लखनऊ के अलीगंज में 22 जून 2026 को हुई भीषण आग की घटना ने एक बार फिर देश को झकझोर दिया। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे कई युवा छात्र-छात्राओं की जान चली गई, जबकि अनेक गंभीर रूप से घायल हुए। यह हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि हमारे कोचिंग संस्थानों में व्याप्त सुरक्षा संबंधी लापरवाही की एक भयावह तस्वीर है।
यह घटना हमें पिछले वर्ष दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर की उस त्रासदी की याद दिलाती है, जहाँ एक प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थान के बेसमेंट में बारिश का पानी भर जाने से तीन UPSC अभ्यर्थियों की मौत हो गई थी। पढ़ाई का स्थान देखते ही देखते मौत के फंदे में बदल गया था।
दोनों घटनाओं में एक समानता साफ दिखाई देती है—छात्रों की सुरक्षा को लेकर गंभीर लापरवाही। देशभर में हजारों कोचिंग सेंटर ऐसे भवनों में संचालित हो रहे हैं जो बड़ी संख्या में छात्रों के लिए बनाए ही नहीं गए। कहीं संकरे रास्ते हैं, कहीं पर्याप्त आपातकालीन निकास नहीं हैं, तो कहीं बेसमेंट और ऊपरी मंजिलों का उपयोग नियमों के विपरीत किया जा रहा है।
दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि अधिकांश संस्थान अपने परिणामों और विज्ञापनों पर तो करोड़ों रुपये खर्च करते हैं, लेकिन सुरक्षा मानकों को अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। अभिभावक और छात्र भी अच्छे शिक्षकों और चयन दर को प्राथमिकता देते हैं, जबकि भवन की सुरक्षा, अग्निशमन व्यवस्था और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
लखनऊ और दिल्ली की घटनाएँ केवल प्रशासन की विफलता नहीं हैं, बल्कि पूरे तंत्र के लिए एक चेतावनी हैं। अब समय आ गया है कि सभी कोचिंग संस्थानों का नियमित सुरक्षा ऑडिट हो, अग्निशमन नियमों का कड़ाई से पालन कराया जाए, आपातकालीन निकास सुनिश्चित किए जाएँ और समय-समय पर सुरक्षा अभ्यास (मॉक ड्रिल) आयोजित किए जाएँ।
शिक्षा का मंदिर कभी भी मौत का जाल नहीं बनना चाहिए। विद्यार्थी अपने सपनों को पूरा करने के लिए कोचिंग संस्थानों में जाते हैं, अपनी जान जोखिम में डालने के लिए नहीं। यदि अब भी सबक नहीं लिया गया, तो ऐसी त्रासदियाँ भविष्य में फिर दोहराई जा सकती हैं। आखिरकार, किसी भी परीक्षा की सफलता से अधिक महत्वपूर्ण एक विद्यार्थी का जीवन है।





