आज के समय में बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन और दूसरी डिजिटल डिवाइस आम हो गई हैं। इसका असर उनकी पढ़ाई, नींद, व्यवहार और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता पर भी दिखाई दे सकता है। इसी मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षकों से बच्चों के ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल पर ध्यान देने और देर रात तक फोन चलाने की आदत को लेकर अभिभावकों से बात करने की अपील की है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने की जिम्मेदारी किसकी होनी चाहिए?
स्कूल में बच्चों के व्यवहार से बदलाव पहचान सकते हैं शिक्षक
शिक्षक बच्चों के साथ रोजाना कई घंटे बिताते हैं। इसलिए वे उनके व्यवहार में आने वाले बदलाव को जल्दी पहचान सकते हैं। अगर कोई बच्चा अचानक थका हुआ दिखाई दे, पढ़ाई में ध्यान न लगाए या दोस्तों से दूरी बनाने लगे तो इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। देर रात तक फोन चलाना भी उनमें से एक हो सकता है।
हालांकि शिक्षकों की भूमिका बच्चे की जासूसी करना नहीं, बल्कि समस्या को समझना और जरूरत पड़ने पर परिवार से बातचीत करना होना चाहिए।
बच्चों को फोन से दूर करने के बजाय डिजिटल दुनिया समझाना जरूरी
बच्चों से सिर्फ फोन छीन लेना समाधान नहीं है। उन्हें यह समझाना भी जरूरी है कि सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेम और शॉर्ट वीडियो किस तरह उनका ध्यान लंबे समय तक अपनी ओर खींचते हैं।
स्कूलों में बच्चों को फर्जी खबर, डीपफेक, ऑनलाइन ठगी, साइबर बुलिंग और डिजिटल फुटप्रिंट जैसी चीजों के बारे में भी जागरूक किया जाना चाहिए। तकनीक का इस्तेमाल कैसे करें, इसके साथ यह समझना भी जरूरी है कि उसका इस्तेमाल कब रोकना चाहिए।
हर स्क्रीन टाइम एक जैसा नहीं, इस्तेमाल का मकसद भी देखना होगा
पढ़ाई के लिए लैपटॉप इस्तेमाल करना और लगातार सोशल मीडिया स्क्रॉल करना एक जैसी गतिविधियां नहीं हैं। इसलिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि बच्चा कितने घंटे स्क्रीन पर रहा।
यह भी देखना जरूरी है कि स्क्रीन के कारण उसकी नींद, खेल, परिवार के साथ समय, पढ़ाई और दूसरे शौक तो प्रभावित नहीं हो रहे। स्कूलों को भी सोचना चाहिए कि हर असाइनमेंट के लिए डिजिटल माध्यम जरूरी है या कुछ काम कागज पर भी किए जा सकते हैं।
घर में स्क्रीन टाइम को लेकर नियम बनाना माता-पिता की जिम्मेदारी
बच्चे फोन का सबसे ज्यादा इस्तेमाल घर पर करते हैं। इसलिए माता-पिता की भूमिका सबसे अहम है। रात में फोन बेडरूम से बाहर रखना, खाना खाते समय फोन से दूरी बनाना और पढ़ाई के दौरान नोटिफिकेशन बंद रखना जैसे नियम मददगार हो सकते हैं।
लेकिन बच्चों से नियम मनवाने से पहले बड़ों को खुद उदाहरण पेश करना होगा। अगर माता-पिता हर समय फोन में व्यस्त रहेंगे तो बच्चों से अलग व्यवहार की उम्मीद करना मुश्किल होगा।
टेक कंपनियों और सरकार की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए
बच्चों का स्क्रीन टाइम केवल परिवार और स्कूल की समस्या नहीं है। कई डिजिटल प्लेटफॉर्म ऐसे फीचर इस्तेमाल करते हैं जो यूजर को ज्यादा देर तक जोड़े रखते हैं। ऑटो-प्ले, लगातार नोटिफिकेशन और अंतहीन वीडियो फीड बच्चों के लिए खास तौर पर चुनौती बन सकते हैं।
ऐसे में कंपनियों को बेहतर पैरेंटल कंट्रोल, उम्र की जांच और सुरक्षित डिफॉल्ट सेटिंग जैसी सुविधाएं देनी चाहिए। सरकार, स्कूल, अभिभावक और टेक कंपनियां मिलकर काम करें, तभी बच्चों के डिजिटल इस्तेमाल को बेहतर दिशा दी जा सकती है।
आखिरकार शिक्षकों को बच्चों के स्क्रीन टाइम के लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। उनकी भूमिका बच्चों में बदलाव पहचानने, उन्हें समझाने और डिजिटल समझ विकसित करने तक होनी चाहिए। जिम्मेदारी साझा होगी, तभी समाधान भी प्रभावी होगा।





