चमोली के तमक नाले में सैलाब और धराली हादसे में कितना कनेक्शन? समझिए पूरी कहानी

flash flood in Chamoli Tamak Nala and the Dharali accident

4 हजार मीटर की ऊंचाई पर बारिश, ग्लेशियर का मलबा और संकरी घाटी ने बढ़ाया खतरा

उत्तराखंड के चमोली की नीति घाटी में तमक नाले का सैलाब एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते आपदा जोखिम की ओर इशारा कर रहा है। पानी के साथ बड़े-बड़े बोल्डर और मलबे का तेज बहाव इतना शक्तिशाली था कि लोहे का पुल तक बह गया। इसका दृश्य करीब एक साल पहले उत्तरकाशी के धराली में आई विनाशकारी बाढ़ की याद दिलाता है। हालांकि, वैज्ञानिक अभी यह पता लगाने में जुटे हैं कि दोनों घटनाओं के पीछे बिल्कुल समान कारण थे या नहीं।

तमक और धराली में क्या समानता?

दोनों घटनाओं में ऊंचाई वाला हिमालयी क्षेत्र, ग्लेशियर के आसपास जमा मोरेन मलबा और अचानक तेज पानी का बहाव महत्वपूर्ण परिस्थितियां हैं। मोरेन दरअसल ग्लेशियर के पीछे छूटने वाला पत्थर, मिट्टी और दूसरे मलबे का जमाव होता है। जब भारी बारिश या ग्लेशियर से आया पानी इस मलबे को अपने साथ बहाता है, तो फ्लैश फ्लड बेहद विनाशकारी हो सकता है।

4 हजार मीटर पर बारिश क्यों खतरनाक?

वैज्ञानिकों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण ऊंचाई वाले इलाकों में बारिश का पैटर्न बदल रहा है। जिन ऊंचाइयों पर पहले बर्फबारी अधिक होती थी, वहां बारिश होने की स्थिति बन रही है। करीब 4 हजार मीटर या उससे अधिक ऊंचाई पर बारिश होने से ग्लेशियर और उसके आसपास जमा मलबे पर पानी का दबाव बढ़ सकता है। यही पानी मलबे को नीचे की ओर तेजी से धकेल सकता है।

हाथी पर्वत और ग्लेशियर का कनेक्शन

तमक नाले के ऊपरी हिस्से में हाथी पर्वत स्थित है, जहां से कई ग्लेशियर निकलते हैं। इसके आधार क्षेत्र में भारी मात्रा में मोरेन मटेरियल जमा होने की बात सामने आई है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर इस क्षेत्र में बारिश और ग्लेशियर से आने वाला पानी एक साथ बढ़े, तो मलबे के साथ अचानक तेज बहाव पैदा हो सकता है।

लैंडस्लाइड ने भी बढ़ाया खतरा

तमक नाले और हाथी पर्वत के बेस के बीच बड़े भूस्खलन होने की बात भी सामने आई है। ऐसे में लैंडस्लाइड का मलबा किसी स्थान पर जमा होकर अस्थायी अवरोध बना सकता है। इसके पीछे पानी जमा होता रहे और अचानक यह अवरोध टूट जाए तो नीचे की ओर बेहद तेज फ्लैश फ्लड आ सकता है।

संकरी घाटी ने बढ़ाई तबाही

तमक नाले की भौगोलिक बनावट भी इसे संवेदनशील बनाती है। विशेषज्ञों के मुताबिक यहां घाटी काफी संकरी है और ढाल लगभग 45 डिग्री तक है। ऐसे इलाके में पानी और मलबे का बहाव नीचे आते समय तेजी पकड़ता है। इसी वजह से फ्लड का वेग और उसकी मारक क्षमता दोनों बढ़ सकती हैं।

क्या धराली जैसा हादसा फिर हो सकता है?

तमक नाले और धराली की परिस्थितियों में कई समानताएं जरूर दिखाई देती हैं, लेकिन दोनों घटनाओं को एक ही कारण से जोड़ना अभी जल्दबाजी होगी। वैज्ञानिक अध्ययन के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि तमक नाले में फ्लैश फ्लड वास्तव में किस प्रक्रिया से बना। इतना जरूर है कि हिमालय के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बदलता मौसम, ग्लेशियर, मोरेन मलबा, भूस्खलन और संकरी घाटियां मिलकर भविष्य में अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा बढ़ा सकती हैं।

बड़ा सवाल: क्या हिमालय बदल रहा है?

तमक नाले की घटना सिर्फ एक स्थानीय बाढ़ नहीं, बल्कि हिमालयी क्षेत्रों में बदलते मौसम और बढ़ते आपदा जोखिम की बड़ी तस्वीर का हिस्सा हो सकती है। ग्लोबल वार्मिंग, ऊंचाई पर बारिश, ग्लेशियरों के आसपास जमा मलबा और कमजोर पहाड़ी ढलान—इन सभी कारकों पर लगातार वैज्ञानिक निगरानी जरूरी है। यही निगरानी भविष्य में ऐसी आपदाओं की समय रहते चेतावनी देने में मदद कर सकती है।

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