केरल में चुनावी सफलता और कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन के बाद कांग्रेस अब अपने अगले राजनीतिक लक्ष्य की ओर बढ़ रही है। पार्टी की निगाहें उत्तर प्रदेश और पंजाब ब पर नजरें टिक गई हैं। पंजाब में आने वाले समय में विधानसभा के चुनाव होना हैं। जिसमें कांग्रेस के भविष्य की दिशा तय हो सकती है। हालांकि इन दोनों ही राज्यों में कांग्रेस के लिए चुनौतियां अलग-अलग तरह की हैं। लेकिन माना जा रहा है कि कठिनाई का स्तर लगभग समासमान है। पंजाब में पार्टी को अपने नेताओं और गुटों को एकजुट रखने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, जबकि उत्तर प्रदेश में उसे अपने राजनीतिक अस्तित्व को मजबूत करने की लड़ाई लड़नी है।
केरल की जीत और कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन के बाद अब पंजाब-यूपी पर फोकस, 2027 के चुनावों से पहले संगठन और रणनीति की बड़ी परीक्षा
- पंजाब में अंतर्कलह कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी
- यूपी में संगठन की कमी और गठबंधन की उलझन बढ़ा रही चिंता
- राहुल गांधी और खड़गे की रणनीति पर टिकी भविष्य की राजनीति
- AAP, बीजेपी और क्षेत्रीय दलों के बीच कांग्रेस के लिए कठिन मुकाबला
- 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी के लिए निर्णायक दौर
कांग्रेस नेतृत्व आगामी चुनावों को देखते हुए बड़े संगठनात्मक बदलाव की तैयारी में जुटा है। कई राज्यों में प्रदेश अध्यक्षों के परिवर्तन की चर्चाएं तेज हैं और इसी क्रम में पंजाब तथा उत्तर प्रदेश को लेकर भी गंभीर मंथन चल रहा है। पार्टी जानती है कि यदि इन दोनों राज्यों में मजबूत प्रदर्शन नहीं हुआ तो राष्ट्रीय राजनीति में उसकी स्थिति कमजोर पड़ सकती है।
पंजाब की बात करें तो कभी यह कांग्रेस का मजबूत गढ़ हुआ करता था। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की प्रचंड जीत ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सात सीटें जीतकर वापसी के संकेत दिए थे। माना जा रहा था कि राज्य में कांग्रेस फिर से मजबूत विकल्प बन सकती है, लेकिन हाल ही में हुए नगर निकाय चुनावों ने पार्टी की कमजोरियों को एक बार फिर उजागर कर दिया।
पंजाब कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या विपक्षी दल नहीं बल्कि उसकी आंतरिक गुटबाजी मानी जा रही है। प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, प्रताप सिंह बाजवा और सुखपाल खैरा जैसे नेताओं के बीच नेतृत्व और प्रभाव की प्रतिस्पर्धा लगातार सामने आती रही है। यही कारण है कि पार्टी एकजुट होकर आम आदमी पार्टी के खिलाफ मजबूत राजनीतिक माहौल नहीं बना पा रही है।
निकाय चुनावों में भी यह तस्वीर साफ दिखाई दी। जहां राजा वडिंग के प्रभाव वाले क्षेत्रों में कांग्रेस को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, वहीं चन्नी समर्थक क्षेत्रों में पार्टी का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा। इससे प्रदेश नेतृत्व को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। कांग्रेस हाईकमान नहीं चाहता कि चुनाव से पहले यह अंतर्कलह और बढ़े, इसलिए संगठनात्मक बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
पंजाब में कांग्रेस के लिए अवसर भी कम नहीं हैं। राज्य में सत्ता विरोधी भावना विकसित होने की संभावना है और आम आदमी पार्टी को कानून व्यवस्था, नशे की समस्या तथा चुनावी वादों को लेकर लगातार विपक्ष के निशाने का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन यदि कांग्रेस अपनी गुटबाजी पर नियंत्रण नहीं कर पाती तो यह राजनीतिक अवसर उसके हाथ से निकल सकता है। अकाली दल अपनी जमीन वापस पाने की कोशिश में है, जबकि बीजेपी भी शहरी क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी है। ऐसे में वोटों का बिखराव कांग्रेस के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर सकता है।
दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति बिल्कुल अलग है। यहां पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने संगठन को खड़ा करने और राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की है। 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन ने कांग्रेस को नई ऊर्जा दी थी। गठबंधन ने राज्य में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया और कांग्रेस छह सीटें जीतने में सफल रही। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह लौटा, लेकिन अब विधानसभा चुनाव की तैयारी के लिए मजबूत संगठन की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस का पूर्ण संगठनात्मक ढांचा अब तक तैयार नहीं हो पाया है। कई जिलों में संगठन निष्क्रिय माना जाता है और बूथ स्तर पर पार्टी की पकड़ बेहद कमजोर है। विधानसभा चुनाव नजदीक आने के बावजूद प्रदेश कार्यकारिणी के गठन में देरी पार्टी के भीतर चिंता का विषय बनी हुई है।
इसके साथ ही समाजवादी पार्टी के साथ सीट बंटवारे का मुद्दा भी कांग्रेस के लिए चुनौती बन सकता है। सपा नेतृत्व स्पष्ट कर चुका है कि सीटों का निर्धारण जीत की संभावनाओं के आधार पर होगा। वहीं कांग्रेस के कई नेता अधिक सीटों की मांग कर रहे हैं। ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि गठबंधन के भीतर सीटों को लेकर मतभेद उभर सकते हैं। यदि यह विवाद बढ़ता है तो विपक्षी एकता को नुकसान पहुंच सकता है।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को केवल गठबंधन पर निर्भर रहने के बजाय अपने सामाजिक आधार को भी मजबूत करना होगा। पार्टी को ब्राह्मण, दलित, अति पिछड़े और युवा मतदाताओं के बीच नई पैठ बनाने की जरूरत है। बिना मजबूत जमीनी संगठन के बीजेपी जैसी विशाल चुनावी मशीनरी का मुकाबला करना आसान नहीं होगा।
उधर बीजेपी भी पूरी ताकत के साथ चुनावी तैयारियों में जुटी हुई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जोड़ी लगातार राजनीतिक रूप से प्रभावी बनी हुई है। संगठन विस्तार, सामाजिक समीकरणों और हिंदुत्व के मुद्दे के जरिए बीजेपी अपनी स्थिति और मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
ऐसे में कांग्रेस के लिए पंजाब और उत्तर प्रदेश दोनों ही राज्य अग्निपरीक्षा साबित होने वाले हैं। पंजाब में उसे अपने नेताओं को एक मंच पर लाना होगा, जबकि उत्तर प्रदेश में संगठन को पुनर्जीवित कर गठबंधन की राजनीति को संतुलित रखना होगा। 2027 के चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं होंगे, बल्कि कांग्रेस के राजनीतिक भविष्य और राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं की दिशा भी तय करेंगे। आने वाले महीनों में पार्टी जो फैसले लेगी, वही उसके भविष्य की राजनीतिक तस्वीर का आधार बनेंगे।





