मध्यप्रदेश में सार्वजनिक परिवहन को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सरकार ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिसका असर सिर्फ बसों की संख्या बढ़ने तक सीमित नहीं रहेगा। 25 सितंबर से शुरू होने जा रही मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा प्रदेश में यात्री परिवहन की पूरी तस्वीर बदलने की कोशिश है। इस पहल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि सरकार ने इसे महज नई बस सेवा के रूप में नहीं, बल्कि पीपीपी मॉडल, आधुनिक तकनीक, डिजिटल निगरानी, ई-बसों और बेहतर अधोसंरचना से जोड़कर एक व्यापक परिवहन व्यवस्था के रूप में तैयार किया है।
25 सितंबर… प्रदेश की अपनी बस सेवा
मध्यप्रदेश में लंबे समय से राज्य परिवहन की नियमित बस व्यवस्था का अभाव महसूस किया जाता रहा है। ऐसे में 25 सितंबर का दिन एक तरह से सार्वजनिक परिवहन के नए अध्याय की शुरुआत बन सकता है। सरकार का लक्ष्य है कि 2030 के अंत तक प्रदेश के 75 प्रतिशत गांवों तक बस सेवा की पहुंच बनाई जाए। यानी बस सेवा का फोकस केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण मध्यप्रदेश को भी मजबूत कनेक्टिविटी से जोड़ने की कोशिश होगी। प्रदेश में करीब 5 लाख किलोमीटर का सड़क नेटवर्क और 15 हजार से ज्यादा बसों की संभावित जरूरत को सरकार एक बड़े अवसर के तौर पर देख रही है। खासकर उन इलाकों के लिए जहां निजी परिवहन सीमित है या नियमित बस सेवा उपलब्ध नहीं है।
गांव से शहर..जिला से दूसरे राज्य तक कनेक्टिविटी
मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा का सबसे बड़ा असर ग्रामीण और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी पर पड़ सकता है। 55 जिलों में रूट सर्वे के बाद डेटा आधारित लगभग 150 सिटी, 450 इंटरसिटी और 436 अंतरराज्यीय मार्ग विकसित करने की योजना सामने आई है। इसका मतलब है कि आने वाले समय में परिवहन व्यवस्था को मांग और यात्री जरूरतों के डेटा के आधार पर व्यवस्थित करने की कोशिश होगी। यानी सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि बस कहां चलानी है, बल्कि यह भी तय करने की कोशिश होगी कि किस रूट पर कितनी बस चाहिए, किस समय चाहिए और यात्रियों की वास्तविक जरूरत क्या है। यही बदलाव इस योजना को पारंपरिक बस सेवा से अलग करता है।
बस में तकनीक..सफर में सुरक्षा
मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा का दूसरा बड़ा पक्ष है तकनीक और सुरक्षा। प्रस्तावित बसों में सीसीटीवी, जीपीएस, पैनिक बटन और रियल टाइम मॉनिटरिंग जैसी सुविधाओं को शामिल किया जा रहा है। ईवी और सीएनजी बसों को प्राथमिकता देने की योजना भी है। इसका सीधा फायदा यात्रियों को मिल सकता है। बस कहां है, कब पहुंचेगी और यात्रा के दौरान सुरक्षा की स्थिति क्या है। इन तमाम पहलुओं पर निगरानी बेहतर होगी। डिजिटल टिकटिंग और रियल टाइम यात्री सूचना प्रणाली के जरिए सार्वजनिक परिवहन को ज्यादा पारदर्शी और यात्री-अनुकूल बनाने का लक्ष्य है। यानी सरकार का विजन साफ है। सही बस, सही मार्ग और सही समय।
Rapido से साझेदारी..आखिरी मील की दूरी होगी कम
इस योजना का एक अहम हिस्सा फर्स्ट और लास्ट-माइल कनेक्टिविटी है। MPYPIL और Rapido के बीच हुए समझौते के जरिए बस स्टैंड, बस स्टॉप और मेट्रो स्टेशन जैसे परिवहन केंद्रों को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने की दिशा में काम होगा। भोपाल और इंदौर में इसका पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया जाएगा। खास बात यह है कि इसमें महिलाओं द्वारा संचालित ‘रैपिडो पिंक’ बाइक-टैक्सी सेवा को भी बढ़ावा देने की बात कही गई है। इससे उस यात्री की समस्या का समाधान करने की कोशिश होगी जो अपने घर से बस स्टॉप तक या बस से उतरने के बाद अंतिम गंतव्य तक पहुंचने के लिए परेशान होता है। यानी बस सेवा को अकेले नहीं, बल्कि मेट्रो + बस + बाइक टैक्सी जैसे परिवहन साधनों को जोड़कर देखने की कोशिश है।
E-बस…रोजगार और हरित परिवहन का नया रास्ता
मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा का एक और महत्वपूर्ण पहलू है ग्रीन मोबिलिटी। ई-बसों को बढ़ावा देने से प्रदूषण कम करने की दिशा में मदद मिल सकती है। इंदौर में भी यह पहल पर्यावरण-अनुकूल परिवहन के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती है। पीथमपुर में इलेक्ट्रिक बस निर्माण संयंत्र का उल्लेख भी इस पूरी योजना को सिर्फ यात्री सेवा तक सीमित नहीं रहने देता। यानी एक तरफ बसों की जरूरत पूरी होगी। दूसरी तरफ वाहन निर्माण, तकनीक, संचालन, रखरखाव और रोजगार से जुड़े नए अवसर पैदा हो सकते हैं। यही वजह है कि सरकार इसे परिवहन व्यवस्था के साथ-साथ आर्थिक गतिविधियों को गति देने वाले मॉडल के रूप में भी देख रही है।
15 हजार बसों का स्कोप…360 डिग्री बदलाव की उम्मीद
मध्यप्रदेश में सार्वजनिक परिवहन को लेकर सरकार का दावा बड़ा है। प्रदेश में 15 हजार से अधिक बसों की संभावित जरूरत और 5 लाख किलोमीटर सड़क नेटवर्क इस क्षेत्र की विशाल संभावनाओं को दिखाता है। अगर योजना अपने लक्ष्य के मुताबिक जमीन पर उतरती है, तो इसका असर छात्रों, कर्मचारियों, महिलाओं, बुजुर्गों, ग्रामीण यात्रियों, व्यापारियों और पर्यटकों तक दिखाई दे सकता है। खासकर मध्यप्रदेश में धार्मिक और पर्यटन स्थलों पर बढ़ती भीड़ के बीच मजबूत बस कनेक्टिविटी महत्वपूर्ण हो जाती है। उज्जैन, इंदौर, भोपाल, महाकाल क्षेत्र, ओंकारेश्वर, खजुराहो, चित्रकूट, ओरछा और दूसरे पर्यटन व धार्मिक स्थलों तक बेहतर सार्वजनिक परिवहन का सीधा असर पर्यटन अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
असली परीक्षा.. योजना से जमीन तक
हालांकि किसी भी बड़ी परिवहन योजना की असली सफलता घोषणाओं से नहीं, बल्कि उसके जमीनी क्रियान्वयन से तय होती है। बसें समय पर चलें। ग्रामीण रूट आर्थिक रूप से टिकाऊ रहें। किराया आम आदमी की पहुंच में हो। ड्राइवर और परिचालक प्रशिक्षित हों। बसों का रखरखाव बेहतर हो। डिजिटल सिस्टम सिर्फ कागज पर नहीं बल्कि वास्तव में काम करे। और सबसे महत्वपूर्ण। दूरदराज के गांवों तक नियमित सेवा पहुंचे। अगर इन चुनौतियों का समाधान प्रभावी ढंग से किया जाता है, तो मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा मध्यप्रदेश के सार्वजनिक परिवहन में वास्तविक बदलाव ला सकती है।
नया सफर… नई कनेक्टिविटी
25 सितंबर की शुरुआत सिर्फ नई बस सेवा की शुरुआत नहीं। बल्कि मध्यप्रदेश के सार्वजनिक परिवहन को नए मॉडल में ढालने की कोशिश है। गांवों तक पहुंच, अंतरजिला और अंतरराज्यीय कनेक्टिविटी, डिजिटल निगरानी, महिला सुरक्षा, ई-बस, पीपीपी मॉडल और फर्स्ट-लास्ट माइल कनेक्टिविटी। इन सभी को एक साथ जोड़कर सरकार ने परिवहन का बड़ा खाका सामने रखा है। अब नजर इस बात पर होगी कि ‘मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा’ कागज के विजन से निकलकर सड़क पर कितनी तेजी और कितनी विश्वसनीयता से दौड़ती है। अगर यह मॉडल अपने लक्ष्यों को हासिल करता है, तो मध्यप्रदेश में बस सिर्फ यात्रा का साधन नहीं, बल्कि गांव, शहर, रोजगार, पर्यटन और विकास को जोड़ने वाली चलती-फिरती कड़ी बन सकती है। (प्रकाश कुमार पांडेय)





