चीन के हेनान प्रांत के एक खेत में गेहूं की कटाई हो रही है। सुनहरी फसल के बीच हार्वेस्टर आगे बढ़
रहा है, लेकिन उसकी चालक सीट खाली है। उसके ऊपर निगरानी करता ड्रोन उड़ रहा है। खेत में लगे
उपकरण मिट्टी और फसल से जुड़ी सूचनाएं जुटा रहे हैं, सिंचाई व्यवस्था जरूरत के अनुसार पानी
पहुंचा रही है और चालक रहित कृषि मशीनों को सटीक रास्ता दिखाने में चीन की अपनी BeiDou
उपग्रह नौवहन प्रणाली मदद कर रही है। कुछ वर्ष पहले तक ऐसा दृश्य भविष्य की खेती की कल्पना
जैसा लग सकता था, लेकिन चीन में कृषि आधुनिकीकरण अब इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है। ड्रोन,
उपग्रह नौवहन, सेंसर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और चालक रहित मशीनों को एक-दूसरे से जोड़कर चीन
खेती का ऐसा नया मॉडल विकसित कर रहा है, जिसका उद्देश्य सीमित भूमि और जल संसाधनों का
अधिक कुशल इस्तेमाल, किसानों की मेहनत और लागत में कमी तथा खाद्य उत्पादन को अधिक
आधुनिक, सटीक और टिकाऊ बनाना है।
इस परिवर्तन के पैमाने का अंदाजा चीन के कृषि एवं ग्रामीण मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों से
लगाया जा सकता है। 2025 में चीन में इस्तेमाल हो रहे कृषि ड्रोन की संख्या तीन लाख से अधिक हो
गई और उनका वार्षिक कार्यक्षेत्र 46 करोड़ मू, यानी करीब 3.07 करोड़ हेक्टेयर, को पार कर गया।
फसलों की जुताई, बुआई और कटाई की समग्र मशीनीकरण दर बढ़कर 76.7 प्रतिशत पहुंच गई,
जबकि कृषि उत्पादन में वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का योगदान 64 प्रतिशत से अधिक हो
गया। ये आंकड़े बताते हैं कि चीन में स्मार्ट खेती अब केवल कुछ प्रदर्शन खेतों या अनुसंधान केंद्रों
तक सीमित प्रयोग नहीं है। कृषि मशीनरी, ड्रोन, डिजिटल खेती और वैज्ञानिक अनुसंधान वास्तविक
उत्पादन व्यवस्था का हिस्सा बनते जा रहे हैं। चीन की कृषि तकनीकी यात्रा इसलिए किसी एक
आकर्षक ड्रोन या चालक रहित ट्रैक्टर की कहानी नहीं है; इसके पीछे बीज, कृषि मशीनरी, सिंचाई,
वैज्ञानिक अनुसंधान, डिजिटल तकनीक और खेत के बुनियादी ढांचे को एक साथ आधुनिक बनाने
का व्यापक प्रयास है।
इस तकनीकी परिवर्तन के समानांतर चीन का खाद्य उत्पादन भी ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंचा है।
चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार 2025 में देश का कुल अनाज उत्पादन 71.488 करोड़
टन रहा, जो पिछले वर्ष से 83.8 लाख टन अधिक था और लगातार दूसरे वर्ष 70 करोड़ टन से ऊपर
रहा। कुल उत्पादन में सालाना 1.2 प्रतिशत वृद्धि हुई, जबकि प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन 1.1
प्रतिशत बढ़कर 5,987 किलोग्राम पहुंच गया। मक्का उत्पादन करीब 30.124 करोड़ टन, चावल
20.904 करोड़ टन और गेहूं 14.007 करोड़ टन रहा। इन उपलब्धियों को केवल स्मार्ट खेती का
परिणाम नहीं कहा जा सकता मौसम, सिंचाई, कृषि क्षेत्र, बीज और दूसरी परिस्थितियां भी उत्पादन
को प्रभावित करती हैं लेकिन यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि जिस समय चीन विज्ञान और तकनीक को
खेत तक पहुंचाने की गति बढ़ा रहा है, उसी समय उसका अनाज उत्पादन भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा
है।
चीन की स्मार्ट कृषि का सबसे दिखाई देने वाला चेहरा शायद ड्रोन हैं। तीन लाख से अधिक कृषि ड्रोन
और सालाना 46 करोड़ मू से अधिक कार्यक्षेत्र बताते हैं कि ये उपकरण प्रयोगशाला से निकलकर
व्यावहारिक कृषि का हिस्सा बन चुके हैं। उनका इस्तेमाल फसल की निगरानी, कीटनाशक और
उर्वरक के छिड़काव तथा दूसरे कृषि कार्यों में किया जा रहा है। लेकिन ड्रोन की असली क्षमता केवल
तेजी से खेत के ऊपर उड़ने में नहीं है। जब उसे खेत के डिजिटल नक्शे, फसल की तस्वीरों और दूसरे
आंकड़ों के साथ जोड़ा जाता है, तब पूरे खेत को एक जैसी इकाई मानने के बजाय अलग-अलग हिस्सों
की वास्तविक जरूरत के अनुसार कृषि प्रबंधन करना संभव होता है। यही सटीक कृषि की बुनियाद है
पानी, उर्वरक और दूसरे संसाधनों का इस्तेमाल अनुमान के बजाय आंकड़ों के आधार पर अधिक
लक्षित तरीके से करना। इससे लागत कम करने के साथ पानी और रसायनों के अनावश्यक
इस्तेमाल को भी घटाने की संभावना बनती है।
इस व्यवस्था की दूसरी बड़ी विशेषता यह है कि चीन ने अपनी अंतरिक्ष तकनीक को खेत से जोड़
दिया है। BeiDou को दुनिया चीन की उपग्रह नौवहन प्रणाली के रूप में जानती है, लेकिन उसका
उपयोग कृषि मशीनों के सटीक संचालन में भी किया जा रहा है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता इस परिवर्तन को एक कदम और आगे ले जाती है। पारंपरिक मशीनीकरण का
मुख्य उद्देश्य मनुष्य की शारीरिक क्षमता बढ़ाना था ट्रैक्टर ने हल खींचने की ताकत बढ़ाई और
हार्वेस्टर ने कटाई की गति। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उद्देश्य केवल मशीन को अधिक शक्तिशाली
बनाना नहीं, बल्कि किसान की निर्णय लेने की क्षमता को भी बेहतर करना है।
चीन में इस तकनीकी परिवर्तन को समझने के लिए राष्ट्रपति शी चिनफिंग की खाद्य सुरक्षा संबंधी
सोच विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। मार्च 2022 में कृषि और खाद्य सुरक्षा पर चर्चा करते हुए शी
चिनफिंग ने रेखांकित किया था कि चीन दुनिया की लगभग पांचवें हिस्से की आबादी को दुनिया की
करीब 9 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि और लगभग 6 प्रतिशत मीठे पानी के संसाधनों के सहारे भोजन
उपलब्ध करा रहा है। उन्होंने चीन के लोगों के “चावल के कटोरे” को मुख्य रूप से चीनी अनाज से
भरने पर जोर दिया और खाद्य सुरक्षा की दीर्घकालिक गारंटी के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी की
भूमिका को केंद्रीय बताया। इस दृष्टि से स्मार्ट कृषि केवल आधुनिक मशीनों के प्रदर्शन की
परियोजना नहीं है। विशाल आबादी वाले देश के लिए सीमित कृषि संसाधनों से पर्याप्त और स्थिर
उत्पादन सुनिश्चित करना रणनीतिक आवश्यकता है। इसीलिए बीज से लेकर सिंचाई, मशीनरी से
लेकर उपग्रह और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक, विज्ञान और प्रौद्योगिकी को चीन की खाद्य सुरक्षा की
व्यापक रणनीति से जोड़ा जा रहा है।
इस रणनीति का दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ उन्नत मानक वाली कृषि भूमि का निर्माण है। ड्रोन और
चालक रहित ट्रैक्टर तभी अपनी पूरी क्षमता दिखा सकते हैं जब खेतों में सिंचाई, सड़क, मिट्टी की
गुणवत्ता और दूसरी बुनियादी सुविधाएं मजबूत हों।
अब चीन ने अगले चरण के लिए स्पष्ट लक्ष्य भी तय किए हैं। 2026-2030 की कृषि एवं ग्रामीण
आधुनिकीकरण योजना के अनुसार 2030 तक कृषि विकास में वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के
योगदान को 67 प्रतिशत तक पहुंचाने और फसलों की जुताई, बुआई तथा कटाई की समग्र
मशीनीकरण दर को 80 प्रतिशत से ऊपर ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। इसका अर्थ है कि मौजूदा
64 प्रतिशत से अधिक वैज्ञानिक-तकनीकी योगदान और 76.7 प्रतिशत मशीनीकरण को चीन
अंतिम उपलब्धि नहीं मान रहा। कृषि को कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल तकनीक, नई मशीनरी और
वैज्ञानिक अनुसंधान से और गहराई से जोड़ना आने वाले वर्षों की दिशा है। यदि ये लक्ष्य हासिल होते
हैं तो चीन की कृषि व्यवस्था में तकनीक की भूमिका केवल सहायक उपकरण की नहीं, बल्कि
उत्पादन की केंद्रीय शक्ति की होती जाएगी।
इस परिवर्तन की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक आधुनिक तकनीक को छोटे किसानों तक
पहुंचाना है। तीन लाख ड्रोन का अर्थ यह नहीं कि हर किसान के पास अपना ड्रोन है और न ही प्रत्येक
छोटे किसान के लिए चालक रहित ट्रैक्टर, सेंसर या कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणाली खरीदना व्यावहारिक
होगा। यहां कृषि सेवा और सहकारी मॉडल महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
स्वचालन के साथ रोजगार का प्रश्न भी स्वाभाविक है, लेकिन इसे केवल “मशीन बनाम किसान” के
रूप में देखना अधूरा होगा। कृषि मशीनीकरण का एक उद्देश्य कठिन और दोहराव वाले शारीरिक
श्रम को कम करना भी है। स्मार्ट कृषि में किसान की भूमिका समाप्त होने के बजाय बदल सकती है।
वह केवल ट्रैक्टर चलाने वाला व्यक्ति न रहकर कई मशीनों, फसल संबंधी आंकड़ों और डिजिटल
प्रणालियों का प्रबंधक बन सकता है।
चीन का यह प्रयोग दुनिया के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जलवायु परिवर्तन, पानी की कमी, कृषि
श्रमिकों की उपलब्धता और खाद्य सुरक्षा किसी एक देश की समस्या नहीं हैं। लेकिन चीन के
अनुभव की बड़ी सीख किसी एक मशीन में नहीं, बल्कि अलग-अलग तकनीकों को जोड़ने में है
उपग्रह, ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, चालक रहित मशीनें, बेहतर कृषि भूमि और अंततः किसान। जब ये
सभी एक-दूसरे से संवाद करने वाली व्यवस्था का हिस्सा बनते हैं, तभी खेती की उत्पादकता, लागत
और संसाधन दक्षता को बड़े स्तर पर बदलने की संभावना पैदा होती है।
2025 का रिकॉर्ड 71.488 करोड़ टन अनाज उत्पादन, एक अरब मू से अधिक उन्नत मानक वाली
कृषि भूमि, 76.7 प्रतिशत मशीनीकरण, कृषि वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति का 64 प्रतिशत से
अधिक योगदान और तीन लाख से अधिक कृषि ड्रोन ये एक-दूसरे से अलग उपलब्धियां नहीं हैं। इन्हें
साथ रखकर देखने पर चीन के कृषि आधुनिकीकरण की बड़ी तस्वीर सामने आती है। चीन एक ओर
अपनी कृषि भूमि और सिंचाई का आधार मजबूत कर रहा है, दूसरी ओर विज्ञान और कृषि अनुसंधान
को बढ़ावा दे रहा है और तीसरी ओर ड्रोन, BeiDou, कृत्रिम बुद्धिमत्ता तथा स्वचालित मशीनों को
वास्तविक खेतों तक पहुंचा रहा है। 2030 तक वैज्ञानिक-तकनीकी योगदान को 67 प्रतिशत और
मशीनीकरण को 80 प्रतिशत से ऊपर ले जाने का लक्ष्य बताता है कि यह यात्रा अभी अपने अगले
चरण में प्रवेश कर रही है।
बीसवीं सदी की कृषि क्रांति का सबसे पहचानने योग्य प्रतीक शायद ट्रैक्टर था। इक्कीसवीं सदी की
कृषि क्रांति का कोई एक प्रतीक होना जरूरी नहीं। उसका चेहरा एक पूरी जुड़ी हुई व्यवस्था हो सकती
है आसमान में ड्रोन, अंतरिक्ष में BeiDou उपग्रह, खेत में चालक रहित ट्रैक्टर और हार्वेस्टर, जमीन
से आते आंकड़े और इन सबके केंद्र में निर्णय लेता किसान। राष्ट्रपति शी चिनफिंग जिस “चीनी
चावल के कटोरे” को मुख्य रूप से चीन के अपने अनाज से भरने की बात करते हैं, उसके लिए चीन
केवल अधिक श्रम या अधिक संसाधनों पर निर्भर रहने के बजाय विज्ञान और प्रौद्योगिकी को कृषि
की नई उत्पादक शक्ति में बदलने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
(साभार—चाइना मीडिया ग्रुप ,पेइचिंग) (लेखक: नीरज बाली)