कच्चे तेल में फिर उबाल, 100 डॉलर के पार ब्रेंट-डब्ल्यूटीआई… भारत में पेट्रोल-डीजल पर बढ़ सकता है दबाव

Petrol and diesel prices

कच्चे तेल में फिर उबाल, 100 डॉलर के पार ब्रेंट-डब्ल्यूटीआई… भारत में पेट्रोल-डीजल पर बढ़ सकता है दबाव
मध्य-पूर्व के तनाव ने बढ़ाई तेल बाजार की चिंता
वैश्विक तेल बाजार में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है। 14 सितंबर को सप्ताह के पहले कारोबारी सत्र की शुरुआत में ब्रेंट क्रूड करीब 2.8 फीसदी उछलकर 107.5 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया, जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड करीब 2.65 फीसदी बढ़कर 102.7 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। यानी दोनों प्रमुख वैश्विक मानक कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर के ऊपर हैं।
तेल बाजार में इस तेजी की सबसे बड़ी वजह मध्य-पूर्व में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति बाधित होने की आशंका है। खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल और माल ढुलाई की सुरक्षा को लेकर बनी अनिश्चितता ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है।
कभी 6 फीसदी उछाल, फिर 3 फीसदी गिरावट
बीते कारोबारी सत्रों में कच्चे तेल की कीमतों में जबरदस्त उतार-चढ़ाव देखने को मिला। मध्य-पूर्व में तेल टैंकरों पर हमलों के बाद दोनों प्रमुख क्रूड की कीमतों में 6 फीसदी से ज्यादा की तेजी आई थी और कीमतें 100 डॉलर के पार निकल गई थीं।
इसके बाद ऐसी खबरें आईं कि मध्य-पूर्व के कुछ देश होर्मुज जलडमरूमध्य से माल की आवाजाही जारी रखने के लिए ईरान के साथ अस्थायी समझौते की कोशिश कर रहे हैं। इससे बाजार को कुछ राहत मिली और तेल की कीमतों में करीब 3 फीसदी की गिरावट आई।
लेकिन यह राहत ज्यादा देर नहीं टिक सकी। नए हमलों और क्षेत्रीय ऊर्जा ढांचे पर खतरे की आशंका ने बाजार में फिर तेजी ला दी।
होर्मुज से आगे बढ़ा सप्लाई संकट का खतरा
विशेषज्ञों के मुताबिक, मौजूदा संकट सिर्फ ईरान या होर्मुज जलडमरूमध्य तक सीमित नहीं रह गया है। यमन में सऊदी अरब की ऊर्जा सुविधाओं पर हौथी हमलों की खबरों ने तेल की आपूर्ति को लेकर जोखिम और बढ़ा दिया है।
इसका मतलब साफ है कि बाजार अब सिर्फ प्रमुख तेल निर्यात मार्गों पर ही नजर नहीं रख रहा, बल्कि मध्य-पूर्व की ऊर्जा उत्पादन सुविधाओं और बुनियादी ढांचे पर संभावित हमलों को भी कीमतों के लिए बड़ा जोखिम मान रहा है।
एसएंडपी ग्लोबल एनर्जी के विश्लेषण के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष के जल्द खत्म होने की संभावना कमजोर पड़ने पर बाजार को कभी-कभार होने वाली रुकावटों के बजाय लंबे समय तक आपूर्ति बाधित होने का सामना करना पड़ सकता है।
चीन की तेल खरीद तय करेगी आगे की दिशा
अब तेल बाजार की नजर दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातक चीन पर भी टिक गई है। विश्लेषकों के मुताबिक, पिछले कुछ हफ्तों में चीन ने कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई है। अगर यह मांग आगे भी बनी रहती है और इसी दौरान मध्य-पूर्व से आपूर्ति प्रभावित होती है, तो वैश्विक बाजार में कीमतों पर दोहरा दबाव बन सकता है।
यानी एक तरफ आपूर्ति का जोखिम और दूसरी तरफ चीन की बढ़ती मांग—दोनों मिलकर कच्चे तेल को और महंगा कर सकते हैं। हालांकि चीन अगर फिर से आयात कम करता है तो कीमतों में तेजी की रफ्तार पर ब्रेक लग सकता है।
भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?
कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज उछाल का सीधा असर भारत के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में लंबे समय तक क्रूड महंगा रहने पर तेल आयात का बिल बढ़ सकता है और पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर दबाव बन सकता है।
भारत में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें सिर्फ अंतरराष्ट्रीय क्रूड के आधार पर तय नहीं होतीं। इसमें विदेशी मुद्रा विनिमय दर, रिफाइनिंग लागत, केंद्रीय और राज्य कर तथा तेल विपणन कंपनियों के मूल्य निर्धारण जैसे कई कारक शामिल होते हैं। इसलिए वैश्विक क्रूड में बढ़ोतरी का असर घरेलू पंप कीमतों पर तुरंत और उसी अनुपात में दिखाई देना जरूरी नहीं है।
लेकिन अगर ब्रेंट लंबे समय तक 100 डॉलर से ऊपर बना रहता है, तो भारत के लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है। महंगा कच्चा तेल यानी आयात बिल पर दबाव, व्यापार संतुलन पर असर और आगे चलकर महंगाई की चिंता।
बड़ा सवाल
14 सितंबर की शुरुआत ने एक बार फिर संकेत दिया है कि वैश्विक तेल बाजार फिलहाल बेहद संवेदनशील दौर में है। ब्रेंट 107.5 डॉलर और डब्ल्यूटीआई 102.7 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंचना भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश के लिए नजर रखने वाली स्थिति है।
अगर मध्य-पूर्व का तनाव बढ़ता है और तेल आपूर्ति में वास्तविक व्यवधान आता है, तो 100 डॉलर से ऊपर का क्रूड लंबे समय तक बना रह सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों, महंगाई और भारत के आयात बिल पर दबाव तीनों महत्वपूर्ण मुद्दे बन सकते हैं।

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