अमेरिकी पत्रिका ‘फॉरेन पॉलिसी’ के एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस
(एआई) के इस्तेमाल के मामले में चीन अमेरिका से आगे निकल सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि
चीन की सहयोग पर आधारित एआई विकास रणनीति दूसरे देशों का ध्यान आकर्षित कर रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और चीन की एआई कूटनीति में बड़ा अंतर है। अमेरिका रणनीतिक
प्रतिस्पर्धा और अपने बाजार के वर्चस्व को प्राथमिकता देता है। इसके तहत वह उन्नत चिप, क्लाउड
सेवाओं, एआई मॉडल, कंप्यूटिंग क्षमता और एप्लिकेशन को एक संपूर्ण ‘फुल-स्टैक’ एआई पैकेज के
रूप में चुनिंदा देशों को उपलब्ध कराता है।
इसके विपरीत, चीन व्यापक एआई सहयोग को विकास की प्राथमिकता मानता है। उसका जोर ऐसे
एआई मॉडल उपलब्ध कराने पर है, जिनका स्थानीय स्तर पर स्वामित्व और संचालन किया जा सके
तथा जो स्थानीय जरूरतों के अनुरूप हों। इसके साथ ही, चीन प्रशिक्षण, तकनीकी क्षमता बढ़ाने, नए
बहुपक्षीय एआई संस्थान स्थापित करने और स्थानीय स्तर पर एआई के इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर
भी ध्यान दे रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका की साझेदारी का मुख्य उद्देश्य एआई की प्रतिस्पर्धा में चीन पर
निर्णायक बढ़त हासिल करना है। वहीं, चीन की रणनीति में विभिन्न देशों को साथ लेकर चलने और
एआई के लाभों को अधिक न्यायसंगत तरीके से उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है। खास तौर पर
निम्न और मध्यम आय वाले देशों को एआई तकनीक का लाभ पहुंचाना चीन की इस रणनीति का
अहम हिस्सा है।
इसी दिशा में, रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल जुलाई में 29 देशों के प्रतिनिधियों ने विश्व एआई सहयोग
संगठन (WAICO) की स्थापना से जुड़े समझौते पर हस्ताक्षर किए। चीन ने अगले पांच वर्षों में
विकासशील देशों के लिए एआई प्रशिक्षण के 5,000 अवसर उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता जताई है।
इसके अलावा, उसने आसियान, अरब लीग, अफ्रीकी संघ, सीईएलएसी, एससीओ और ब्रिक्स के लिए
अंतरराष्ट्रीय एआई अनुप्रयोग सहयोग केंद्र स्थापित करने की भी योजना बनाई है।
दूसरी ओर, अमेरिका ने ‘पैक्स सिलिका’ कार्यक्रम के जरिए अपना बहुपक्षीय एआई सहयोग प्रस्ताव
पेश किया है। हालांकि, रिपोर्ट का मानना है कि अमेरिकी योजना एआई इकोसिस्टम के कुछ जरूरी
हिस्से तो उपलब्ध कराती है, लेकिन चीन की तरह व्यापक स्तर पर सहयोग और सॉफ्ट पावर को
बढ़ावा नहीं देती। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने एआई के वैश्विक शासन और सहयोग के लिए एक
स्वतंत्र बहुपक्षीय संस्थान स्थापित करने के प्रस्तावों को भी स्पष्ट रूप से खारिज किया है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अमेरिका ‘पैक्स सिलिका’ में शामिल देशों के सामने एक तरह से ‘या
तो यह या वह’ का विकल्प रखता है। इसके उलट, चीन इस बात की वकालत करता है कि हर देश को
अपनी विकास संबंधी जरूरतों के आधार पर एआई साझेदार चुनने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
रिपोर्ट के मुताबिक, चीन का यह रुख उन देशों की अपेक्षाओं के अधिक अनुकूल है, जो अपनी जरूरतों
के हिसाब से तकनीक अपनाना चाहते हैं।
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि विभिन्न देशों को ऐसे सहयोग की जरूरत है, जो उनकी मौजूदा व्यवस्था और
स्थानीय जरूरतों के अनुकूल हो। साथ ही, उन्हें अपनी परिस्थितियों के अनुसार एआई अपनाने की
पर्याप्त स्वतंत्रता भी मिलनी चाहिए। एआई क्रांति में वही देश आगे रह सकता है, जो अपने साझेदार
देशों को सबसे प्रभावी सहयोग और समर्थन दे सके। इसके लिए बुनियादी ढांचे, एआई मॉडल,
एप्लिकेशन, वित्तपोषण, प्रशिक्षण और तकनीकी मानकों को एक व्यापक योजना के तहत जोड़ना
जरूरी होगा। इससे दूसरे देश एआई का अधिक प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर सकेंगे और अपनी
जरूरतों के अनुसार अलग-अलग तकनीकी प्रणालियों को स्वतंत्र रूप से जोड़ने की सुविधा भी बनाए
रख सकेंगे।
(साभार- चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)





