बिहार विधानपरिषद चुनाव का ऐलान, नीतीश की खाली सीट पर भी होगा उपचुनाव…एक ही दिन में मतदान और परिणाम

dates for the elections to 10 seats of the Bihar Legislative Council have been announced

बिहार और कर्नाटक में विधानपरिषद चुनावों का बिगुल बज चुका है। चुनाव आयोग ने दोनों राज्यों में विधानपरिषद की सीटों पर चुनाव कार्यक्रम जारी कर दिया है। बिहार में कुल 10 सीटों पर चुनाव होंगे, जिनमें 9 सीटें सदस्यों का कार्यकाल पूरा होने के कारण खाली हो रही हैं, जबकि एक सीट मुख्यमंत्री रह चुके Nitish Kumar के राज्यसभा जाने के बाद रिक्त हुई है। राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए की मजबूत स्थिति दिखाई दे रही है और माना जा रहा है कि गठबंधन आसानी से 9 सीटें जीत सकता है। वहीं राष्ट्रीय जनता दल के खाते में एक सीट जाना लगभग तय माना जा रहा है।

18 जून को मतदान और उसी दिन नतीजे

 NDA के खाते में 9 सीटें जाने की संभावना

1 जून से शुरू होगी चुनाव प्रक्रिया

चुनाव आयोग के अनुसार विधानपरिषद चुनाव की अधिसूचना 1 जून 2026 को जारी की जाएगी। उम्मीदवार 8 जून तक नामांकन दाखिल कर सकेंगे। इसके बाद 9 जून को नामांकन पत्रों की जांच होगी। उम्मीदवारों को 11 जून तक नाम वापस लेने का अवसर मिलेगा। मतदान 18 जून को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक कराया जाएगा। वोटों की गिनती भी उसी दिन शाम 5 बजे से शुरू होगी और परिणाम देर शाम तक सामने आ जाएंगे। आयोग ने स्पष्ट किया है कि पूरी चुनाव प्रक्रिया 20 जून तक पूरी कर ली जाएगी।

बिहार में किन नेताओं का कार्यकाल हो रहा समाप्त

बिहार विधानपरिषद से जिन सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, उनमें डॉ. कुमुद वर्मा, प्रोफेसर गुलाम गौस, मोहम्मद फारूक, भीष्म साहनी, श्रीभगवान सिंह कुशवाहा, संजय प्रकाश, समीर कुमार सिंह, Samrat Choudhary और सुनील कुमार सिंह शामिल हैं। इन सभी का कार्यकाल 28 जून को समाप्त हो रहा है। हालांकि सम्राट चौधरी पहले ही नवंबर 2025 में इस सीट से इस्तीफा दे चुके थे। इसके अलावा एक सीट Nitish Kumar के राज्यसभा सदस्य बनने के बाद खाली हुई थी, जिस पर अब उपचुनाव कराया जाएगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव में सबसे ज्यादा फायदा जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू को मिल सकता है, क्योंकि अधिकांश सीटें पहले उसके हिस्से में थीं। भाजपा को भी 2 से 3 सीटें मिलने की संभावना जताई जा रही है, जबकि शेष सीटें सहयोगी दलों में बांटी जा सकती हैं।

विधानसभा में संख्या बल से NDA मजबूत

243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में विधानपरिषद की एक सीट जीतने के लिए लगभग 24 से 25 विधायकों के समर्थन की आवश्यकता होती है। वर्तमान राजनीतिक स्थिति में एनडीए के पास दो-तिहाई से अधिक विधायकों का समर्थन है। भाजपा और जेडीयू के नेतृत्व वाले गठबंधन की संख्या इतनी मजबूत है कि वह आसानी से 9 सीटें जीत सकता है। हालांकि गठबंधन की कोशिश सभी 10 सीटों पर जीत दर्ज करने की होगी।

दूसरी ओर, Lalu Prasad Yadav की पार्टी आरजेडी के पास लगभग 25 विधायक हैं और वह अपने दम पर एक सीट जीतने की स्थिति में दिखाई दे रही है। इसीलिए माना जा रहा है कि 10 में से एक सीट विपक्ष के खाते में जा सकती है।

सहयोगी दलों में सीटों को लेकर बढ़ी हलचल

विधानपरिषद चुनाव की घोषणा के साथ ही एनडीए के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर गतिविधियां तेज हो गई हैं। Chirag Paswan की लोक जनशक्ति पार्टी, Upendra Kushwaha की राष्ट्रीय लोक मोर्चा और Jitan Ram Manjhi की हम पार्टी भी विधानपरिषद में प्रतिनिधित्व चाहती हैं। ऐसे में जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखकर उम्मीदवारों का चयन किया जाएगा।

राजनीतिक गलियारों में कई नए नामों की चर्चा भी शुरू हो गई है। स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार को छह महीने के भीतर विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बनना जरूरी है, इसलिए उन्हें विधानपरिषद भेजे जाने की संभावना जताई जा रही है। वहीं पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश, जो Upendra Kushwaha के पुत्र हैं, उनका नाम भी संभावित उम्मीदवारों की सूची में शामिल बताया जा रहा है।

कर्नाटक में भी 7 सीटों पर चुनाव

बिहार के साथ-साथ कर्नाटक विधानपरिषद चुनाव का कार्यक्रम भी घोषित किया गया है। यहां कुल 7 सीटों पर चुनाव होंगे। इन सीटों पर वर्तमान सदस्यों का कार्यकाल 30 जून को समाप्त हो रहा है। इनमें तीन सदस्य भाजपा, तीन कांग्रेस और एक जेडीएस से हैं। चुनाव विधानसभा सदस्यों के माध्यम से कराया जाएगा।

कर्नाटक विधानपरिषद से जिन नेताओं का कार्यकाल पूरा हो रहा है, उनमें गोविंद राजू, नसीर अहमद, एन नागाराजू, प्रताप सिम्हा नायक, टिप्पानप्पा, सुनील वालायुर और बीके हरिप्रसाद शामिल हैं। इन सीटों पर भी मतदान 18 जून को ही होगा और परिणाम उसी दिन घोषित किए जाएंगे।

बिहार की राजनीति में अहम माना जा रहा चुनाव

बिहार विधानपरिषद चुनाव को केवल एक नियमित चुनाव नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक ताकत के प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा रहा है। एनडीए जहां अपनी एकजुटता और मजबूत संख्या बल दिखाना चाहता है, वहीं विपक्ष इस चुनाव के जरिए अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाए रखने की कोशिश करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि विधानपरिषद चुनाव के जरिए दलित, पिछड़ा और सवर्ण समीकरणों को साधने की रणनीति पर भी काम होगा। उम्मीदवारों के चयन में सामाजिक संतुलन सबसे बड़ा फैक्टर बन सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति और ज्यादा गर्म होने की संभावना है।

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