दुनिया तेजी से बदल रही है। एक तरफ देश अलग-अलग गुटों में बंटते दिखाई दे रहे हैं, तो
दूसरी तरफ व्यापार, तकनीक और सुरक्षा को लेकर प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। ऐसे समय
में यह सवाल अहम हो जाता है कि आखिर बदलती दुनिया को आगे कैसे चलाया जाए? क्या
इसकी दिशा कुछ बड़े देश ही तय करेंगे, या दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की भी इसमें
बराबर की भागीदारी होगी? इसी सवाल के बीच शांगहाई सहयोग संगठन यानी एससीओ की
भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है।
फिलहाल दुनिया की नजर किर्गिज़स्तान की राजधानी बिश्केक पर है, जहां 31 अगस्त और
1 सितंबर को एससीओ का 26वां शिखर सम्मेलन हो रहा है। भारत, चीन, रूस, ईरान,
पाकिस्तान और मध्य एशिया के अन्य सदस्य देशों के नेता इस सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं।
यह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एससीओ अपनी स्थापना की 25वीं वर्षगांठ मना
रहा है। सम्मेलन में सुरक्षा के साथ-साथ अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, परिवहन, डिजिटल सहयोग
और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हो रही है।
दरअसल, एससीओ की शुरुआत 2001 में क्षेत्रीय सुरक्षा और सहयोग के मंच के रूप में हुई
थी। लेकिन पिछले 25 वर्षों में इसका दायरा काफी बढ़ा है। आज यह केवल सुरक्षा तक
सीमित संगठन नहीं है, बल्कि व्यापार, निवेश, ऊर्जा, परिवहन संपर्क और तकनीक जैसे क्षेत्रों
में भी सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। यही बदलाव एससीओ को मौजूदा वैश्विक
व्यवस्था में एक अहम मंच बनाता है।
खास बात यह है कि दुनिया में जब गुटबंदी बढ़ रही है, तब एससीओ के सदस्य देश आपसी
आर्थिक सहयोग को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। बेहतर परिवहन संपर्क, व्यापार
और निवेश से सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं को फायदा मिल सकता है। यानी मतभेद
अपनी जगह हैं, लेकिन साझा हितों पर साथ काम करने की गुंजाइश अभी भी बनी हुई है।
इसी तरह सुरक्षा एससीओ के एजेंडे का एक अहम हिस्सा है। आतंकवाद, उग्रवाद, मादक
पदार्थों की तस्करी और साइबर खतरों जैसी चुनौतियां किसी एक देश की सीमाओं तक
सीमित नहीं रहतीं। इनसे निपटने के लिए सूचनाओं का आदान-प्रदान और देशों के बीच
बेहतर तालमेल जरूरी है। एससीओ इसी सहयोग को मजबूत करने का प्रयास करता है।
हालांकि, यह भी सच है कि एससीओ के सभी सदस्य देशों की सोच और प्राथमिकताएं एक
जैसी नहीं हैं। इसके बावजूद ये देश एक ही मंच पर बैठते हैं और साझा हितों वाले मुद्दों पर
सहयोग की कोशिश करते हैं। यही शायद एससीओ की सबसे बड़ी ताकत है।
आज की दुनिया में हर मुद्दे पर सहमति होना जरूरी नहीं है, लेकिन संवाद बना रहना जरूरी
है। आर्थिक सहयोग के रास्ते खुले रखना जरूरी है और साझा सुरक्षा चुनौतियों से मिलकर
निपटना भी जरूरी है। बिश्केक में हो रहा एससीओ शिखर सम्मेलन इसी बदलती वैश्विक
व्यवस्था की एक झलक पेश करता है।
दरअसल, एससीओ अब केवल एक क्षेत्रीय संगठन नहीं रह गया है। यह ऐसा मंच बन रहा है,
जहां अलग-अलग सोच और हितों वाले देश साझा समस्याओं पर बातचीत कर सकते हैं और
सहयोग के रास्ते तलाश सकते हैं। दुनिया किस दिशा में आगे बढ़ेगी, यह आने वाला समय
बताएगा। लेकिन इतना साफ है कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में एससीओ की आवाज अब
पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।
(अखिल पाराशर, CGTN हिन्दी संवाददाता, बीजिंग)