राजनीति में शब्द केवल विचार व्यक्त करने का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे किसी पार्टी की सोच, रणनीति और राजनीतिक संस्कार की तस्वीर भी पेश करते हैं। सत्ता पक्ष से सवाल पूछना हो, विपक्ष की भूमिका निभानी हो या चुनावी मैदान में प्रतिद्वंद्वी को चुनौती देनी हो, भाषा की धार हमेशा महत्वपूर्ण रहती है। लेकिन जब नीतियों और जनहित के मुद्दों की जगह व्यक्तिगत टिप्पणियां सुर्खियां बटोरने लगें, तब राजनीतिक बहस का केंद्र बदल जाता है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर की गई ताजा टिप्पणी ने एक बार फिर यही सवाल खड़ा किया है।
25 अक्टूबर 2026 को पटना में डॉ. श्रीकृष्ण सिंह की जयंती के कार्यक्रम में खड़गे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर में कथित गड़बड़ियों का मुद्दा उठा रहे थे। इसी दौरान जब एक व्यक्ति ने कहा कि नरेंद्र मोदी कहीं नहीं जाएंगे, तो खड़गे ने जवाब दिया, “मोदी का बाप भी जाएगा।” इस टिप्पणी के बाद भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस अध्यक्ष पर राजनीतिक मर्यादा तोड़ने का आरोप लगाया और माफी की मांग की। सवाल यह नहीं है कि विपक्ष प्रधानमंत्री की आलोचना क्यों कर रहा है। लोकतंत्र में प्रधानमंत्री सहित किसी भी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति की आलोचना करना विपक्ष का अधिकार है। असली सवाल यह है कि क्या राजनीतिक विरोध को व्यक्तिगत अपमान की भाषा में बदलना जरूरी है? और क्या ऐसी टिप्पणियां कांग्रेस को राजनीतिक लाभ पहुंचाती हैं या उलटे भाजपा को अपने पक्ष में माहौल बनाने का अवसर देती हैं?
खड़गे का बयान और भाजपा को मिला राजनीतिक हथियार
पटना की घटना को केवल एक विवादित वाक्य तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे आज की राजनीति का वह ढांचा भी है, जिसमें किसी नेता का बयान कुछ ही मिनटों में राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है। भाषण का मूल विषय पीछे छूट जाता है और एक तीखी टिप्पणी पूरे घटनाक्रम पर हावी हो जाती है। खड़गे एसआईआर की प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे थे। मतदाता सूची की शुद्धता, पात्र मतदाताओं के अधिकार और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता ऐसे विषय हैं, जिन पर विपक्ष गंभीर बहस कर सकता है। यदि कांग्रेस के पास अनियमितताओं के प्रमाण हैं, तो उसे आंकड़ों, दस्तावेजों और प्रभावित मतदाताओं के उदाहरणों के साथ अपना पक्ष रखना चाहिए था।
लेकिन विवादित टिप्पणी ने चर्चा का रुख बदल दिया। अब सवाल एसआईआर की प्रक्रिया से हटकर इस पर केंद्रित हो गया कि कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री के लिए कैसी भाषा का इस्तेमाल किया। यहीं भाजपा की राजनीतिक रणनीति को समझना जरूरी है। भाजपा के लिए यह बयान कांग्रेस को घेरने का अवसर बन गया। पार्टी इसे केवल एक नेता की टिप्पणी नहीं, बल्कि कांग्रेस की राजनीतिक संस्कृति से जोड़कर पेश कर सकती है। इस तरह एक बयान से तीन राजनीतिक लाभ लेने की गुंजाइश पैदा होती है।
पहला, प्रधानमंत्री के प्रति व्यक्तिगत अपमान का मुद्दा उठाकर समर्थकों को एकजुट करना। दूसरा, कांग्रेस की भाषा और नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल खड़े करना। तीसरा, विपक्ष के मूल आरोपों से बहस को हटाकर बयानबाजी के मुद्दे पर केंद्रित करना। हालांकि, इससे यह अपने आप साबित नहीं होता कि भाजपा की हर प्रतिक्रिया निष्पक्ष है या कांग्रेस के आरोप निराधार हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि विवादित बयान विपक्ष को अपने ही मुद्दे का बचाव करने की स्थिति में ला सकता है।
एक बयान नहीं, विवादों की लंबी शृंखला
खड़गे की ताजा टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा को लेकर कांग्रेस के कई नेताओं की पुरानी टिप्पणियां भी राजनीतिक बहस का हिस्सा रही हैं। इन घटनाओं को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि व्यक्तिगत कटाक्ष भारतीय राजनीति में कोई नई प्रवृत्ति नहीं है। हालांकि, हर बयान का संदर्भ और उसकी गंभीरता अलग-अलग है।
दिसंबर 2007: सोनिया गांधी का ‘मौत का सौदागर’ बयान
गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी को ‘मौत का सौदागर’ कहा था। उस समय मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। इस टिप्पणी ने चुनावी बहस में खास जगह बनाई। भाजपा ने इसे मोदी के व्यक्तिगत अपमान के रूप में प्रस्तुत किया और कांग्रेस को कठघरे में खड़ा किया।
2009: ‘गंदी नाली का कीड़ा’ टिप्पणी
कांग्रेस नेता बी.के. हरिप्रसाद की ओर से नरेंद्र मोदी के लिए ‘गंदी नाली का कीड़ा’ जैसे शब्द इस्तेमाल किए जाने का प्रसंग भी विवादित राजनीतिक भाषा के उदाहरण के रूप में सामने आता रहा है। ऐसी टिप्पणियां नीतिगत आलोचना के बजाय व्यक्तिगत हमले की राजनीति को बढ़ावा देती हैं।
जनवरी 2014: ‘चायवाला’ पर कटाक्ष
लोकसभा चुनाव से पहले मणिशंकर अय्यर ने नरेंद्र मोदी की चाय बेचने की पृष्ठभूमि पर कटाक्ष किया था। भाजपा ने इस टिप्पणी को सामाजिक पृष्ठभूमि और साधारण परिवार से आने वाले व्यक्ति के अपमान से जोड़कर प्रचारित किया। मोदी ने अपनी चाय बेचने की पहचान को राजनीतिक संवाद का हिस्सा बनाया और भाजपा ने इसे जनसंपर्क का मुद्दा बनाया।
2018-2019: ‘चौकीदार चोर है’ का नारा
राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री के खिलाफ ‘चौकीदार चोर है’ का नारा दिया। कांग्रेस का उद्देश्य सौदे में कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाना था। लेकिन भाजपा ने इस नारे को प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत आरोप के रूप में चुनौती दी। राफेल विवाद में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के साथ न्यायिक कार्यवाही और सार्वजनिक जवाब भी महत्वपूर्ण रहे। इसलिए इस पूरे प्रकरण को केवल नारे तक सीमित करना उचित नहीं होगा।
नवंबर 2022: खड़गे का ‘रावण’ वाला कटाक्ष
गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान खड़गे ने मोदी के बार-बार चुनाव प्रचार में आने और अपने चेहरे पर वोट मांगने पर सवाल उठाते हुए पूछा था कि क्या उनके सौ सिर हैं, जैसे रावण के सौ सिर होने की कल्पना की जाती है। भाजपा ने इसे प्रधानमंत्री का अपमान बताया।
अप्रैल 2023: ‘जहरीले सांप’ की तुलना
कर्नाटक विधानसभा चुनाव के दौरान खड़गे ने नरेंद्र मोदी की तुलना जहरीले सांप से की थी। विवाद बढ़ने पर उन्होंने सफाई दी कि उनका आशय प्रधानमंत्री से नहीं, बल्कि भाजपा की विचारधारा से था। इस प्रकरण ने फिर सवाल उठाया कि राजनीतिक विचारधारा की आलोचना करते समय व्यक्तिगत उपमाओं का इस्तेमाल कितना उचित है।
अक्टूबर 2024: भाजपा को ‘आतंकवादी पार्टी’ कहना
कलबुर्गी में एक कार्यक्रम के दौरान खड़गे ने भाजपा को ‘आतंकवादी पार्टी’ कहा था। उन्होंने अपने आरोपों को मॉब लिंचिंग और हिंसा की घटनाओं से जोड़ने की कोशिश की। भाजपा ने इस भाषा पर आपत्ति जताई।
जनवरी 2025: गंगा स्नान पर सवाल
मध्य प्रदेश के महू में खड़गे ने महाकुंभ में भाजपा नेताओं के गंगा स्नान को लेकर पूछा कि क्या इससे गरीबी दूर होती है और लोगों को भोजन मिलता है। उन्होंने बाद में स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य किसी की धार्मिक आस्था को ठेस पहुंचाना नहीं था। यह प्रसंग व्यक्तिगत अपमान से अलग है, क्योंकि इसमें धार्मिक अनुष्ठान और उसके राजनीतिक प्रदर्शन पर सवाल उठाया गया था। फिर भी भाषा और संदर्भ को लेकर विवाद हुआ।
अप्रैल 2026: ‘आतंकवादी’ शब्द पर विवाद
चेन्नई में पत्रकारों से बातचीत के दौरान खड़गे ने प्रधानमंत्री के संदर्भ में ‘आतंकवादी’ शब्द इस्तेमाल किया। विवाद बढ़ने पर उन्होंने कहा कि उनका आशय लोगों और राजनीतिक दलों को डराने वाली कार्यशैली से था। यह स्पष्टीकरण भी बताता है कि राजनीतिक वक्तव्य में शब्दों के चयन का महत्व कितना बढ़ गया है।
अक्टूबर 2026: ‘मोदी का बाप भी जाएगा’
पटना में दिया गया ताजा बयान इसी विवाद शृंखला की नई कड़ी बन गया है। अब भाजपा को कांग्रेस अध्यक्ष के शब्दों पर सवाल उठाने और कांग्रेस को अपने नेता के बयान का बचाव करने का अवसर मिला है।
इन घटनाओं में अंतर करना जरूरी है। किसी नीतिगत फैसले की आलोचना, धार्मिक अनुष्ठान पर राजनीतिक सवाल, चुनावी नारा और व्यक्तिगत अपमान एक ही श्रेणी में नहीं आते। लेकिन जब किसी बयान का केंद्र तर्क से हटकर व्यक्ति की गरिमा पर चोट बन जाता है, तब उसके राजनीतिक परिणाम भी उसी दिशा में जाते हैं।
भाजपा की रणनीति: बयान को मुद्दा बनाओ, मुद्दे को चुनाव से जोड़ो
भाजपा की राजनीति में विपक्षी नेताओं की विवादित टिप्पणियों को सार्वजनिक विमर्श का विषय बनाना एक महत्वपूर्ण चुनावी रणनीति के रूप में दिखाई देता है। किसी बयान पर प्रतिक्रिया देना स्वाभाविक है, लेकिन उसे लगातार राजनीतिक अभियान का हिस्सा बनाना उससे आगे की रणनीति है। इस रणनीति के तीन प्रमुख पहलू हैं।
पहला, नेतृत्व की छवि। भाजपा नरेंद्र मोदी को अपने प्रमुख राजनीतिक चेहरे के रूप में प्रस्तुत करती है। प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत टिप्पणी को पार्टी अपने नेतृत्व और समर्थकों के सम्मान से जोड़ सकती है। इससे विवाद केवल एक व्यक्ति के बारे में नहीं रहता, बल्कि समर्थकों की राजनीतिक पहचान से भी जुड़ जाता है।
दूसरा, विपक्ष की विश्वसनीयता पर सवाल। भाजपा कांग्रेस से पूछ सकती है कि जब पार्टी के शीर्ष नेता ऐसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो वह लोकतांत्रिक मर्यादा और राजनीतिक शालीनता की बात कैसे करती है? यह सवाल कांग्रेस के लिए असहज स्थिति पैदा करता है, खासकर तब जब उसे अपने ही अध्यक्ष के बयान पर सफाई देनी पड़े।
तीसरा, मूल मुद्दे से ध्यान हटने की संभावना। महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की आय, सामाजिक न्याय, मतदाता सूची और चुनावी पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर विपक्ष को लगातार सवाल उठाने होते हैं। लेकिन विवादित बयान सामने आने पर मीडिया और राजनीतिक दलों का ध्यान उसी पर केंद्रित हो सकता है। परिणामस्वरूप विपक्ष को अपने मूल मुद्दे को फिर से चर्चा में लाने के लिए अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता है।
हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी विवाद का चुनावी लाभ भाजपा को कितना मिलेगा, यह केवल बयान से तय नहीं होता। मतदाता स्थानीय परिस्थितियों, सरकार के कामकाज, उम्मीदवार, आर्थिक स्थिति और दूसरे मुद्दों को भी देखते हैं। इसलिए हर विवाद को सीधे चुनावी जीत या हार से जोड़ना अतिशयोक्ति होगी।
फिर भी, रणनीतिक स्तर पर भाजपा को ऐसा अवसर जरूर मिलता है, जिसमें वह कांग्रेस के मुद्दों की जगह कांग्रेस की भाषा पर बहस करा सकती है।
कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी: मुद्दा सही हो, तो भी संदेश क्यों भटक जाता है?
विपक्ष की जिम्मेदारी केवल सरकार की आलोचना करना नहीं है, बल्कि जनता के सामने एक विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करना भी है। इसके लिए आरोपों में तथ्य, भाषा में संयम और संदेश में स्पष्टता जरूरी है। खड़गे के मामले में सबसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न यही है कि क्या विवादित टिप्पणी ने एसआईआर पर कांग्रेस की आपत्तियों को मजबूत किया? उपलब्ध घटनाक्रम से ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं निकलता। उलटे, चर्चा का बड़ा हिस्सा प्रधानमंत्री के खिलाफ इस्तेमाल किए गए शब्दों पर केंद्रित हो गया।
कांग्रेस के सामने चुनौती दोहरी है। उसे एक तरफ मतदाता सूची से जुड़े अपने आरोपों को प्रमाणों के साथ आगे बढ़ाना है, दूसरी तरफ अपने अध्यक्ष के बयान पर उठे सवालों का जवाब देना है। यहां नेतृत्व का अनुभव भी महत्वपूर्ण हो जाता है। खड़गे लंबे राजनीतिक अनुभव वाले नेता हैं और कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में पार्टी का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनके शब्दों को केवल किसी स्थानीय कार्यकर्ता की प्रतिक्रिया की तरह नहीं देखा जाता। शीर्ष नेतृत्व का वक्तव्य पार्टी की छवि और उसके राजनीतिक संदेश का हिस्सा बन जाता है।
यह तर्क भी दिया जा सकता है कि भाषण के दौरान अचानक आई टिप्पणी पर प्रतिक्रिया आवेश में दी गई। लेकिन राजनीतिक मंच पर आवेश अपने आप में पर्याप्त बचाव नहीं है। नेता के शब्द सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनते हैं और विरोधी दल उन्हें अपने राजनीतिक तर्क में शामिल कर सकते हैं। कांग्रेस के लिए अधिक प्रभावी रास्ता यह होता कि वह एसआईआर पर अपने आरोपों को स्पष्ट करती, उदाहरण सामने रखती और भाजपा से तथ्यात्मक जवाब मांगती। इससे बहस उस मुद्दे पर रहती, जिसे वह जनता के सामने उठाना चाहती थी।
क्या यह कांग्रेस की सुनियोजित रणनीति है या नेतृत्व की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया?
हर विवादित बयान को पार्टी की सोची-समझी रणनीति मान लेना सही नहीं होगा। उपलब्ध घटनाक्रम के आधार पर यह कहना कठिन है कि खड़गे की टिप्पणी कांग्रेस की केंद्रीय रणनीति के तहत दी गई थी। इसे तत्काल प्रतिक्रिया या राजनीतिक आवेश का परिणाम भी माना जा सकता है। लेकिन राजनीतिक परिणामों का आकलन करते समय मंशा से अधिक महत्व प्रभाव का होता है। कोई नेता भले ही क्षणिक प्रतिक्रिया दे, मगर उसके बाद पार्टी को उसका राजनीतिक अर्थ समझाना पड़ता है। यदि एक ही पार्टी के नेताओं के विवादित बयान बार-बार सुर्खियों में आते हैं, तो विरोधियों को उन्हें एक बड़े पैटर्न के रूप में पेश करने का अवसर मिलता है। इसका अर्थ यह नहीं कि पार्टी का हर नेता एक जैसी भाषा बोलता है या हर टिप्पणी समान रूप से आपत्तिजनक है। लेकिन बार-बार पैदा होने वाले विवाद पार्टी की सार्वजनिक छवि पर असर डाल सकते हैं। कांग्रेस के लिए इसलिए जरूरी है कि वह अपने नेताओं के लिए स्पष्ट राजनीतिक अनुशासन और सार्वजनिक संवाद के मानक तय करे। इससे न केवल विवादों की संभावना कम होगी, बल्कि पार्टी अपनी आलोचना को अधिक प्रभावी ढंग से जनता तक पहुंचा सकेगी।
भाषा का सवाल: क्या राजनीतिक मर्यादा केवल विपक्ष की जिम्मेदारी है?
इस पूरे विवाद में भाजपा की भूमिका को भी उसी कसौटी पर परखना जरूरी है। यदि भाजपा कांग्रेस के बयान को अमर्यादित बताती है, तो उससे भी अपेक्षा है कि वह राजनीतिक बहस में समान मानक अपनाए। किसी भी दल के नेता की व्यक्तिगत अपमानजनक टिप्पणी को केवल इसलिए उचित नहीं माना जा सकता कि वह विपक्ष या सत्ता पक्ष की ओर से आई है। कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने राजनीतिक बयानबाजी में दोहरे मानदंडों को लेकर सवाल उठाए हैं। इस तरह की आपत्ति पर विचार किया जा सकता है। लेकिन दूसरे दल के किसी नेता की कथित गलती का उदाहरण देकर अपनी टिप्पणी को सही साबित नहीं किया जा सकता।
लोकतांत्रिक राजनीति में मर्यादा का अर्थ यह नहीं कि विपक्ष सरकार पर नरम रहे या प्रधानमंत्री से कठोर सवाल न पूछे। इसका अर्थ है कि आलोचना तथ्यों, नीतियों और फैसलों पर केंद्रित रहे। प्रधानमंत्री के कामकाज पर सवाल उठाना पूरी तरह वैध है। लेकिन व्यक्तिगत अपमान को राजनीतिक साहस का प्रमाण बताना लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर कर सकता है। इसी तरह भाजपा को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह भाषा के मुद्दे को उठाते समय अपने नेताओं के बयानों पर भी समान मानदंड लागू करे। राजनीतिक शालीनता की कसौटी दल के हिसाब से नहीं बदलनी चाहिए।
लोकतंत्र में तीखा विरोध और व्यक्तिगत अपमान के बीच अंतर
राजनीति में तीखी भाषा हमेशा अनुचित नहीं होती। किसी बड़े घोटाले के आरोप, प्रशासनिक विफलता, संवैधानिक संकट या जनहित से जुड़े गंभीर सवाल पर विपक्ष का कठोर रुख लोकतंत्र के लिए जरूरी हो सकता है। लेकिन कठोरता और अपमान में अंतर है। जब कोई नेता कहता है कि सरकार की नीति गलत है, उसका आर्थिक फैसला जनविरोधी है या उसका प्रशासनिक रिकॉर्ड कमजोर है, तो वह राजनीतिक तर्क प्रस्तुत कर रहा होता है। इसके विपरीत, जब बहस व्यक्ति की पारिवारिक पहचान, व्यक्तिगत गरिमा या अपमानजनक उपमाओं तक पहुंच जाती है, तो मुद्दे की जगह भावनात्मक टकराव ले सकता है।
ऐसी भाषा समर्थकों को कुछ समय के लिए उत्साहित कर सकती है। लेकिन व्यापक मतदाता वर्ग के लिए यह सवाल भी पैदा होता है कि नेता के पास अपने आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त तथ्य हैं या नहीं। लोकतंत्र की मजबूती इस बात से नहीं मापी जाती कि कौन कितना तीखा बोल सकता है, बल्कि इससे कि कौन अपने तर्क को कितनी मजबूती से प्रस्तुत कर सकता है।
आगे कांग्रेस के सामने क्या रास्ता है?
पटना की टिप्पणी के बाद कांग्रेस के सामने सबसे उपयोगी रास्ता तीन कदमों में दिखाई देता है। पहला, बयान के संदर्भ पर स्पष्ट रुख अपनाना और जरूरत पड़ने पर शब्दों को लेकर खेद या स्पष्टीकरण देना। इससे पार्टी अपने मूल राजनीतिक मुद्दे से अलग हुए बिना विवाद को सीमित कर सकती है। दूसरा, एसआईआर से जुड़े आरोपों को प्रमाणों के साथ सामने रखना। यदि मतदाता सूची में अनियमितताओं का दावा है, तो प्रभावित मतदाताओं की संख्या, दस्तावेज और संबंधित निर्वाचन अधिकारियों के जवाब जैसे तथ्य बहस का आधार बनने चाहिए। तीसरा, राजनीतिक संवाद की ऐसी शैली विकसित करना जिसमें सरकार पर कठोर सवाल उठाए जाएं, लेकिन व्यक्तिगत टिप्पणियों को राजनीतिक संदेश पर हावी न होने दिया जाए। भाजपा के लिए भी चुनौती यही है कि वह केवल विवादित शब्दों पर राजनीतिक प्रतिक्रिया देने तक सीमित न रहे, बल्कि एसआईआर और दूसरे जनहित के सवालों पर उठाए गए आरोपों का तथ्यात्मक जवाब दे। यही लोकतांत्रिक जवाबदेही की कसौटी है।
शब्दों की लड़ाई में मुद्दे न हार जाएं
मल्लिकार्जुन खड़गे की पटना में की गई टिप्पणी ने एक बार फिर भारतीय राजनीति की उस समस्या को उजागर किया है, जिसमें नेताओं की एक पंक्ति कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर भारी पड़ जाती है। कांग्रेस जिस मतदाता सूची की निष्पक्षता का सवाल उठा रही थी, उस पर बहस पीछे चली गई और प्रधानमंत्री के लिए इस्तेमाल किए गए शब्द केंद्र में आ गए। भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने का अवसर मिला, जबकि कांग्रेस को अपने मूल आरोपों के साथ-साथ अपने अध्यक्ष के बयान का भी बचाव करना पड़ रहा है। लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा नुकसान लोकतांत्रिक बहस को है, क्योंकि जनता के मुद्दों पर तथ्यपूर्ण चर्चा की जगह व्यक्तिगत टिप्पणियां लेने लगती हैं। राजनीति में बयान देना आसान है, लेकिन उसके परिणामों को संभालना कठिन। वरिष्ठ नेताओं के लिए यह जिम्मेदारी और भी बड़ी है। विरोध की आवाज जितनी मजबूत होगी, उसके तर्क उतने ही ठोस होने चाहिए। व्यक्तिगत कटाक्ष से क्षणिक सुर्खियां मिल सकती हैं, लेकिन दीर्घकालिक राजनीतिक विश्वसनीयता तथ्यों, संयम और स्पष्ट दृष्टिकोण से बनती है। अंतिम सवाल यही है: क्या कांग्रेस अपने मुद्दों के दम पर भाजपा को चुनौती देगी, या उसके नेताओं के विवादित बयान भाजपा को बार-बार सियासी बढ़त बनाने का अवसर देते रहेंगे? लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, तीखा विरोध भी जरूरी है। लेकिन जब शब्द मुद्दों पर हावी हो जाएं, तब सबसे बड़ा सवाल यही बनता है कि राजनीति जनता के लिए हो रही है या सुर्खियों के लिए।