अंतरराष्ट्रीय तनाव ने क्यों बढ़ाई तेल की तपिश
अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच लगातार गहराते सैन्य तनाव ने वैश्विक बाजारों में जबरदस्त हलचल मचा दी है। इसका सबसे सीधा असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है, जो कुछ ही समय में करीब 10 प्रतिशत तक उछल गईं। भू-राजनीतिक अनिश्चितता, सप्लाई रूट्स पर खतरे और युद्ध के लंबे खिंचने की आशंका ने निवेशकों को सतर्क कर दिया है। नतीजतन, एनर्जी मार्केट में कीमतें ऊपर भाग रही हैं और इसका असर भारत के शेयर बाजार में साफ नजर आया।
डाउनस्ट्रीम कंपनियों पर पड़ा सबसे ज्यादा दबाव
कच्चे तेल की कीमतों में आई इस तेज़ी का खामियाजा भारत की डाउनस्ट्रीम तेल कंपनियों को भुगतना पड़ा। शुरुआती कारोबार में Hindustan Petroleum Corporation Limited, Bharat Petroleum Corporation Limited और Indian Oil Corporation Limited के शेयरों में तेज गिरावट दर्ज की गई।
बीपीसीएल के शेयर करीब 6 प्रतिशत, एचपीसीएल के 5.3 प्रतिशत और आईओसी के शेयरों में लगभग 5 प्रतिशत तक की गिरावट देखने को मिली। निवेशकों को आशंका है कि ऊंचे दाम पर कच्चा तेल खरीदने के बावजूद इन कंपनियों को देश में ईंधन के दाम सीमित रखने पड़ते हैं, जिससे उनका मार्जिन दबाव में आ जाता है।
अपस्ट्रीम शेयरों में क्यों दिखी रफ्तार
इसके उलट, अपस्ट्रीम ऑयल और गैस कंपनियों के शेयरों में जोरदार तेजी देखने को मिली। सोमवार को Oil and Natural Gas Corporation और Oil India Limited के शेयरों में करीब 5 प्रतिशत तक की बढ़त दर्ज की गई।
बीएसई पर ओएनजीसी का शेयर बढ़कर 293 रुपये के स्तर तक पहुंच गया, जबकि ऑयल इंडिया का शेयर शुरुआती कारोबार में 505.50 रुपये तक चढ़ गया। साफ है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें उन कंपनियों के लिए फायदेमंद साबित हो रही हैं, जो सीधे तेल और गैस का उत्पादन करती हैं।
तेल-गैस सेक्टर को कैसे समझें: अपस्ट्रीम, मिडस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम
तेल और गैस सेक्टर को आमतौर पर तीन हिस्सों में बांटा जाता है।
अपस्ट्रीम कंपनियां कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के भंडार खोजने और उन्हें जमीन या समुद्र के नीचे से निकालने का काम करती हैं।
मिडस्ट्रीम कंपनियां तेल और गैस को पाइपलाइन या टैंकरों के जरिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने और स्टोर करने की जिम्मेदारी निभाती हैं।
वहीं, डाउनस्ट्रीम कंपनियां कच्चे तेल को रिफाइन कर पेट्रोल, डीजल जैसे उत्पाद बनाती हैं और उपभोक्ताओं तक पहुंचाती हैं।
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से किसे फायदा, किसे नुकसान
जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 82 डॉलर प्रति बैरल के पार जाता है, तो अपस्ट्रीम कंपनियों को अपने उत्पाद के बदले ज्यादा कीमत मिलती है, जिससे उनकी कमाई बढ़ती है। दूसरी ओर, डाउनस्ट्रीम कंपनियां महंगे दाम पर कच्चा तेल खरीदने को मजबूर होती हैं, लेकिन घरेलू बाजार में कीमतें स्थिर रखने के दबाव के कारण वे अतिरिक्त लागत उपभोक्ताओं पर नहीं डाल पातीं। यही वजह है कि ऊंचे क्रूड प्राइस का असर उनके मुनाफे और शेयरों पर नकारात्मक रूप से दिखता है।
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