरक्षा को कब हटाया जाएगा? उनका तर्क है कि जब तक नेताओं की सुरक्षा कम नहीं होगी, तब तक आम जनता को यह भरोसा नहीं होगा कि नक्सलवाद सच में खत्म हो चुका है।

कितने नेताओं को कौन-सी सुरक्षा?

राज्य में सुरक्षा का बड़ा दायरा बना हुआ है:

  • Z+ सुरक्षा: 13 बड़े नेता
    • विष्णु देव साय
    • भूपेश बघेल
    • डॉ. रमन सिंह
  • बस्तर क्षेत्र: 9 जनप्रतिनिधि (Z+ सुरक्षा)
  • Z सुरक्षा: 38 जनप्रतिनिधि + परिवार
  • Y+ सुरक्षा: 35 लोग
  • X श्रेणी: 121 जनप्रतिनिधि और अधिकारी

यानी कुल मिलाकर करीब 60 से ज्यादा VIP और उनके परिवार हाई सिक्योरिटी में हैं।

सुरक्षा का मतलब क्या?

  • Z+ सुरक्षा: करीब 55 जवान
  • Z सुरक्षा: लगभग 22 जवान
  • Y+ सुरक्षा: 11 जवान
  • X सुरक्षा: 2 सशस्त्र पुलिसकर्मी

यह सुरक्षा खतरे के स्तर के आकलन के आधार पर तय की जाती है।

बीजेपी का पलटवार

कांग्रेस के आरोपों पर बीजेपी प्रवक्ता राजीव चक्रवर्ती ने जवाब दिया…भाजपा नेताओं का कहना है कि कांग्रेस को इस मुद्दे पर सवाल उठाने की बजाय नक्सलवाद खत्म होने का अपनी ओर से स्वागत करना चाहिए।।” उन्होंने कहा कि खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, इसलिए सुरक्षा बनाए रखना जरूरी है। हालांकि, आने वाले समय में हालात सामान्य होने पर सुरक्षा में कमी की जा सकती है।

बस्तर बना केंद्र

बस्तर को नक्सलवाद का गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन अब यहां बड़े माओवादी नेता या तो मारे जा चुके हैं या आत्मसमर्पण कर चुके हैं। ऐसे में यही सवाल उठ रहा है कि क्या अब खतरा प्रतीकात्मक रह गया है या अभी भी वास्तविक जोखिम मौजूद है? नक्सल मुक्त भारत के ऐलान से पहले छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बनाम सियासत का मुद्दा गरमा गया है। एक तरफ सरकार “खतरा पूरी तरह खत्म नहीं” मान रही है दूसरी तरफ विपक्ष “सुरक्षा हटाओ, तभी भरोसा होगा” की मांग कर रहा है अब देखना होगा—31 मार्च के बाद क्या सिर्फ नक्सलवाद खत्म होगा या VIP सुरक्षा का दायरा भी घटेगा?

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