पांच देशों के हाथ में दुनिया के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन की निर्णायक ताकत। महासचिव के चुनाव पर फिर उठे सवाल। क्या भारत संयुक्त राष्ट्र महासभा को आगे कर बदल सकता है वैश्विक व्यवस्था का पुराना नियम?
दुनिया की राजनीति में ताकत का संतुलन बदल रहा है। एक तरफ भारत जैसी उभरती वैश्विक शक्ति अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। सवाल उस व्यवस्था का है, जिसमें दुनिया के 193 देशों की सदस्यता वाली संयुक्त राष्ट्र महासभा के मुकाबले केवल पांच स्थायी सदस्यों वाली सुरक्षा परिषद के पास कई अहम फैसलों को रोकने की विशेष शक्ति है।
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संयुक्त राष्ट्र में पांच देशों की बादशाहत पर सवाल!
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वीटो की ताकत को चुनौती देने का वक्त?
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भारत के सामने वैश्विक नेतृत्व का अवसर।
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थरूर ने दिखाई भारत को नई राह।
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193 देश बनाम पांच महाशक्तियां!
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क्या बदल जाएगा संयुक्त राष्ट्र का पुराना नियम?
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वीटो के दबदबे पर भारत का बड़ा दांव?
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1945 की व्यवस्था, 2026 की चुनौती।
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महासभा की ताकत बढ़ाने की तैयारी?
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क्या भारत बनेगा दुनिया की नई आवाज?
अब संयुक्त राष्ट्र महासचिव के चुनाव को लेकर इसी व्यवस्था पर बहस तेज हुई है। कांग्रेस सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री शशि थरूर ने इस बहस में भारत के लिए एक बड़ा अवसर देखा है। उनका मानना है कि यदि सुरक्षा परिषद में सहमति नहीं बनती, तो भारत महासभा के सदस्य देशों को एकजुट करने की पहल कर सकता है।
यह सिर्फ एक चुनाव की प्रक्रिया का सवाल नहीं है। इसके पीछे संयुक्त राष्ट्र में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व, विकासशील देशों की आवाज और वैश्विक नेतृत्व के नए समीकरण की बहस छिपी है।
आखिर संयुक्त राष्ट्र में वीटो पावर का विवाद क्या है?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं। इनमें पांच स्थायी सदस्य हैं—
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अमेरिका
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रूस
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चीन
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ब्रिटेन
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फ्रांस
इन पांचों देशों के पास वीटो का अधिकार है। यानी सुरक्षा परिषद के किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर इनमें से कोई एक देश नकारात्मक वोट डाल दे, तो प्रस्ताव रुक सकता है। यही व्यवस्था अब संयुक्त राष्ट्र महासचिव के चयन में भी चर्चा का केंद्र बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 97 के मुताबिक महासचि व की नियुक्ति महासभा करती है, लेकिन इसके लिए सुरक्षा परिषद की सिफारिश जरूरी है। व्यवहार में इसका अर्थ है कि पांचों स्थायी सदस्य किसी उम्मीदवार को रोकने की स्थिति में रहते हैं। यानी दुनिया के 193 देशों की महासभा अंतिम नियुक्ति करती है, लेकिन उम्मीदवार के चयन का निर्णायक रास्ता 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद से होकर गुजरता है। यही वह व्यवस्था है, जिसे लेकर अब सवाल उठ रहे हैं।
महासचिव के चुनाव ने क्यों बढ़ाई बहस?
इस बार संयुक्त राष्ट्र के अगले महासचिव का चयन होना है। एंतोनियो गुटेरेस का कार्यकाल 31 दिसंबर 2026 को समाप्त होगा और नए महासचिव को 1 जनवरी 2027 से जिम्मेदारी संभालनी है। इस पद के लिए लैटिन अमेरिका और दूसरे क्षेत्रों के कई उम्मीदवार मैदान में हैं। इनमें रेबेका ग्रिनस्पैन, राफेल ग्रोसी, कैरोलिन रोड्रिग्स बर्केट और लाना नुसेइबेह जैसे नाम शामिल हैं। 30 अक्टूबर को सातवें अनौपचारिक मतदान के बाद भी सुरक्षा परिषद में किसी एक उम्मीदवार पर सहमति नहीं बन पाई। रॉयटर्स के अनुसार, कोस्टा रिका की रेबेका ग्रिनस्पैन को 11 समर्थन मत मिले, जबकि राफेल ग्रोसी को 9 और कैरोलिन रोड्रिग्स बर्केट को 8 समर्थन मत मिले। लेकिन किसी उम्मीदवार को स्थायी सदस्यों की आवश्यक सहमति हासिल होने की स्थिति स्पष्ट नहीं हुई।
यहां एक दिलचस्प पहलू भी है। संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में अब तक कोई महिला महासचिव नहीं बनी है। इस बार महिला उम्मीदवारों की मजबूत मौजूदगी के कारण इस पद पर पहली महिला की नियुक्ति की संभावना भी चर्चा में है। लेकिन उम्मीदवारों की योग्यता और समर्थन के बावजूद अंतिम फैसला पांच स्थायी सदस्यों की सहमति से प्रभावित हो रहा है।
शशि थरूर ने भारत के लिए क्या अवसर देखा?
यहीं से भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। शशि थरूर खुद संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद की दौड़ में शामिल रह चुके हैं। वर्ष 2006 में भारत ने उन्हें इस पद के लिए उम्मीदवार बनाया था, लेकिन अंततः दक्षिण कोरिया के बान की मून महासचिव चुने गए। इसलिए संयुक्त राष्ट्र की चयन प्रक्रिया और उसकी कूटनीतिक जटिलताओं को थरूर करीब से समझते हैं। उन्होंने प्रोफेसर वेसेलिन पोपोवस्की के उस सुझाव का समर्थन किया है, जिसमें महासचिव के चयन में सुरक्षा परिषद के एकाधिकार को कम करने और महासभा की भूमिका बढ़ाने की बात कही गई है। थरूर का सुझाव है कि यदि सुरक्षा परिषद इस महीने भी किसी एक नाम पर सहमति नहीं बना पाती, तो भारत महासभा के सदस्य देशों से बातचीत कर उन्हें एकजुट करने की पहल पर विचार कर सकता है। यहां भारत के लिए अवसर केवल किसी उम्मीदवार का समर्थन करना नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र की निर्णय प्रक्रिया में व्यापक भागीदारी की मांग को नेतृत्व देना है।
भारत क्यों बन सकता है ग्लोबल साउथ की आवाज?
भारत के सामने इस बहस में नेतृत्व का अवसर इसलिए भी है क्योंकि वह लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र में सुधार और विकासशील देशों की भागीदारी बढ़ाने की मांग करता रहा है।
भारत की दावेदारी के पीछे कुछ महत्वपूर्ण आधार हैं।
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विशाल सदस्यता: भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है।
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वैश्विक अर्थव्यवस्था: भारत की आर्थिक और कूटनीतिक भूमिका लगातार महत्वपूर्ण हुई है।
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ग्लोबल साउथ का प्रतिनिधित्व: एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों के मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने का भारत के पास अनुभव है।
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बहुपक्षीय कूटनीति: भारत अमेरिका, रूस, यूरोप और विकासशील देशों के साथ अलग-अलग स्तरों पर संबंध रखता है।
अगर भारत महासभा में इस मुद्दे पर व्यापक सहमति बनाने की पहल करता है, तो उसे केवल एक देश के प्रतिनिधि के बजाय व्यापक अंतरराष्ट्रीय सुधार की आवाज के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन इसके लिए एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और छोटे देशों का समर्थन जुटाना जरूरी होगा।
क्या महासभा वास्तव में वीटो पावर खत्म कर सकती है?
यहां सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू समझना जरूरी है। महासभा में 193 देश हैं और प्रत्येक देश के पास एक मत है। लेकिन केवल बहुमत से संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 97 को बदला नहीं जा सकता। यदि महासचिव की नियुक्ति की मौजूदा व्यवस्था बदलनी है, तो संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन की जरूरत पड़ सकती है। अनुच्छेद 108 के अनुसार इसके लिए महासभा में दो-तिहाई देशों का समर्थन और फिर दो-तिहाई सदस्य देशों की संवैधानिक प्रक्रिया के तहत पुष्टि जरूरी है। इसमें पांचों स्थायी सदस्यों की पुष्टि भी अनिवार्य है।
यानी जिस वीटो व्यवस्था को चुनौती देने की बात हो रही है, उसे पूरी तरह खत्म करने के लिए उन्हीं पांच शक्तिशाली देशों की सहमति भी आवश्यक हो सकती है। इसलिए शशि थरूर के सुझाव को तत्काल वीटो पावर समाप्त करने की घोषणा समझना सही नहीं होगा। यह महासचिव चयन में महासभा की भूमिका और सुरक्षा परिषद के नियंत्रण को सीमित करने की बहस है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?
भारत के लिए यह अवसर जितना बड़ा है, चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी हैं। पहली चुनौती अमेरिका, चीन और रूस का रुख। पांचों स्थायी सदस्य अपनी विशेष शक्तियों को आसानी से छोड़ना नहीं चाहेंगे। दूसरी चुनौती विकासशील देशों को एक मंच पर लाना। सभी देशों के अपने क्षेत्रीय और रणनीतिक हित हैं। उन्हें एक प्रस्ताव पर सहमत करना आसान नहीं होगा। तीसरी चुनौती भारत की अपनी दावेदारी। भारत लंबे समय से सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता और वीटो सहित समान अधिकारों की मांग करता रहा है। ऐसे में उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि वह केवल महासचिव चयन की प्रक्रिया बदलना चाहता है या व्यापक संस्थागत सुधार की मांग कर रहा है। चौथी चुनौती समय। नए महासचिव को 1 जनवरी 2027 से कार्यभार संभालना है। ऐसे में मौजूदा चुनाव प्रक्रिया को बदलने के लिए बहुत कम समय बचा है।
क्या भारत दुनिया की कूटनीति में नई भूमिका निभा सकता है?
यह इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 1945 में हुई थी। उस समय दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियां आज से बिल्कुल अलग थीं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जिन पांच देशों को स्थायी सदस्यता और वीटो का अधिकार मिला, वही आज भी सुरक्षा परिषद की निर्णायक शक्ति बने हुए हैं। लेकिन आज दुनिया में भारत, ब्राजील, जापान, जर्मनी और अफ्रीकी देशों की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो चुकी है।भारत का तर्क रहा है कि 1945 की वैश्विक व्यवस्था के आधार पर 2026 की दुनिया के फैसले नहीं होने चाहिए।इसलिए शशि थरूर की ओर से उठाया गया मुद्दा केवल महासचिव के चुनाव तक सीमित नहीं है। यह संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता, प्रतिनिधित्व और भविष्य की वैश्विक व्यवस्था से जुड़ा प्रश्न है।
वीटो की ताकत को चुनौती, भारत के नेतृत्व की परीक्षा!
संयुक्त राष्ट्र में पांच स्थायी सदस्यों का विशेषाधिकार दशकों से कायम है। लेकिन महासचिव के चुनाव में बार-बार सहमति न बनना इस व्यवस्था की सीमाओं को फिर सामने ला रहा है। शशि थरूर ने इसी स्थिति में भारत के लिए एक कूटनीतिक अवसर देखा है। अगर भारत 193 देशों की महासभा में इस विषय पर संवाद और समर्थन जुटाने की पहल करता है, तो वैश्विक संस्थाओं में सुधार की बहस को नई गति मिल सकती है।
हालांकि, यह रास्ता आसान नहीं है। मौजूदा चार्टर और पांच स्थायी सदस्यों के अधिकार बड़ी कानूनी और राजनीतिक बाधा हैं। भारत के सामने अब दो रास्ते हैं। वह केवल संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सदस्यता की अपनी पुरानी मांग दोहराए या फिर वैश्विक निर्णय प्रक्रिया को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने की बहस का नेतृत्व भी करे। यही वह बड़ा सवाल है, जिस पर आने वाले दिनों में दुनिया की कूटनीति की नजर रहेगी। सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या 193 देशों की आवाज पांच शक्तिशाली देशों के विशेषाधिकार को चुनौती दे पाएगी और क्या भारत इस बदलाव की अगुवाई करने की पहल करेगा? (प्रकाश कुमार पांडेय)